श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1589, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय 18/47-53 ] जन्म 1437 शकाब्दमें हुआ और उन्होंने 1507 शकाब्दमें परलोक गमन किया। विट्ठलके सात पुत्र- गिरिधर, गोविन्द, बालकृष्ण, गोकुलेश, रघुनाथ, यदुनाथ और घनश्याम थे। विट्ठलने पिताके असम्पूर्ण ग्रन्थोंको पूर्ण किया जिनमें ब्रह्मसूत्र-भाष्य, 'सुबोधिनी'-टिप्पणी, 'विद्वन्मण्डन', 'शृङ्गाररसमण्डन', 'न्यासादेश-विवरण' आदि ग्रन्थ थे। “पूर्ण-सप्ततिवर्षाणि दिनान्यष्टौ च विंशतिः। वसुधायां व्यराजन्तु श्रीमद्विठ्ठल दीक्षिताः॥” श्रीमहाप्रभु श्रीवल्लभपुत्र श्रीविठ्ठलके जन्मसे एक वर्ष पहले या उससे भी एक वर्ष पहले श्रीवृन्दावनमें आये थे। श्रीरूप गोस्वामीजी वृद्धावस्थामें श्रीगोपाल श्रीवल्लभके पुत्र श्रीविट्ठलनाथके मथुरा स्थित घरमें एकमास तक रहे थे॥47॥ मथुरामें विट्ठलेश्वरके घरमें एकमास सपरिकर श्रीरूपके द्वारा श्रीगोपाल-दर्शन :- तबे रूप-गोसाञि सब निजगण लञा। एकमास दरशन कैला मथुराय रहिया॥48॥ सङ्गे गोपाल-भट्ट, दास-रघुनाथ। रघुनाथ-भट्टगोसाञि, आर लोकनाथ॥49॥ भूगर्भ-गोसाञि, आर श्रीजीव-गोसाञि। श्रीयादव-आचार्य, आर गोविन्द-गोसाञि॥50॥ श्रीउद्धवदास, आर माधव, दुइजन। श्रीगोपाल-दास, आर दास-नारायण॥51॥ 'गोविन्द' भक्त, आर वाणी-कृष्णदास। पुण्डरीकाक्ष, ईशान, आर लघु-हरिदास॥52॥ एइ सब मुख्यभक्त लञा निज-सङ्गे। श्रीगोपाल दरशन कैला बहु-रङ्गे॥53॥ अनुवाद-तब श्रीरूप गोस्वामी अपने निजजनोंके साथ मथुरा आये और वहाँ एक मास तक रहकर श्रीगोपालके दर्शन किये। श्रीरूप गोस्वामीके साथ श्रीगोपाल-भट्ट, श्रीरघुनाथ-दास, श्रीरघुनाथ-भट्ट गोस्वामी, श्रीलोकनाथ, श्रीभूगर्भ गोस्वामी, श्रीजीव-गोस्वामी, श्रीयादव-आचार्य, श्रीगोविन्द-गोस्वामी, श्रीउद्धवदास, श्रीमाधव, श्रीगोपाल-दास, श्रीदास-नारायण, 'श्रीगोविन्द' भक्त, श्रीवाणी-कृष्णदास, श्रीपुण्डरीकाक्ष, श्रीईशान, छोटे-हरिदास आदि भक्त थे। इन सब मुख्य भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीरूप गोस्वामीने बड़े आनन्दपूर्वक श्रीगोपालके दर्शन किये॥48-53॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'लघु-हरिदास'—अनेक वैष्णवोंका नाम 'हरिदास' होता है। इसलिये 'लघु', 'मध्यम' आदि 'विशेषण' हरिदास नामक वैष्णवोंके नामके साथ दूसरे वैष्णव प्रयोग करते हैं। महाप्रभुके समय जो लघु-हरिदास (छोटे-हरिदास) थे, उन्होंने प्रयागमें देहत्याग किया था; ये 'लघु हरिदास'—अन्य एक व्यक्ति हैं॥52॥ अनुभाष्य—'लोकनाथ'—श्रीमहाप्रभुके अत्यन्त विरक्त (वैरागी) महाभागवत पार्षद-गोस्वामी हैं। यशोहरके अन्तर्गत 'तालखड़ि'-ग्राममें इनका पहले निवास था; उससे पहले काचनापाड़ामें निवास था। इनके पिताका नाम-पद्मनाभ था; इनके एकमात्र छोटे भाई 'प्रगल्भ' थे। महाप्रभुकी आज्ञासे इन्होंने व्रजवास करके भजन किया और एकमात्र श्रीनरोत्तम-ठाकुर महाशयको दीक्षा प्रदान की। ऐसा लगता है, अत्यधिक दीनतावशतः इन्होंने अपने चरित्रका वर्णन करनेके लिये निषेध किया होगा, इसलिये इनका चरित्र श्रीचैतन्यचरितामृतमें विशेष रूपसे उल्लिखित नहीं हुआ है। इ, वि, आर लाइनमें 'यशोहर' स्टेशन है, वहाँसे मोटर गाड़ीके द्वारा सोनाखालि, वहाँसे खेजूरा, वहाँसे पैदल तथा वर्षाके समयमें नावके द्वारा 'तालखड़ि' जाना पड़ता है। इनके भाईके वंशज “तालखड़िके भट्टाचार्य” नामसे सामाजिक पद-मर्यादामें विशेष सम्मानित हैं। भ्रातृवंशके विवरणके लिये वैष्णव मञ्जूषा-समाहृति चतुर्थ संख्या देखें। भक्तिरत्नाकरकी छठी तरङ्गमें— “गोस्वामी गोपालभट्ट अति दयामय। । 143