श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1604, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 18/131-138 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला एकसाथ बहुतसे व्यक्तियोंके द्वारा निमन्त्रण करनेपर भी, भट्टके द्वारा एक-एक व्यक्तिका ही निमन्त्रण-स्वीकार :- एकदिन 'दश' 'बिश' आइसे निमन्त्रण। भट्टाचार्य एकेर मात्र करेन ग्रहण ॥ 131 ॥ अनुवाद-एक ही दिनमें दस-बीस निमन्त्रण आने लगे, परन्तु बलभद्र भट्टाचार्य केवल किसी एकके ही निमन्त्रणको स्वीकार करते ॥ 131 ॥ सभीके द्वारा एक ही साथ महाप्रभुको भिक्षा देनेकी इच्छा करनेके कारण लोगोंके लिये महाप्रभुकी सेवाके अवसरका अभाव :- अवसर ना पाय लोक निमन्त्रण दिते। सेइ विप्र साधे लोक निमन्त्रण निते ॥ 132 ॥ अनुवाद-क्योंकि सभी लोगोंको महाप्रभुको निमन्त्रण करनेका अवसर ही प्राप्त नहीं हो रहा था, इसलिये वे सनोड़िया ब्राह्मणसे ही निवेदन करते कि महाप्रभु उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लें ॥ 132 ॥ वैदिक सद्ब्राह्मणोंका दीनतापूर्वक महाप्रभुको निमन्त्रण :- कान्यकुब्ज-दाक्षिणात्येर वैदिक ब्राह्मण। दैन्य करि', करे, महाप्रभुर निमन्त्रण ॥ 133 ॥ अक्रूरतीर्थमें आकर स्वयं ही रसोई बनाकर महाप्रभुको भिक्षा-दान :- प्रातःकाले अक्रूरे आसि' रन्धन करिया। प्रभुरे भिक्षा देन शालग्रामे समर्पिया ॥ 134 ॥ अनुवाद-कान्यकुब्ज, दक्षिण-भारत आदि स्थानोंके वैदिक ब्राह्मणोंने अत्यधिक दीनतापूर्वक महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। वे ब्राह्मण प्रातःकालमें अक्रूरतीर्थ आकर रसोई बनाते और शालग्रामको भोग समर्पित करके उसे महाप्रभुको समर्पित करते ॥ 133-134 ॥ अनुभाष्य-'कान्यकुब्ज', 'सारस्वत', 'गौड़', 'मैथिल' और 'उत्कल' - ये पाँच गौड़-ब्राह्मण एवं 'आन्ध्र', 'कर्णाट', 'गुर्जर', 'द्राविड़' और 'महाराष्ट्र दक्षिण-भारतके ब्राह्मण, - इन दस प्रकारके वैदिक शुद्ध ब्राह्मण, जो वैदिक आचारका पूर्णरूपसे पालन करते थे अर्थात् तान्त्रिक-दुराचारके द्वारा जिन्होंने अपने वैदिक अनुष्ठानका त्याग नहीं किया, सभीने दैन्यपूर्वक महाप्रभुको निमन्त्रण किया था ॥ 133 ॥ महाप्रभुके द्वारा अक्रूर घाटपर बैठकर ऐश्वर्य-पूजक अक्रूरके और माधुर्य-सेवक व्रजवासियोंके अपने-अपने अधिकारसे धाम दर्शनका विचार :- एकदिन सेइ अक्रूर-घाटेर उपरे। बसि' महाप्रभु किछु करेन विचारे ॥ 135 ॥ 'एइ घाटे अक्रूर वैकुण्ठ देखिल। व्रजवासी लोक 'गोलोक' दर्शन कैल ॥' 136 ॥ अनुवाद-एकदिन उस अक्रूर घाटपर बैठकर महाप्रभु कुछ विचार कर रहे थे, - 'इसी घाटपर अक्रूरने वैकुण्ठका दर्शन किया था और यहींपर व्रजवासी लोगोंने 'गोलोक'का दर्शन किया था ॥ 135-136 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अक्रूरघाट'- वृन्दावन और मथुराके बीचमें आधे रास्तेपर यह घाट है। यहाँ रथको खड़ा करके अक्रूरने श्रीबलराम-कृष्णको साथ लेकर यमुना-स्नान किया था। स्नानके समय अक्रूरने जलमें 'वैकुण्ठ'का दर्शन किया था एवं व्रजवासी लोगोंने उस घाटके जलमें गोलोकका दर्शन किया था ॥ 135 ॥ महाप्रभुके द्वारा जलमें कूदना और डूबना :- एत बलि' झाँप दिला जलेर उपरे। डुबिया रहिला प्रभु जलेर भितरे ॥ 137 ॥ अनुवाद-अक्रूर कैसे जलमें रहे, यह विचार करते हुए महाप्रभुने जलमें छलाँग लगा दी और वे जलके अन्दर ही डूबे रहे ॥ 137 ॥ कृष्णदासके रोने-चिल्लानेको सुनकर भट्टके द्वारा उसी समय आकर महाप्रभुको निकालना :- देखि' कृष्णदास कान्दि' फुकार करिल। भट्टाचार्य शीघ्र आसि' प्रभुरे उठाइल ॥ 138 ॥ 158 ।