भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1593

अठारहवाँ अध्याय 18/66-67 ]

“चलये भाण्डीर-पथे उल्लास अन्तरे। एबे लोक कहय ‘अक्षयवट’ तारे॥ बलराम कौतुके प्रलम्बवध कैला। सखासह भाण्डीरे कृष्णेर नाना लीला॥” [अर्थात् “उल्लाससे भरे हृदयसे महाप्रभु भाण्डीर-वनके मार्गपर चले। अब लोग उसे ‘अक्षयवट’ के नामसे बुलाते हैं। यहाँ खेल-ही-खेलमें श्रीबलरामने प्रलम्बासुरका वध किया था। सखाओंके साथ भाण्डीर-वनमें श्रीकृष्णकी अनेक लीलाएँ हुई थीं।”] स्तवावलीके व्रजविलास-स्तवमें— “मल्लीकृत्य निजाः सखीः प्रियतमागर्वेण सम्भाविता मल्लीभूय मदीश्वरी रसमयी मल्लत्वमुत्कण्ठया। यस्मिन् सम्यगुपेयुषा वकभिदा राधानियोद्धुं मुदा कुर्वाणा मदनस्य तोषमतनोद्भाण्डीरकं तं भजे॥” [अर्थात् “जहाँ मेरी अधीश्वरी श्रीकृष्ण प्रियतमा श्रीराधिका मल्लयुद्धके कौतुकवश स्वयं मल्लवेशमें सुसज्जित होकर अपनी सखियोंको भी मल्लवेशमें सजाकर गर्वित हुई थी और मल्लवेशधारी बकारि श्रीकृष्णके साथ आनन्दपूर्वक मल्लयुद्ध करके मदनका आनन्दवर्धन किया था, मैं उस भाण्डीर-वनका भजन करता हूँ।”] 'भद्रवन'— “अस्ति भद्रवनं नाम षष्ठञ्च वनमुत्तमम्।” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें उत्तम यह छठा वन भद्रवन है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “कृष्णप्रिय हय भद्रवन-गमनेते॥” [अर्थात् “जो भद्रवनमें गमन करता है, वह श्रीकृष्णका प्रिय हो जाता है।”] ॥ 66 ॥ श्रीवन, लोहवन और श्रीकृष्णजन्मभूमि गोकुल दर्शन :— ‘श्रीवन’ देखि’ पुनः गेला ‘लोह-वन’। ‘महावन’ गिया कैला जन्मस्थान-दरशन॥ 67 ॥ अनुवाद—श्रीवन (बिल्ववन)के दर्शन करके महाप्रभु पुनः लोह-वनमें गये और फिर महावनमें जाकर उन्होंने श्रीकृष्णके जन्मस्थानका दर्शन किया॥ 67 ॥ अनुभाष्य—‘श्रीवन’— “वनं बिल्ववनं नाम दशमं देवपूजितम्।” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें दसवें वनका नाम बिल्ववन (बेलवन) है और देवता भी इस वनकी पूजा करते हैं।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देवता-पूजित बिल्ववन शोभामय।” [अर्थात् “अति शोभायुक्त बिल्ववनकी सभी देवता पूजा करते हैं।”] 'लोहवन'— “लौहजङ्ग-वनं नाम लोहजङ्गेन रक्षितम्। नवमन्तु वनं देवि सर्वपातकनाशनम्॥” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें नौवाँ वन लौहजङ्ग-वन है। लौहजङ्गा नामक एक असुर इसकी रक्षा करता था। हे देवि! यह वन समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “लोहवने कृष्णेर अद्भुत गो-चारण। एथा लोहजङ्गासुरे वधे भगवान्॥” [अर्थात् “लौहवनमें श्रीकृष्ण गोचारण कराते थे। यहीं श्रीकृष्णने लौहजङ्घा नामक असुरका वध किया था।”] 'महावन'— “महावनं चाष्टमन्तु सदैव तु मम प्रियम्।” [अर्थात् “व्रजके वनोंमें आठवाँ वन महावन मेरा सदा अति प्रिय है।”] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देख, नन्द-यशोदा-आलय महावने। ×× एइ देख श्रीकृष्णचन्द्रेर जन्मस्थल। ×× श्रीगोकुल, महावन—दुइ ‘एक’ हय॥” [अर्थात् “महावनमें श्रीनन्द और यशोदाके भवनका दर्शन करो। यहाँ श्रीकृष्णके जन्मस्थानको देखो। | 147