भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1595

अठारहवाँ अध्याय 18/71-72 ] स्थान है। यह श्रीकृष्णकी देह स्वरूप है और इसका परिमाण पाँच योजन है। लोगोंमें इस बातका भी प्रचार है कि वृन्दावन सोलह कोस परिमाणका है।"] 'कालीयह्रद'— “कालीयह्रदपूर्वेण कदम्बो महितो द्रुमः। ततः कालीयतीर्थाख्यं तीर्थमघविनाशनम्॥ अनृत्यद्यत्र भगवान् बालः कालीय-मस्तके ॥” [अर्थात् “कालीय-ह्रदके पूर्वमें एक विशाल कदम्बका वृक्ष है। वहाँ कालीय-तीर्थ नामक एक तीर्थ है, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। यहाँ भगवान् श्रीकृष्णने अपनी बाल्य-लीला करते हुए कालीयके मस्तकपर नृत्य किया था।"] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “ए कालीय-तीर्थ पाप विनाशय। कालीय-तीर्थस्थाने बहु कार्यसिद्धि हय॥” [अर्थात् “इस कालीय-तीर्थमें स्नान करनेसे समस्त पापोंका विनाश हो जाता है। इसमें स्नान करनेसे अनेक लौकिक कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।"] 'प्रस्कन्दन'— “क्षेत्रं प्रस्कन्दनं नाम सर्वपापहरं शुभम्। तस्मिन् स्नातस्तु मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥” [अर्थात् “प्रस्कन्दन नामक क्षेत्र सभी पापोंको हरकर शुभ प्रदान करनेवाला है। इसमें स्नान करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।"] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देख 'प्रस्कन्दन'-क्षेत्र-स्नाने पाप याय। प्राणत्याग हइलेइ विष्णुलोक पाय॥ ओहे श्रीनिवास, सूर्य्यगणेर तापेते। दूरे गेल शीत, घर्म्म हइल देहेते॥ सेइ घर्म्मजल सूर्य्यकन्याय मिलिल। एइ हेतु 'प्रस्कन्दन'-नाम तीर्थ हैल॥ श्रीकृष्णचैतन्याभिन्न श्रीअद्वैत ईश्वर। कतदिन छिला एइ वनेर भितर॥” [अर्थात् “ओहे श्रीनिवास! इस 'प्रस्कन्दन'-क्षेत्रको देखो, यहाँ स्नान करनेसे पाप दूर हो जाते हैं। यहाँ कोई प्राण त्याग करता है, तो उसी समय वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। (कालीय ह्रदमें कालीय दमनके समय श्रीकृष्णको जलमें अधिक समय रहनेके कारण सर्दी लग रही थी) तब श्रीकृष्णकी सेवाके लिये सूर्य बारह कलाओंके साथ ताप देने लगे। उस तापसे श्रीकृष्णके शरीरसे शीत दूर हो गया और देहसे पसीना आने लगा। वह पसीना यमुनासे जाकर मिल गया, इस लिये इसका नाम 'प्रस्कन्दन'-तीर्थ हुआ। श्रीकृष्णचैतन्यसे अभिन्न श्रीअद्वैत प्रभु कुछ दिन तक इस वनके भीतर रहे थे।"] ॥ 71 ॥ द्वादश-आदित्यसे केशीतीर्थमें रासस्थली-दर्शनसे मूर्च्छा :- 'द्वादश-आदित्य' हैते 'केशीतीर्थे' आइला। रासस्थली देखि' प्रेमे मूर्च्छित हइला ॥ 72 ॥ अनुवाद-महाप्रभु प्रस्कन्दनमें स्नान करके 'द्वादश-आदित्य' तीर्थमें आये। वहाँसे वे केशीतीर्थपर आये और जब उन्होंने रासस्थलीको देखा तो वे प्रेमावेशमें मूर्च्छित हो गये ॥ 72 ॥ अनुभाष्य-'द्वादश-आदित्य'- “द्वादशादित्य-तीर्थाख्यं तीर्थं तदनुपावनम्। तस्य दर्शनमात्रेण नृणामघो विनश्यति ॥” [अर्थात् “द्वादश-आदित्य-तीर्थ तीर्थोंको भी पवित्र करनेवाला है। उसके दर्शनमात्रसे ही मनुष्यके पापोंका विनाश हो जाता है।"] (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “देखह द्वादशादित्य तीर्थ एइखाने॥” [अर्थात् “इस स्थानपर द्वादशादित्य तीर्थको देखो।"] 'केशीतीर्थ'-आदि-वाराहमें- “गङ्गा शतगुणं पुण्यं यत्र केशी निपातितः।” [अर्थात् “जहाँ केशी दैत्यका वध हुआ था (वह केशीतीर्थ) गङ्गासे सैंकड़ों गुणा अधिक पुण्य स्थान है।"] । 149