श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1596, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 18/72–81 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)— “केशीवध कैल कृष्ण परम-कौतुके॥” [अर्थात् “खेल-ही-खेलमें श्रीकृष्णने केशी दैत्यका वध कर दिया था।”] ॥ 72 ॥ सारा दिन प्रेमाविष्ट महाप्रभुकी पागलों जैसी चेष्टाएँ :— चेतन पाञा पुनः गड़ागड़ि याय। हासे, कान्दे, नाचे, पड़े, उच्चैःस्वरे गाय ॥ 73 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जब पुनः चेतन हुए, तब वे भूमिपर लोट-पोट खाने लगे। महाप्रभु कभी तो हँसते, कभी रोते, कभी नृत्य करते, तो कभी भूमिपर गिर पड़ते और कभी उच्चस्वरमें गाते ॥ 73 ॥ वहाँसे सन्ध्याके समय अक्रूर-तीर्थमें आकर भोजन :— एइरङ्गे सेइदिन तथा गोङाइला। सन्ध्याकाले ‘अक्रूरे आसि’ भिक्षा निर्वाहिला ॥ 74 ॥ अनुवाद—इस प्रकार वह दिन महाप्रभुने आनन्दपूर्वक केशीतीर्थमें ही व्यतीत किया। फिर सन्ध्याके समय अक्रूर-तीर्थमें आकर भोजन ग्रहण किया ॥ 74 ॥ प्रातःकालमें चीरघाटमें स्नान, इमलीतलामें विश्राम :— प्राते वृन्दावने कैला ‘चीरघाटे’ स्नान। तेँतुलि-तलाते आसि’ करिला विश्राम ॥ 75 ॥ द्वापरयुगका इमलीका वृक्ष :— कृष्णलीला-कालेर सेइ वृक्ष पुरातन। तार तले पिँड़ि-बान्धा परम-चिक्कण ॥ 76 ॥ उसके निकट ही यमुनाका प्रवाह :— निकटे यमुना बहे शीतल समीर। वृन्दावन-शोभा देखे यमुनार नीर ॥ 77 ॥ इमलीके वृक्षके नीचे बैठकर महाप्रभुका नामसङ्कीर्तन, दोपहरमें अक्रूरतीर्थमें आकर भोजन :— तेँतुल-तले बसि’ करेन नाम-सङ्कीर्त्तन। मध्याह्न करि’ आसि’ करे ‘अक्रूरे’ भोजन ॥ 78 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने अगले दिन प्रातःकाल वृन्दावनमें चीरघाटपर स्नान किया और इमलीतलामें आकर विश्राम किया। श्रीकृष्णलीलाके समयका बहुत प्राचीन वह इमलीका वृक्ष है। उस वृक्षके नीचे बहुत ही चिकना चबूतरा बना हुआ था। उसके निकट ही यमुनाजी बह रही थीं, इसलिये वहाँ शीतल वायु प्रवाहित हो रही थी। महाप्रभु वृन्दावनकी शोभा और यमुनाजीके जलका दर्शन कर रहे थे। इमलीतलापर बैठकर महाप्रभु नाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे। महाप्रभुने दोपहरके समय स्नान करनेके बाद अक्रूरतीर्थमें आकर भोजन किया ॥ 75-78 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘तेंतुलि-तलाते’—इस स्थानको अब ‘आम्लितला’ कहते हैं ॥ 75 ॥ अक्रूरतीर्थवासियोंका महाप्रभुके दर्शनके लिये आगमन और महाप्रभुके निर्जन भजनमें संख्या-नाम-कीर्तनमें बाधा :— अक्रूरेर लोक आइसे प्रभुरे देखिते। लोक-भिड़े स्वच्छन्दे नारे ‘कीर्त्तन’ करिते ॥ 79 ॥ अनुवाद—अक्रूरतीर्थमें रहनेवाले लोग महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आते, महाप्रभु लोगोंकी भीड़के कारण शान्तिसे संख्यापूर्वक नामकीर्तन नहीं कर पाते ॥ 79 ॥ महाप्रभुके द्वारा मध्याह्नतक निर्जनमें संख्या-नामकीर्तन :— वृन्दावने आसि’ प्रभु बसिया एकान्त। नामसङ्कीर्त्तन करे मध्याह्न-पर्यन्त ॥ 80 ॥ दोपहरके बाद लोगोंको महाप्रभुके दर्शनका सुयोग और महाप्रभुके द्वारा सभीको नाम-कीर्तनका उपदेश :— तृतीय-प्रहरे लोक पाय दरशन। सबारे उपदेश करे ‘नामसङ्कीर्त्तन’ ॥ 81 ॥ अनुवाद—इसी कारण महाप्रभु वृन्दावनमें आकर एकान्तमें बैठकर दोपहर तक नामसङ्कीर्तन करते। दोपहरके बाद तीसरे पहरमें लोगोंको महाप्रभुके दर्शन होते। महाप्रभु सभीको नामसङ्कीर्तनका उपदेश प्रदान करते ॥ 80–81 ॥ 150 |