भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1603

अठारहवाँ अध्याय 18/123-130 ] तोमार नाम शुनि' हय श्वपच 'पावन'। अलौकिक शक्ति तोमार ना याय कथन ॥ 124 ॥ अनुवाद-दर्शनकी तो बात दूर रहे, जो कोई आपका 'नाम' भी सुनता है, वही श्रीकृष्णप्रेममें मत्त होकर त्रिभुवनको तार देता है। आपके नामको सुनकर कुत्तेके माँसको खानेवाला भी 'पवित्र' हो जाता है। आपकी अलौकिक शक्तिका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 123-124 ॥ श्रीमद्भागवत (3/33/6) में :- यन्नामधेय-श्रवणानुकीर्त्तनाद्- यत्प्रह्वणाद्यत्स्मरणादपि क्वचित्। श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात् ॥ 125 ॥ अनुवाद-हे भगवन्, जिनके नाम श्रवण, अनुकीर्तन, प्रणाम और स्मरण करने मात्रसे चण्डाल और यवन कुलमें जन्मा व्यक्ति भी तत्क्षणात् सवन-यज्ञ (सोमयज्ञ) करनेके योग्य हो जाता है, ऐसे वे प्रभु आप हैं, आपके दर्शनसे क्या नहीं हो सकता ? ॥ 125 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 16/186 संख्या देखें ॥ 125 ॥ उक्त समस्त ही महाप्रभुके 'तटस्थ' लक्षण, स्वरूपतः महाप्रभु-साक्षात् स्वयंरूप श्रीकृष्ण :- एइत' महिमा-तोमार 'तटस्थ'-लक्षण। 'स्वरूप'-लक्षणे तुमि-व्रजेन्द्रनन्दन ॥"126 ॥ अनुवाद-यह महिमा तो आपका 'तटस्थ'-लक्षण है, 'स्वरूप'-लक्षण तो आपका व्रजेन्द्रनन्दन होना है॥"126 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अन्य वस्तुके साथ तुलना नहीं करके जिन 'स्वतःसिद्ध-लक्षणों'से वस्तु परिचित होती है, वही उसके 'स्वरूप'-लक्षण हैं। अन्य वस्तुके साथ तुलना करके जिन लक्षणोंसे वस्तुका अपना परिचय साधित होता है, उन लक्षणोंको 'तटस्थ' कहते हैं। पूर्वोक्त महिमासमूहने तटस्थ लक्षणके रूपमें ही आपको 'व्रजेन्द्रनन्दन' कहकर स्थिर किया है। पुनः आपको देखनेमात्रसे ही 'व्रजेन्द्रनन्दन'के रूपमें जो बोध उदित होता है, यही आपका 'स्वरूप'-लक्षण है; स्वरूप-लक्षणके द्वारा ही आपको 'श्रीकृष्ण' कहकर स्थिर किया है॥ 126 ॥ सभीपर ही महाप्रभुकी कृपा; उनका अपने घर जाना :- सेइ सब लोके प्रभु प्रसाद करिल। कृष्णप्रेमे मत्त लोक निज घरे गेल ॥ 127 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने उन सब लोगोंपर कृपा की। वे लोग श्रीकृष्णप्रेममें मत्त हो गये और अन्तमें अपने घरोंमें लौट गये ॥ 127 ॥ अक्रूरतीर्थमें रहकर लोगोंका उद्धार :- एइमत कतदिन 'अक्रूरे' रहिला। कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोक निस्तारिला ॥ 128 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु कुछ दिन तक अक्रूरतीर्थमें रहे। वहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण-नाम और प्रेम प्रदान करके लोगोंका उद्धार किया ॥ 128 ॥ सनोड़िया-विप्रका मथुरामें सभी सज्जनोंको ही महाप्रभुकी सेवाका सुयोग प्रदान करके उनका उद्धार करना :- माधवपुरीर शिष्य सेइत' ब्राह्मण। मथुरार घरे-घरे करा'न निमन्त्रण ॥ 129 ॥ मथुरार यत लोक ब्राह्मण-सज्जन। भट्टाचार्य-स्थाने आसि' करे निमन्त्रण ॥ 130 ॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य वे सनोड़िया ब्राह्मण मथुराके घर-घरमें जाकर उन्हें महाप्रभुको निमन्त्रण करनेके लिये उत्साहित कर रहे थे। मथुराके जितने भी सज्जन ब्राह्मण थे, वे सभी बलभद्र भट्टाचार्यके पास आकर महाप्रभुके लिये निमन्त्रण देने लगे ॥ 129-130 ॥ अनुभाष्य-'सेइत' ब्राह्मण'-सनोड़िया (मध्यलीला 17/179 संख्या देखें) ॥ 129 ॥ । 157