श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1569, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसतरहवाँ अध्याय 17/198–207 ] महाप्रभुके दर्शनसे मृग-दम्पतियोंको सुख :– मृग-मृगी मुख देखि' प्रभु-अङ्ग चाटे। भय नाहि करे, सङ्गे याय बाटे-बाटे ॥ 198 ॥ अनुवाद—हिरण और हिरणियाँ महाप्रभुके मुखको देखकर उनके शरीरको चाटने लगे। बिना किसी भयके वे मार्गमें महाप्रभुके साथ-साथ ही चल रहे थे॥ 198 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे पक्षियोंका कलरव करना और हर्ष :– शुक, पिक, भृङ्ग प्रभुरे देखि' 'पञ्चम' गाय। शिखिगण नृत्य करि' प्रभु-आगे याय ॥ 199 ॥ अनुवाद—तोते, कोयलादि पक्षी और भँवरे महाप्रभुको देखकर 'पञ्चम' स्वरमें गान करने लगे तथा मयूर नृत्य करते हुए महाप्रभुके आगे चलने लगे॥ 199 ॥ वृक्ष और लताओंके द्वारा भी पुलकाश्रु-वर्षण :– प्रभु देखि' वृन्दावनर वृक्ष-लतागणे। अङ्कुर-पुलक, मधु-अश्रु वरिषेणे ॥ 200 ॥ फूल-फल भरि' डाल पड़े प्रभु-पाय। बन्धु देखि' बन्धु येन 'भेट' लञा याय ॥ 201 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको देखकर वृन्दावनके वृक्ष और लताएँ आनन्दसे अङ्कुरित तथा पुलकित हो उठे। वे मधुके रूपमें प्रेमाश्रु बहाने लगे। वृक्ष और लताएँ फूलों और फलोंके भारसे महाप्रभुके चरणोंमें झुककर उनको (फूलों-फलोंको) उपहारके रूपमें देते हुए उनका अभिवादन करने लगे मानो महाप्रभु उनके मित्र हों॥ 200–201 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे स्थावर, जङ्गम, सभीमें ही हर्ष और महाप्रभुके साथ क्रीड़ा :– प्रभु देखि' वृन्दावनर स्थावर-जङ्गम। आनन्दित—बन्धु येन देखे बन्धुगण ॥ 202 ॥ ता-सबार प्रीति देखि' प्रभु भावावेशे। सबा-सने क्रीड़ा करे, हञा तार वशे ॥ 203 ॥ प्रति वृक्ष-लता प्रभु करेन आलिङ्गन। पुष्पादि ध्याने करेन कृष्णे समर्पण ॥ 204 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको देखकर वृन्दावनके चल और अचल प्राणी ऐसे आनन्दित हो रहे थे जैसे बन्धुको देखकर बन्धु प्रसन्न होते हैं। उन सबकी प्रीतिको देखकर महाप्रभु भावावेशमें आ गये। उन सबके साथ वे मित्रवत् क्रीड़ा करने लगे। इस प्रकार वे स्वतः ही उनके वशीभूत हो गये थे। महाप्रभु प्रत्येक वृक्ष और लताको आलिङ्गन करने लगे और उनके पुष्प- फलादिको ध्यानके माध्यमसे श्रीकृष्णको समर्पित करने लगे॥ 202–204 ॥ श्रीकृष्णप्रेममें प्रमत्त महाप्रभु :– अश्रु-कम्प-पुलक-प्रेमे शरीर अस्थिरे। 'कृष्ण' बल, 'कृष्ण' बल बोले उच्चैःस्वरे ॥ 205 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका शरीर प्रेममें अस्थिर हो रहा था, उनके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित हो रहे थे तथा उनके शरीरमें कम्प और पुलक हो रहा था। वे बहुत ऊँचे स्वरमें 'कृष्ण बोलो', 'कृष्ण बोलो' कह रहे थे॥ 205 ॥ महाप्रभुके श्रीकृष्णकीर्तनसे सभीके द्वारा श्रीकृष्ण-ध्वनि :– स्थावर-जङ्गम मिलि' करे कृष्णध्वनि। प्रभुर गम्भीर-स्वरे येन प्रतिध्वनि ॥ 206 ॥ अनुवाद—चल और अचल प्राणी, सभी मिलकर कृष्ण-कृष्ण कह रहे थे, मानो वे सब महाप्रभुके गम्भीर स्वरकी प्रतिध्वनि कर रहे थे॥ 206 ॥ हिरणके साथ महाप्रभुका प्रेम-क्रन्दन :– मृगेर गला धरि' प्रभु करेन रोदने। मृगेर पुलक अङ्गे, अश्रु नयने ॥ 207 ॥ अनुवाद—महाप्रभु तब हिरणोंके गलोंको पकड़कर रोने लगे। हिरणोंके अङ्ग पुलकित हो गये और उनके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित होने लगे॥ 207 ॥ । 123