श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1590, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 18/49-57 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भूगर्भ, श्रीलोकनाथ-गुणेर आलय॥ श्रीमाधव, श्रीपरमानन्द-भट्टाचार्य। श्रीमधुन-पण्डित-याँर चरित्र आश्चर्य॥ प्रेमी कृष्णदास, कृष्णदास ब्रह्मचारी। यादव आचार्य, नारायण कृपावान्। श्रीपुण्डरीकाक्ष-गोसाञि, गोविन्द, ईशान॥ श्रीगोविन्द, वाणीकृष्णदास अत्युदार। श्रीउद्धव-मध्ये मध्ये गौड़े गति याँर॥ द्विज-हरिदास, कृष्णदास कविराज। श्रीगोपालदास याँर अलौकिक काय। श्रीगोपाल, माधवादि यतेक वैष्णव।” [श्रीनिवासाचार्यके द्वारा ग्रन्थरूपी रत्नोंको लेकर वृन्दावनसे गौड़देश जानेके समय विदायी देनेके लिये एकत्रित वैष्णवगण-परम दयामय श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी, गुणोंके भण्डार श्रीभूगर्भ और श्रीलोकनाथ गोस्वामी, श्रीमाधव, श्रीपरमानन्द-भट्टाचार्य, श्रीमधुन-पण्डित जिनका चरित्र आश्चर्यजनक है, प्रेमी कृष्णदास, श्रीकृष्णदास ब्रह्मचारी, श्रीयादव आचार्य, कृपामय श्रीनारायण, श्रीपुण्डरीकाक्ष-गोसाईं, श्रीगोविन्द, श्रीईशान, श्रीगोविन्द, परम उदार श्रीवाणीकृष्णदास, श्रीउद्धव जो बीच-बीचमें गौड़देश जाया करते थे, श्रीद्विज-हरिदास, श्रीकृष्णदास कविराज, श्रीगोपालदास जिनके कार्य अलौकिक होते थे, श्रीगोपाल, श्रीमाधवादि जितने भी वैष्णव व्रजमें थे।"]॥ 49-52॥ एक मासके बाद श्रीगोपाल और श्रीरूपका अपने-अपने स्थानपर लौटना :- एकमास रहि' गोपाल गेला निज-स्थाने। श्रीरूप-गोसाञि आइला श्रीवृन्दावने॥ 54॥ अनुवाद-एक मास तक मथुरामें रहकर श्रीगोपाल अपने स्थानपर लौट गये और श्रीरूप-गोस्वामी श्रीवृन्दावन धाममें आ गये॥ 54॥ महाप्रभुका काम्यवनमें आगमन :- प्रस्तावे कहिलुँ गोपाल-कृपार आख्यान। तबे महाप्रभु गेला 'श्रीकाम्यवन'॥ 55॥ अनुवाद-प्रसङ्ग आनेपर ही मैंने श्रीगोपालकी कृपाका वर्णन किया है। महाप्रभु श्रीगोपालका दर्शन करके 'श्रीकाम्यवन'में गये॥ 55॥ अनुभाष्य- 'काम्यवन'-आदि-वाराहमें- “चतुर्थं काम्यकवनं वनानां वनमुत्तमम्। तत्र गत्वा नरो देवि मम लोके महीयते॥” [अर्थात् “ब्रजमण्डलके बारह वनोंमें चौथा वन काम्यवन है। यह व्रजमण्डलके सर्वोत्तम वनोंमें-से एक है। इस वनकी परिक्रमा करनेवाला सौभाग्यवान् व्यक्ति मेरे व्रजधाममें पूजनीय होता है।”] भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं-तरङ्गमें- “एइ काम्यवने कृष्णलीला मनोहर। करिबे दर्शन स्थान कुण्ड बहुतर॥ काम्यवने यत तीर्थ लेखा नाहि तार॥” [अर्थात् “इस काम्यवनमें श्रीकृष्णकी अनेक मनोहर लीलाएँ होती हैं। इस वनमें बहुत दर्शनीय कुण्ड हैं। काम्यवनमें जितने तीर्थ हैं, उनका वर्णन करना सम्भव नहीं है।"]॥ 55॥ वृन्दावनमें सभी लीला-स्थलियोँका दर्शन :- प्रभुर गमन-रीति पूर्वे ये लिखिल। सेइमत वृन्दावने तावत् देखिल॥ 56॥ अनुवाद-मैंने महाप्रभुके वृन्दावनमें भ्रमण करनेका वृत्तान्त लिखा है। उसी प्रकार ही महाप्रभुने प्रेमाविष्ट होकर सम्पूर्ण वृन्दावनका दर्शन किया॥ 56॥ वृन्दावनसे नन्दीश्वरमें श्रीनन्दके घरका दर्शन और प्रेम-विह्वलता :- ताँहा लीलास्थली देखि' गेला 'नन्दीश्वर'। 'नन्दीश्वर' देखि' प्रेमे हइला विह्वल॥ 57॥ अनुवाद-काम्यवनमें श्रीकृष्णकी लीलास्थलियोंके दर्शन करके महाप्रभु 'नन्दीश्वर'में (नन्दभवनमें) गये। नन्दभवनमें पहुँचकर महाप्रभु प्रेममें विह्वल हो गये॥ 57॥ 144 ।