श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय [ 18/100-110 ] माया-मुग्धकी अचिद्में चिद्बुद्धि अथवा चिद्का आरोप करनेवाले मूर्ख विवर्त्तवादी ही 'पागल' :- 'वातुल' ना हइओ, घरे बहुत बसिया। 'कृष्ण' दरशन करिह कालि रात्र्ये याञा ॥" 102 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कृपा करते हुए उसे थप्पड़ मारकर कहा,—“पण्डित होकर भी मूर्खोंकी बातें सुनकर तुम भी मूर्ख बन गये। श्रीकृष्ण कलियुगमें दर्शन क्यों देंगे ? अपने भ्रमके कारण ही मूर्ख लोग शोर मचाते हैं। पागल मत बनो, घरपर ही बैठे रहो। कल रातको जाकर श्रीकृष्णके दर्शन करना ॥” 100-102 ॥ प्रातःकालमें वहाँ आये शिष्ट लोगोंसे श्रीकृष्णके दर्शनके विषयमें पूछना :- प्रातःकाले भव्य-लोक प्रभु-स्थाने आइला। “कृष्ण देखि' आइला?”-प्रभु ताँहारे पुछिला ॥ 103 ॥ अनुवाद—अगले दिन प्रातःकाल कुछ सभ्य लोग महाप्रभुके पास आये। महाप्रभुने उनसे पूछा, —“क्या आप लोग श्रीकृष्णके दर्शन करके आये हैं?” ॥ 103 ॥ उन लोगोंके द्वारा वास्तविक बात बतलाना :- लोक कहे,—“रात्र्ये कैवर्त्य नौकाते चड़िया। कालीयदहे मत्स्य मारे, देउटी ज्वालिया ॥ 104 ॥ दूर हैते ताहा देखि' लोकेर हय भ्रम। 'कालीयेर शरीरे कृष्ण करिछे नर्त्तन ॥' 105 ॥ मूर्ख लोगोंकी विपरीत बुद्धि :- नौकाते कालीय-ज्ञान, दीपे रत्न-ज्ञाने! जालियारे मूढ़-लोक 'कृष्ण' करि' माने ! !” ॥ 106 ॥ अनुवाद—उन लोगोंने कहा,—“रातके समय मछुवारा नौकामें बैठकर लालटेन जलाकर कालीयदहपर मछलियोंको पकड़ता है। दूरसे उसीको देखकर लोगोंको भ्रम होता है कि कालीयके सिरके ऊपर श्रीकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। नौकाको कालीय, दीपकको मणि तथा मछुवारेको मूर्ख लोग श्रीकृष्ण मानते हैं!” ॥ 104-106 ॥ पक्षान्तरमें लोगोंके शोर और लोगोंके श्रीकृष्ण-दर्शनकी क्रियाकी भी सत्यता :- वृन्दावने 'कृष्ण' आइला,—सेह 'सत्य' हय। कृष्णरे देखिल लोक,—इहा 'मिथ्या' नय ॥ 107 ॥ किन्तु वास्तवमें प्रतीतिकी विचित्रतामें ही विपरीत भ्रमका उदय :- किन्तु काहाँ 'कृष्ण' देखे, काहाँ 'भ्रम' माने। स्थाणु-पुरुषे यैछे विपरीत-ज्ञाने ॥ 108 ॥ अनुवाद—[श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी कह रहे हैं कि] वृन्दावनमें 'श्रीकृष्ण' आये हैं,—यह 'सत्य' ही है। लोगोंने श्रीकृष्णको देखा है,—यह बात भी 'मिथ्या' नहीं है। किन्तु उन्होंने जहाँ श्रीकृष्णके दर्शन किये हैं, वही उनकी भूल है। कभी ठूंठको देखकर जैसे उसे मनुष्य समझ लिया जाता है, उसी प्रकार लोगोंको भी भ्रम हुआ है ॥ 107-108 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'स्थाणु'—पत्तोंके बिना सूखा वृक्ष। कुछ दूरसे पत्तोंसे रहित वृक्षको देखकर 'एक पुरुष आ रहा है' ऐसा विपरीत ज्ञान होता है। व्रजवासियोंका भी उसी प्रकार मछुवारेकी नौकाको कालीय समझनेका, उसके ऊपर लगे हुए दीपकको रत्न समझनेका तथा मछली पकड़नेवाले मछुवारेको श्रीकृष्ण समझनेका 'भ्रम' उदित हुआ था ॥ 108 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णके दर्शनकी प्राप्तिके संवादकी जिज्ञासा; महाप्रभुके दर्शनसे सुकृति-प्राप्त लोगोंकी उनके प्रति श्रीनारायण-बुद्धि :- प्रभु कहे,—“काँहा पाइला 'कृष्ण-दरशन' ?” लोक कहे,—“संन्यासी तुमि जङ्गम-नारायण ॥ 109 ॥ वृन्दावने हइला तुमि कृष्ण-अवतार। तोमा देखि' सर्वलोक हइल निस्तार ॥” 110 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,—“आपको श्रीकृष्णके दर्शन कहाँपर हुए?” लोगोंने कहा,—“संन्यासी होनेके कारण आप ही चलते-फिरते श्रीनारायण (जङ्गम-श्रीनारायण) । 153