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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1600

[ 18/109-114 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

हैं। आप ही वृन्दावनमें श्रीकृष्णके अवतार हैं। आपको देखकर सभी लोगोंकी मुक्ति हो गयी है॥" 109-110 ॥

अनुभाष्य- 'जङ्गम-नारायण'- चलनेकी शक्तिसे युक्त नारायण; "दण्डग्रहण-मात्रेण नरो नारायणो भवेत्" [संन्यास दण्ड ग्रहण करने मात्रसे मनुष्य श्रीनारायण हो जाता है]। दण्डधारियोंको केवलाद्वैतमायावादी लोग "ॐ नमो नारायणाय" कहकर बातचीत करते हैं। किन्तु जीव,-मुक्त और बद्ध, सभी अवस्थाओंमें ही मायाधीश परमेश्वर श्रीनारायणके 'नित्य-अधीन' हैं और कभी भी उन्हें श्रीनारायण कहकर नहीं बुलाया जा सकता। जो जीवको विष्णुके साथ समान या एक कहते हैं अथवा वैसा समझते हैं, वे मायावादी [विष्णुके चरणोंमें] अपराधी हैं॥ 109 ॥

महाप्रभुकी लोकशिक्षा,-जीव 'श्रीकृष्ण' नहीं है, इसलिये जीवको श्रीकृष्ण समझना निषिद्ध है :- प्रभु कहे, —" 'विष्णु', 'विष्णु' इहा ना कहिबा ! जीवधमे 'कृष्ण'-ज्ञान कभु ना करिबा ! ! 111 ॥

जीव और श्रीकृष्णमें भेद-वर्णन :- संन्यासी-चित्कण जीव, किरण-कण-सम। षडैश्वर्यपूर्ण कृष्ण हय सूर्योपम ॥ 112 ॥ जीव, ईश्वर-तत्त्व-कभु নহে 'सम'। ज्वलदग्निराशि यैछे स्फुलिङ्गेर 'कण' ॥ 113 ॥

अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - " 'विष्णु'! 'विष्णु'! ऐसा मत कहिये ! अधम जीवको कभी भी श्रीकृष्ण मत समझना ! संन्यासी भी एक चित्कण जीव है। षडैश्वर्यपूर्ण श्रीकृष्ण सूर्यके समान हैं और जीव उनकी किरणके कणके समान है। जीव और ईश्वर-तत्त्व कभी भी एक समान नहीं हो सकते। जैसे जलती हुई अग्नि और उसकी चिङ्गारीका कण एक समान नहीं हो सकते ॥ 111-113 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य-मायावादी संन्यासी स्वयंको 'ब्रह्म' कहकर, मुखसे 'नारायण' 'नारायण' कहते हैं। स्मार्ट्प्रथामें गृहस्थ-ब्राह्मणादि सभी उस संन्यासीको देखनेपर उसे 'श्रीनारायण' मानकर प्रणाम करते हैं। इस भ्रम-प्रथाको रोकनेके लिये महाप्रभुने कहा, संन्यासी जीवके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं; वे कभी भी षडैश्वर्यपूर्ण श्रीकृष्णरूपी सूर्यके समान नहीं हो सकते। वे चित्कण-मात्र हैं, इसलिये, जीव श्रीकृष्णरूपी सूर्यकी किरण-कणके समान हैं; उनको कभी भी 'श्रीनारायण' कहकर प्रणाम करना उचित नहीं है॥ 112 ॥

अनुभाष्य-आदिलीला 2/96 संख्या देखें ॥ 111-113 ॥

श्रीकृष्ण-'ईश्वर', जीव-उनके 'वशीभूत' :- भगवत्सन्दर्भमें उद्धृत सर्वज्ञसूक्त-वाक्य अथवा भाः 1/7/6 श्लोककी टीकामें श्रीधर स्वामीके द्वारा उद्धृत श्रीविष्णुस्वामि-वाक्य :- ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द ईश्वरः । स्वाविद्या-संवृतो जीवः संक्लेशनिकराकरः ॥ 114 ॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 114 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य-ईश्वर-सदैव सच्चिदानन्द और 'ह्लादिनी' एवं 'सम्वित्'-शक्तिके द्वारा आश्लिष्ट (आलिङ्गित) हैं; किन्तु जीव सर्वदा ही अपनी (आरोपित) अविद्याके द्वारा पूरा ढका हुआ है, इसलिये वह सब प्रकारके क्लेशोंका उद्गम-स्थल है॥ 114 ॥

अनुभाष्य- ईश्वरः (श्रीकृष्णः) सच्चिदानन्दः (सन्धिनीसम्वित्- ह्लादिनी-शक्तिमान्) ह्लादिन्या (यया खलु भगवान् स्वरूपानन्दविशेषी भवति, ययैव तं तमानन्दमन्यानप्यनुभावयति, सा ह्लादिनी शक्तिः तया) संविदा (अद्वयज्ञानस्वरूपभूतया चिच्छक्त्या) आश्लिष्टः (आलिङ्गितः); जीवः तु स्वाविद्यासंवृतः (स्वस्य आत्मनः भगवतः बद्धजीवमोहिन्या अविद्यया मायया शक्त्या सम्यक् आवृतः सन्) संक्लेशनिकराकरः (संक्लेशाः तु त्रिविधाः- "क्लेशास्तु पापं तद्बीजमविद्या चेति ते त्रिधा" इति न्यायात्, तेषां निकरस्य पुञ्जस्य आकरः खनिः)।

श्लोक-भावानुवाद-सन्धिनी-सम्वित्-ह्लादिनी-शक्तिमान् श्रीकृष्ण अपनी स्वरूपशक्तिकी विशेष वृत्ति आनन्दस्वरूपा 'ह्लादिनी' जो उन्हें आनन्द प्रदान करती है और

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