श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1591, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय 18/57-63 ] अनुभाष्य— 'नन्दीश्वर'—नन्दालय (नन्दभवन); भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं-तरङ्गमें— “देख नन्दीश्वर चतुर्दिके कुण्डवन। कृष्णविलासेर स्थान भुवनपावन॥” [अर्थात् “इस स्थान नन्दीश्वरको देखो, यहाँ चारों ओर कुण्ड और वन हैं। ये श्रीकृष्णके विलासके स्थान हैं और इनके दर्शनसे ही समस्त लोक पवित्र हो जाते हैं।”]॥ 57॥ पावन-सरोवरमें स्नान, विग्रहके सम्बन्धमें जिज्ञासा :— 'पावनादि' सब कुण्डे स्नान करिया। लोकेरे पुछिल, पर्वत-उपरे याञा॥ 58 ॥ लोगोंसे गुफाके अन्दर विराजमान श्रीनन्द-यशोदा और श्रीकृष्णकी मूर्तिके अवस्थानके विषयमें श्रवण करना :— “किछु देवमूर्त्ति हय पर्वत-उपरे?” लोक कहे,—“मूर्त्ति हय गोफार भितरे ॥ 59 ॥ दुइदिके माता-पिता पुष्ट-कलेवर। मध्ये एक शिशु' हय त्रिभङ्गसुन्दर ॥”60 ॥ शुनि' महाप्रभु मने आनन्द पाञा। 'तिन' मूर्ति देखिला सेइ गोफा उघाड़िया ॥ 61 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पावन-सरोवरादि सभी कुण्डोंमें स्नान करके पर्वतके ऊपर जाकर लोगोंसे पूछा, —“क्या पर्वतके ऊपर भगवान्का कोई श्रीविग्रह है?” लोगोंने कहा,—“गुफाके अन्दर विग्रह हैं। दोनों तरफ हृष्ट-पुष्ट शरीरवाले माता और पिता हैं तथा बीचमें त्रिभङ्गसुन्दर एक बालक है।” इस बातको सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने गुफामें प्रवेश करके तीनों मूर्तियोंके दर्शन किये॥ 58-61 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनन्द-यशोदाकी वन्दना और श्रीकृष्ण-स्पर्शन :— व्रजेन्द्र-व्रजेश्वरीर कैल चरण वन्दन। प्रेमावेशे कृष्णेर कैल सर्वाङ्ग-स्पर्शन॥ 62 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने व्रजेन्द्र श्रीनन्द तथा व्रजेश्वरी श्रीयशोदाजीके चरणोंकी वन्दना की, उन्होंने प्रेमावेशमें श्रीकृष्णके सभी अङ्गोंका स्पर्श किया॥ 62 ॥ अनुभाष्य— 'पावन-सरोवर'—मथुरा-माहात्म्यमें— “पावने सरसि स्नात्वा कृष्णं नन्दीश्वरे गिरौ। दृष्ट्वा नन्दं यशोदाञ्च सर्वाभीष्टमवाप्नुयात् ॥” [अर्थात् “पावन-सरोवरमें स्नान करके नन्दीश्वर पर्वतपर (विराजमान) श्रीकृष्ण, श्रीनन्दमहाराज और श्रीयशोमती माताके दर्शन करनेसे सर्वाभीष्ट प्राप्त होता है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “ए पावन सरोवर कृष्णप्रिय अति ॥” “पर्वत-उपरे देख पुत्रेर सहिते। श्रीनन्दयशोदा शोभे अपूर्व-गोफाते ॥ ओहे श्रीनिवास, एथा श्रीचैतन्यराय। करिते दर्शन गिया प्रवेशे गोफाय ॥ श्रीनन्द-यशोदा-दुइदिके दुइजन। मध्ये कृष्णचन्द्रे देखि' प्रफुल्ल नयन ॥ श्रीनन्द-यशोदार चरण वन्दिया। कृष्णेर सर्वाङ्ग स्पर्श उल्लसित हञा॥ प्रेमेर आवेशे नृत्य-गीत आरम्भिल ॥” [अर्थात् “यह पावन सरोवर श्रीकृष्णको अति प्रिय है। पर्वतके ऊपर देखो—गुफामें पुत्रके सहित श्रीनन्द-यशोदाकी अपूर्व-शोभा है। ओहे श्रीनिवास, यहाँ श्रीचैतन्यरायने इनके दर्शन करनेके लिये गुफामें प्रवेश किया था। श्रीनन्द और श्रीयशोदाके मध्यमें श्रीकृष्णचन्द्रको देखकर उनके नयन प्रफुल्लित हो गये। उन्होंने श्रीनन्द और श्रीयशोदाके चरणोंकी वन्दना की। उल्लसित होकर उन्होंने श्रीकृष्णके सभी अङ्गोंको स्पर्श किया। प्रेमके आवेशमें उन्होंने वहाँ नृत्य-गीत करना आरम्भ कर दिया।”]॥ 58-62 ॥ सारा दिन नृत्य-गीतके बाद खदिरवनमें आगमन :— सब दिन प्रेमावेशे नृत्य-गीत कैला। ताँहा हैते महाप्रभु 'खदिर-वन' आइला ॥ 63 ॥ । 145