भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1592

[ 18/63-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—प्रतिदिन महाप्रभु वहाँ प्रेमावेशमें नृत्य तथा गान करते। बादमें वहाँसे महाप्रभु ‘खदिर-वन’में आ गये॥ 63॥ अनुभाष्य—‘खदिरवन’— ‘सप्तमन्तु वनं भूमौ खदिरं लोकविश्रुतम्॥’ [अर्थात् “द्वादश वनोंमें सातवाँ वन ‘खदिर-वन’ समस्त जगत्में विख्यात है।”] भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— “देखह खदिर वन विदित जगते। विष्णु-लोकप्राप्ति एथा गमन-मात्रेते॥” [अर्थात् “इस जगत्-विख्यात खदिर-वनको देखो। यहाँ जानेमात्रसे जीवको विष्णुलोककी प्राप्ति हो जाती है।”] ॥ 63॥ शेषशायी श्रीकृष्ण और लक्ष्मी-दर्शन :— लीलास्थल देखि’ ताँहा गेला ‘शेषशायी’। ‘लक्ष्मी’ देखि’ एइ श्लोक पड़ेन गोसाञि ॥ 64 ॥ अनुवाद—खदीरवनकी लीलास्थलियॉंको देखकर महाप्रभु वहाँसे ‘शेषशायी’ गये और वहाँपर लक्ष्मीको देखकर उन्होंने निम्नलिखित एक श्लोक पढ़ा— ॥ 64 ॥ अनुभाष्य—‘शेषशायी’—भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— ‘एइ ‘शेषशायी’ क्षीरसमुद्र एथाते। कौतुके शुइला कृष्ण अनन्तशय्याते॥ एइ शेषशायि-मूर्त्ति दर्शन करिते। श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्र आइला एथाते॥ करिया दर्शन, महाकौतुक बाड़िल। से-प्रेमावेशे प्रभु अधैर्य हइल॥” [अर्थात् “ये ‘शेषशायी’ हैं और यहाँ क्षीरसमुद्र है। लीला करते हुए कौतुकवश श्रीकृष्ण अनन्त-शय्यापर लेट गये थे। इन शेषशायी विग्रहके दर्शन करनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्र यहाँ आये थे। दर्शन करके उनमें महाकौतुक बढ़ने लगा और प्रेमावेशमें महाप्रभु अधीर हो गये।”] ॥ 64 ॥ श्रीमद्भागवतमें (10/31/19) :— यत्ते सुजातचरणावरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायूषां नः ॥ 65 ॥ अनुवाद—गोपियों कहती हैं—हे प्रिय, हम तुम्हारे जिन सुकोमल चरणकमलोंको अपने कठोर स्तनोंपर धीरे-धीरे धारण करती हैं, अपने उन्हीं चरणोंके द्वारा तुम अभी वनमें भ्रमण कर रहे हो, वहाँ छोटे-छोटे कङ्कड़-पथरादिके चुभनेसे अवश्य ही तुम्हें कष्ट हो रहा होगा। तुम हमारे जीवन-स्वरूप हो, इसलिये तुम्हारी चिन्तामें व्याकुल होकर हम सबकी बुद्धि भ्रमित हो रही है॥ 65॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/173 संख्या देखें॥ 65 ॥ खेलातीर्थ, भाण्डीरवन और भद्रवनमें आगमन :— तबे ‘खेला-तीर्थ’ देखि’ ‘भाण्डीरवन’ आइला। यमुना पार हञा ‘भद्रवन’ गेला ॥ 66 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु ‘खेला-तीर्थ’ (खेलनवन)के दर्शन करके भाण्डीरवन आ गये। फिर यमुना पार करके वे भद्रवनमें गये॥ 66॥ अनुभाष्य—‘खेलातीर्थ’—भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— “देखह खेलनवन, एथा दुइ भाइ। सखासह खेले भक्षणेर चेष्टा नाइ॥ मायेर यत्नेते भुञे कृष्ण-बलराम। ए खेलनवटेर श्रीखेलातीर्थ नाम॥” [अर्थात् “इस खेलनवनको देखो, यहाँ दोनों भाई (श्रीकृष्ण और श्रीबलराम) सखाओंके साथ खेलते थे। खेलनेमें वे इतने आविष्ट हो जाते थे कि खाना आदि सब भूल जाते थे। माता यशोदाको उन्हें बड़े यत्नसे बुलाकर घर लाना पड़ता कि वे स्नान और भोजन कर लें। इस खेलनवटका नाम श्रीखेलातीर्थ है।”] ‘भाण्डीर-वन’—भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें— 146