भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1598

[ 18/92-101 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-बहुतसे लोग एकदिन प्रातःकाल वृन्दावनसे जाते और सभी आकर कहते,-'हमें श्रीकृष्णके दर्शन अक्रूरतीर्थपर आकर बहुत अधिक कोलाहल करने हुए हैं।'॥96॥ लगे॥92॥ सरस्वतीके द्वारा इन वचनोंकी सत्यताका स्थापन :- महाप्रभुके द्वारा उनके आगमनके कारणकी जिज्ञासा :- प्रभु-आगे कहे लोक,-'श्रीकृष्ण देखिल।' प्रभु देखि' करिल लोक चरण वन्दन। 'सरस्वती' एइ वाक्ये 'सत्य' कहाइल॥97॥ प्रभु कहे,-"काँहा हैते करिला आगमन?"॥93॥ अनुवाद-लोग महाप्रभुके आगे आकर कहते,- अनुवाद-महाप्रभुको देखकर उन लोगोंने उनके 'हमने श्रीकृष्णको देखा है।' 'सरस्वती देवी' उनके चरणकमलोंकी वन्दना की। महाप्रभुने उनसे पूछा,- मुखसे यह सत्य वचन ही कहलवातीं॥97॥ "आप लोग कहाँसे आये हैं?"॥93॥ महाप्रभुके दर्शनसे ही लोगोंके श्रीकृष्णदर्शन 'सत्य' लोगोंके द्वारा श्रीकृष्णके प्रकट होनेका शोर; होनेपर भी वास्तवमें उनका वर्णन मूर्ख लोगोंका विवर्त्तभ्रम :- और उद्देश्य-विवर्त्तके आश्रित :- लोके कहे,-"कृष्ण प्रकट कालीयदहेर जले! महाप्रभु देखि' 'सत्य' कृष्ण-दरशन। कालीय-शिरे नृत्य करे, फणि-रत्न ज्वले॥"94॥ निज-ज्ञाने सत्य छाड़ि' 'असत्ये सत्य भ्रम'॥98॥ अनुवाद-लोगोंने कहा,-"कालीयदहके जलमें अनुवाद-यद्यपि महाप्रभुका दर्शन करके सत्य ही श्रीकृष्ण प्रकट हुए हैं! श्रीकृष्ण कालीयके सिरपर नृत्य उन्होंने श्रीकृष्णका दर्शन किया। किन्तु अपने ज्ञानके करते हैं तथा कालीयके फणोंमें स्थित मणियाँ चमकती द्वारा उन्होंने सत्यको छोड़कर असत्य वस्तुको ही सत्य हैं॥"94॥ (श्रीकृष्ण) समझा॥98॥ महाप्रभुका दर्शन ही श्रीकृष्ण-दर्शन; सरलबुद्धिवाले भट्टका विवर्त्त-भ्रम :- तथापि महाप्रभुका कौतुक-हास्य :- भट्टाचार्य तबे कहे प्रभुर चरणे। साक्षात् देखिल लोक-नाहिक संशय। "आज्ञा देह', याइ' करि कृष्ण-दरशने!"॥99॥ शुनि' हासि' कहे प्रभु,-सब 'सत्य' हय॥95॥ अनुवाद-बलभद्र भट्टाचार्यने महाप्रभुके चरणकमलोंमें अनुवाद-(महाप्रभुके दर्शनसे) लोगोंने अपनी निवेदन करते हुए कहा,-"आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आँखोंसे श्रीकृष्णको देखा है, इसमें संशयकी कोई बात भी जाकर श्रीकृष्णका दर्शन करूँ॥"99॥ नहीं है। उनकी बात सुनकर मुस्कराते हुए महाप्रभुने महाप्रभुके द्वारा उसके भ्रमको दूर करना :- कहा,-सब कुछ 'सत्य' है॥95॥ तबे ताँरे कहे प्रभु चापड़ मारिया। तीन दिन तक सभीके द्वारा श्रीकृष्णके "मूर्खेर वाक्ये 'मूर्ख' हैला पण्डित हञा॥100॥ दर्शन होनेका वर्णन :- स्वयं श्रीकृष्ण होनेपर भी भट्टसे आत्म-गोपन, फिर भी एइमत तिन रात्रि लोकेर गमन। सरल बुद्धि भट्टका विवर्त्तके मुखसे उद्धार :- सबे आसि' कहे,-'कृष्ण पाइलूँ दरशन॥'96॥ कृष्ण केने दरशन दिबेन कलिक़ाले? अनुवाद-इस प्रकार तीन रात तक लोग कालीय-ह्रद निज-भ्रमे मूर्ख लोक करे कोलाहले॥101॥ 152 ।