श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1602, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 18/116-123 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— यः (भाग्यहीनो जनः) तु (गर्हणार्थे) देवं नारायणं (ब्रह्मरुद्रोपास्यं तयोरीश्वरं भगवन्तं विष्णुं) ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः (चतुर्मुख-पञ्चमुखादि- नारायणदासभूतैः देवैः जीवरूपैः सह) समत्वेन (नित्यप्रभुणा सह देवाख्यनित्यदासैः समानतया) वीक्षेत (पश्येत्) सः ध्रुवं (निश्चितम् एव) 'पाषण्डी' भवेत्—“अर्च्ये विष्णौ शिलाधीर्गुरुषु नरमतिर्वैष्णवे जातिबुद्धिर्विष्णोर्वा वैष्णवानां कलिमलमथने पादतीर्थेऽम्बु बुद्धिः। श्रीविष्णोर्नाम्नि मन्त्रे सकल-कलुषहे शब्द- सामान्यबुद्धिर्विष्णौ सर्वेश्व रेशे तदितरसमधीर्यस्य वा नारकी सः।” इति पद्मपुराणवचनात्। श्लोक-भावानुवाद—जो [निन्दाके अर्थमें-] भाग्यहीन लोग ब्रह्म-रुद्रके उपास्य और उनके अधीश्वर भगवान् विष्णुको जीवरूप चतुर्मुख-पञ्चमुखादि नारायणदास देवताओंके साथ समान अर्थात् नित्यप्रभुके साथ उनके नित्यदास देवोंको समान देखता है, वह निश्चित ही 'पाखण्डी' होता है। पद्मपुराणवचन,—“जो व्यक्ति श्रीमूर्तिमें शिला बुद्धि, वैष्णव और गुरुदेवमें मरणशील मानव बुद्धि, वैष्णवोंमें जाति बुद्धि, विष्णु और वैष्णवोंके चरण धौतजलमें जल बुद्धि तथा सर्वपाप नाशक विष्णूनाम, मन्त्रमें सामान्य शब्द बुद्धि एवं सर्वेश्वर विष्णुको अन्य देवताओंके साथ समान बुद्धि रखता है, वह नारकीय है।”॥ 116॥ लोगोंका महाप्रभुके 'श्रीकृष्ण' होनेका दृढ़ विश्वास और स्तुति :- लोक कहे,—“तोमाते कभु नहे ‘जीव’-मति। कृष्णेर सदृश तोमार आकृति-प्रकृति ॥ 117 ॥ ‘आकृत्ये’ तोमारे देखि' ‘व्रजेन्द्रनन्दन’। देहकान्ति पीताम्बर कैल आच्छादन ॥ 118 ॥ प्रियभक्तोंके सामने भगवद्-स्वरूपका स्वतःप्रकाश :- मृगमद वस्त्रे बान्धे, तबु ना लुकाय। ‘ईश्वर-स्वभाव’ तोमार ढाका नाहि याय ॥ 119 ॥ अनुवाद—लोगोंने कहा,—“आपको कोई भी 'जीव' नहीं मान सकता, क्योंकि आपकी आकृति तथा प्रकृति सभी प्रकारसे श्रीकृष्णके समान ही है। यद्यपि पीतवर्णने आपकी अपनी उस श्यामल कान्तिको ढक रखा है, तथापि 'आकृति'से हम आपको साक्षात् 'व्रजेन्द्रनन्दन' ही देख रहे हैं। जैसे कस्तूरीको वस्त्रमें बाँधकर रखनेपर भी उसकी गन्धको छिपाया नहीं जा सकता, वैसे ही आपका 'ईश्वर-स्वभाव' छिपानेपर भी छिपाया नहीं जा सकता॥ 117-119 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/85-89 संख्या देखें। जिस प्रकार कस्तूरीके वस्त्रमें बँधे होनेपर भी उसकी गन्ध सभी दिशाओंमें फैल जाती है, उसी प्रकार आपके द्वारा भक्तजीवरूपी आवरणसे अपनेको गोपन करनेपर भी आपका भगवत् स्वभाव छिपता नहीं है॥ 119 ॥ अधोक्षज होनेपर भी जगत्के आकर्षक :- अलौकिक ‘प्रकृति’ तोमार—बुद्धि-अगोचर। तोमा देखि' कृष्णप्रेमे जगत् पागल ॥ 120 ॥ अनुवाद—आपकी अलौकिक 'प्रकृति' हमारी बुद्धिके अगोचर है। आपका दर्शन करके समस्त जगत् श्रीकृष्णप्रेममें पागल हो रहा है॥ 120 ॥ भगवद्दर्शन अथवा शुद्धनाम-श्रवणमात्रसे बालक-वृद्ध-स्त्री, यहाँ तक कि अन्त्यज्य भी 'आचार्य' बनकर जगत्का उद्धार करनेमें समर्थ :- स्त्री-बाल-वृद्ध, आर ‘चण्डाल’, ‘यवन’। येइ तोमार एकबार पाय दरशन ॥ 121 ॥ कृष्णनाम लय, नाचे हञा उन्मत्त। आचार्य हइल सेइ, तारिल जगत ॥ 122 ॥ अनुवाद—स्त्री, बालक, वृद्ध और यहाँ तक कि 'चण्डाल' और 'यवन'—जो कोई एकबार भी आपका दर्शन करता है, वह श्रीकृष्ण नामका कीर्तन करता है, उन्मत्त होकर नृत्य करता है तथा आचार्य बनकर जगत्का उद्धार करता है॥ 121-122 ॥ दर्शनेर कार्य आछुक, ये तोमार ‘नाम’ शुने। सेइ कृष्णप्रेमे मत्त, तारे त्रिभुवने ॥ 123 ॥ 156 ।