भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1588

[ 18/44-47 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला जब जिस स्थानपर रहते हैं, वहीं आकर भक्तके द्वारा उनका दर्शन करना :— कभु कुञ्जे रहे, कभु रहे ग्रामान्तरे। येइ भक्त, ताँहा आसि' देखये ताँहारे ॥ 44 ॥ अनुवाद—कभी तो श्रीगोपाल कुञ्जमें रहते हैं और कभी ग्राम-ग्राममें स्थान बदलते रहते हैं। जो भक्त होता है, वह वहाँपर आकर उनके दर्शन करता है ॥ 44 ॥ श्रीरूप-सनातनको इसी प्रकार किसी छलसे दर्शन-दान :— पर्वते ना चड़े दुइ—रूप-सनातन। एइरूपे ताँ-सबारे दियाछेन दरशन ॥ 45 ॥ अनुवाद—श्रीरूप और श्रीसनातन भी गोवर्धन पर्वतपर नहीं चढ़ते थे। श्रीगोपालने उन दोनोंको भी इसी प्रकारसे दर्शन दिये ॥ 45 ॥ श्रीगोपालके दर्शनकी अभिलाषाके कारण श्रीरूपके गोपाल-दर्शनके वृत्तान्तका वर्णन :— वृद्धकाले रूप-गोसाञि ना पारे याइते। वाञ्छा हैल गोपालेर सौन्दर्य देखिते ॥ 46 ॥ अनुवाद—वृद्धावस्थामें श्रीरूप गोस्वामी उनके दर्शनके लिये जा नहीं पा रहे थे, किन्तु उनके हृदयमें श्रीगोपालके सुन्दर रूपके दर्शन करनेकी अभिलाषा थी॥ 46 ॥ मथुरामें वल्लभपुत्र विट्ठलेश्वरके घरपर एक मास तक वास :— म्लेच्छभये आइला गोपाल मथुरा-नगरे। एकमास रहिल विट्ठलेश्वर-घरे ॥ 47 ॥ अनुवाद—म्लेच्छोंके भयसे श्रीगोपाल मथुरा-नगरीमें आ गये और वहाँ एक मास तक वे श्रीविट्ठलेश्वरके घरमें रहे ॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—बादमें श्रीरूप-सनातनने आकर जब व्रजवास किया, तब वे भी श्रीगोवर्धन-पर्वतको साक्षात् भगवान्‌की मूर्ति जानकर उनपर नहीं चढ़ते थे। श्रीगोपालने जिस प्रकार महाप्रभुको दर्शन दिया, उन्हें भी उसी प्रकारसे दर्शन दिया था। वृद्धावस्थामें श्रीरूपगोस्वामी गोवर्धन जानेमें असमर्थ थे, परन्तु साथ ही श्रीगोपालका सौन्दर्य देखनेकी उनकी इच्छा हुई थी। तब श्रीगोपालने श्रीरूपगोस्वामीपर कृपा करनेके उद्देश्यसे इस प्रकार म्लेच्छोंसे भयरूपी 'छल' करके मथुरानगरीमें श्रीविट्ठलेश्वरके घरमें एक मास तक वास किया था ॥ 45-47 ॥ अनुभाष्य—'विट्ठलेश्वर'—भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं- तरङ्गमें— “विठ्ठलेर सेवा कृष्णचैतन्यविग्रह। ताहार दर्शने हैल परम आग्रह ॥ श्रीविठ्ठलनाथ—भट्टवल्लभ-तनय। करिला यतेक प्रीति कहिले ना हय ॥ गाँठोलि-ग्रामे गोपाल आइला 'छल' करि'। ताँरे देखि' नृत्यगीते मग्न गौरहरि ॥ श्रीदासगोस्वामी आदि परामर्श करि'। श्रीविठ्ठलेश्वरे कैला सेवा-अधिकारी ॥ पिता श्रीवल्लभभट्ट ताँर अदर्शने। कतदिन मथुराय छिलेन निर्जने॥” [ अर्थात् “श्रीविट्ठलनाथ श्रीवल्लभ-भट्टके पुत्र थे। वे श्रीकृष्ण-चैतन्यके विग्रहकी सेवा करते थे और उनके दर्शनमें उनका परम आग्रह था। गाँठोलि-ग्राममें श्रीगोपाल यवनोंके भयका छल करके आये और महाप्रभुको वहाँ दर्शन दिये। उनके दर्शन करके महाप्रभु प्रेममें मग्न होकर नृत्य और गान करने लगे। उस समय श्रीगोपालकी सेवा श्रीमाधवेन्द्रपुरीके दो गौड़ीय वैष्णव शिष्य करते थे। उन्होंने सभी वैष्णवोंसे कहा कि हमारे अप्रकट होनेपर श्रीगोपालकी सेवा कौन करेगा? तब श्रीरघुनाथदास गोस्वामी आदिने परामर्श करके श्रीविट्ठलनाथको श्रीगोपालका सेवाधिकारी नियुक्त किया। अपने पिता श्रीवल्लभ-भट्टके अप्रकट होनेके बाद कुछ समय तक वे मथुरामें निर्जन स्थानमें रहे।”] श्रीवल्लभभट्टके दो पुत्र थे। ज्येष्ठ 'गोपीनाथ'का जन्म 1432 शकाब्दमें हुआ था। कनिष्ठ 'विट्ठलनाथ'का 142 |