भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1597

अठारहवाँ अध्याय 18/82–92 ] उस समय महाप्रभुके दर्शन करने राजपूत-कृष्णदासका आगमन :– हेनकाले आइल वैष्णव 'कृष्णदास' नाम। राजपुत-जाति, गृहस्थ, यमुना-पारे ग्राम ॥ 82 ॥ 'केशी' स्नान करि' सेइ 'कालीयदह' याइते। आम्लि-तलाय गोसाञिरे देखे आचम्बिते ॥ 83 ॥ अनुवाद—उस समय कृष्णदास नामक एक वैष्णव महाप्रभुके दर्शन करने आये। वे गृहस्थ थे और जातिसे राजपूत थे। यमुनाके पार उनका घर था। केशीघाटपर स्नान करनेके बाद कालीयदहकी ओर जाते समय उन्होंने अचानक इमलीतलामें श्रीचैतन्य महाप्रभुको देखा ॥ 82–83 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे कृष्णदासको चमत्कार :– प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हइल चमत्कार। प्रेमावेशे प्रभुरे करेन नमस्कार ॥ 84 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके सौन्दर्य और प्रेमको देखकर कृष्णदास आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने प्रेमावेशमें महाप्रभुको नमस्कार किया ॥ 84 ॥ महाप्रभुके द्वारा उसके परिचयकी जिज्ञासा और कृष्णदासके द्वारा दीनतापूर्वक अपना परिचय देना :– प्रभु कहे,—“के तुमि, काँहा तोमार घर?” कृष्णदास कहे,—“मुञि गृहस्थ पामर ॥ 85 ॥ राजपूत-जाति मुञि, ओ-पारे मोर घर। मोर इच्छा हय,—हङ वैष्णव-किङ्कर ॥ 86 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे अपने स्वप्नके दर्शनकी सफलताका वर्णन :– किन्तु आजि एक मुञि 'स्वप्न' देखिनु। सेइ स्वप्न परतेक तोमा आसिं पाइनु ॥” 87 ॥ महाप्रभुकी उसपर कृपा, कृष्णदासका प्रेम :– प्रभु ताँरे कृपा कैला आलिङ्गन करि'। प्रेमे मत्त हैल सेइ, नाचे, बोले 'हरि' ॥ 88 ॥ महाप्रभुके साथ आकर महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :– प्रभु-सङ्गे मध्याह्ने अक्रूर-तीर्थे आइला। प्रभुर अवशिष्ट पात्र-प्रसाद पाइला ॥ 89 ॥ तबसे कृष्णदास महाप्रभुके कमण्डलको वहन करनेवाला और नित्यसङ्गी हो गया :– प्राते प्रभुसङ्गे आइला जलपात्र लञा। प्रभु-सङ्गे रहे गृह-स्त्री-पुत्र छाड़िया ॥ 90 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उनसे पूछा,—“आप कौन हैं? आपका घर कहाँ है?” कृष्णदासने कहा,—“मैं एक अधम गृहस्थ हूँ। मैं जातिसे राजपूत हूँ और यमुनाके उस पार मेरा घर है। मेरी इच्छा होती है कि मैं किसी वैष्णवका दास बनूँ। आज मैंने एक स्वप्न देखा था। उस स्वप्नके अनुसार मैं यहाँ आया और आप मुझे साक्षात् मिले।” महाप्रभुने उन्हें आलिङ्गन करके उनपर कृपा की। कृष्णदास प्रेममें मत्त होकर नृत्य करते हुए 'हरि' बोलते कीर्तन करने लगे। कृष्णदास दोपहरके समय महाप्रभुके साथ अक्रूरतीर्थमें आ गये और उन्होंने महाप्रभुके अवशिष्ट प्रसादको ग्रहण किया। अगले दिन प्रातःकाल कृष्णदास महाप्रभुके साथ उनके जलके पात्रको उठाकर वृन्दावन आ गये। तबसे वे अपने घर-पत्नी-पुत्रको छोड़कर महाप्रभुके साथ रहने लगे ॥ 85–90 ॥ अनुभाष्य—'परतेक'—'प्रत्यक्ष', 'साक्षात्' ॥ 87 ॥ वृन्दावनमें श्रीकृष्णके प्रकट होनेका लोगोंका शोर :– वृन्दावने पुनः 'कृष्ण' प्रकट हइल। याँहा ताँहा लोक सब कहिते लागिल ॥ 91 ॥ अनुवाद—महाप्रभु कहीं भी जाते, सभी लोग यही बात कहते कि श्रीकृष्ण वृन्दावनमें पुनः प्रकट हुए हैं ॥ 91 ॥ एकदिन वृन्दावनसे बहुतसे लोगोंका महाप्रभुके निकट आगमन :– एकदिन अक्रूरेते लोक प्रातःकाले। वृन्दावन हैते आइसे करि कोलाहले ॥ 92 ॥ । 151