श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1605, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय 18/138-147 ] अनुवाद-ऐसा देखकर कृष्णदास रोते-रोते बहुत जोरसे सहायताके लिये पुकारने लगे। बलभद्र भट्टाचार्यने जल्दीसे आकर महाप्रभुको बाहर निकाला ॥ 138 ॥ भट्ट और ब्राह्मणका परामर्श :- तबे भट्टाचार्य सेइ ब्राह्मणे लञा। युक्ति करिला किछु निभृते बसिया ॥ 139 ॥ “आजि आमि आछिलाङ, उठाइलूँ प्रभुरे। वृन्दावने डुबेन यदि, के उठाबे ताँरे ? ॥ 140 ॥ लोगोंकी भीड़, भिक्षाकी परेशानी और महाप्रभुके सदैव प्रेमावेशसे भयभीत भट्टकी वृन्दावनसे महाप्रभुको अन्य स्थानपर ले जानेकी इच्छा :- लोकेर संघट्ट, आर निमन्त्रणेर जञ्जाल। निरन्तर आवेश प्रभुर, – ना देखिये भाल ॥ 141 ॥ वृन्दावन हैते यदि प्रभुरे काड़िये। तबे मङ्गल हय, – एइ भाल युक्ति हय ॥” 142 ॥ अनुवाद-तब बलभद्र भट्टाचार्यने सनोड़िया ब्राह्मणको अपने साथ लेकर एकान्तमें बैठकर कुछ विचार-विमर्श किया,–“आज तो मैं यहाँ था, मैंने महाप्रभुको जलसे बाहर निकाल लिया। यदि वे वृन्दावनमें डूबने लगें, वहाँ उन्हें कौन बाहर निकालेगा ? वैसे भी यहाँ लोगोंकी इतनी भीड़ है और उसपर निमन्त्रणका जञ्जाल है। साथमें महाप्रभु भी निरन्तर आवेशमें रहते हैं। मुझे यहाँकी स्थिति अच्छी नहीं लग रही है। यदि महाप्रभुको वृन्दावनसे बाहर ले जा सकें, तभी अच्छा होगा। मुझे तो यही उचित लग रहा है॥” 139-142 ॥ अनुभाष्य- 'काड़िये'-ले जाँय ॥ 142 ॥ ब्राह्मणके द्वारा माघस्नानके उपलक्ष्यमें गङ्गा तटके पथसे प्रयागमें ले जानेका परामर्श :- विप्र कहे, – “प्रयागे प्रभु लञा याइ। गङ्गातीर-पथे याइ, तबे सुख पाइ ॥ 143 ॥ 'सोरोक्षेत्रे' आगे याञा करि' गङ्गास्नान। सेइ पथे प्रभु लञा करिये पयान ॥ 144 ॥ माघ-मास लागिल, एबे यदि याइये। मकरे प्रयाग-स्नान कत दिन पाइये ॥ 145 ॥ अपने दुःखका निवेदन और सामयिक परामर्श देना :- आपनार दुःख किछु करि' निवेदन। 'मकरे' पँछिते प्रयागे करिह सूचन ॥ 146 ॥ महाप्रभुसे भट्टके द्वारा भिक्षाके लिये अनुरोध करनेवालोंकी असुविधाका वर्णन करनेके बाद माघ-स्नानके लिये प्रयागमें जानेका अनुरोध :- गङ्गातीर-पथे सुख जानाइह ताँरे।” भट्टाचार्य आसि' तबे कहिल प्रभुरे ॥ 147 ॥ अनुवाद-सनोड़िया ब्राह्मणने कहा, – “मेरा विचार है कि महाप्रभुको प्रयागमें ले चलें। यदि गङ्गातटवाले मार्गसे जायेंगे, तो उसमें बड़ा आनन्द होगा। पहले 'सोरोक्षेत्र'में जाकर गङ्गास्नान करके उसी मार्गसे महाप्रभुको लेकर आगे बढ़ेंगे। माघ-मास अभी आरम्भ हुआ है, यदि अभी यहाँसे जायेंगे, तो प्रयागमें मकर-सक्रान्तिके समय कुछ दिनके लिये वहाँ स्नान कर सकेंगे। आप महाप्रभुसे अपने दुःखका भी निवेदन करना और कहना कि यदि अभी चलेंगे तो हम लोग माघी-पूर्णिमा तक प्रयाग पहुँच जायेंगे। आप महाप्रभुसे कहना कि गङ्गातटवाले पथसे जानेपर यात्रा सुखप्रद होगी।” तब बलभद्र भट्टाचार्यने आकर महाप्रभुसे कहा, – ॥ 143-147 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'सोरोक्षेत्रे' - मथुरासे सबसे निकटवर्ती गङ्गा-तटपर ही 'सोरोक्षेत्र' है ॥ 144 ॥ अनुभाष्य - कर्मनिष्ठ व्यक्तियोंके लिये माघमासमें प्रयाग-स्नान विशेष फल प्रदान करनेवाला है; “माघे मासि गमिष्यन्ति गङ्गायामुनसङ्गमम्। गवां शतसहस्रस्य सम्यक् दत्तञ्च यत्फलम्। प्रयागे माघमासे वै त्र्यहं स्नातस्य तत्फलम् ॥” [अर्थात् “यदि कोई प्रयागमें जाकर गङ्गा-यमुनाके सङ्गमपर माघ-मासमें स्नान करता है, तो उसे लाखों गौओंके दानका फल प्राप्त होता है। केवल तीन दिन वहाँ स्नान करनेसे उसे इतना पुण्य प्राप्त होता है।”] । 159