श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1606, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 18/145-157 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला एवं “तुमि आमाय आनि' देखाइला वृन्दावन। “सर्वाधिकारितां माघस्नानस्य व्रतता यतः” एइ 'ऋण' आमि नारिब करिते शोधन ॥ 153॥ अर्थात् “माघस्नानके व्रतका सबसे अधिक ये तोमार इच्छा, आमि सेइत करिब। फल होता है” याँहा लञा याह तुमि, ताँहाइ याइब ॥ ” 154 ॥ आदि व्यवस्था देखी जाती है॥145॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभुकी वृन्दावनको छोड़कर “सहिते ना पारि आमि लोकेर गड़बड़ि। जानेकी बिलकुल भी इच्छा नहीं थी, तथापि भक्तकी निमन्त्रण लागि' लोक करे हड़ाहूड़ि ॥ 148 ॥ इच्छाको पूर्ण करनेके लिये उन्होंने मधुर वचन कहे,—“अपने साथ लाकर तुमने मुझे वृन्दावनके दर्शन प्रातःकाले आइसे लोक, तोमारे ना पाय। कराये हैं, मैं तुम्हारे इस 'ऋण'को कभी भी नहीं चुका तोमारे ना पाञा लोक मोर माथा खाय ॥ 149॥ पाऊँगा। तुम्हारी जैसी इच्छा है, मैं वैसा ही करूँगा। तबे सुख हय यबे गङ्गापथे याइये। तुम मुझे जहाँ ले जाओगे, मैं वहीं जाऊँगा॥”152-154॥ एबे यदि याइ, 'मकरे' गङ्गास्नान पाइये ॥ 150 ॥ प्रातः स्नानके बाद भावि-विच्छेदके स्मरणसे प्रेमावेश :- उद्विग्न हइल प्राण, सहिते ना पारि। प्रातःकाले महाप्रभु प्रातःस्नान कैल। प्रभुर ये आज्ञा हय, सेइ शिरे धरि ॥”151 ॥ 'वृन्दावन छाड़िब' जानि' प्रेमावेश हैल ॥ 155 ॥ अनुवाद—“लोगोंकी भीड़ आकर जो गड़बड़ी करती अनुवाद-अगले दिन महाप्रभुने प्रातःकालमें उठकर है, मुझसे वह सहन नहीं होती। निमन्त्रण देनेके लिये स्नान किया। 'वृन्दावनको छोड़कर जाऊँगा'-यह सोचकर लोग एकके बाद एक आते रहते हैं। वे लोग ही वे प्रेमाविष्ट हो गये॥155॥ प्रातःकालमें ही आ जाते हैं, जब आप यहाँ नहीं होते। महाप्रभुको गोकुल जानेके लिये नौकामें और आपको नहीं पाकर लोग मेरा दिमाग खाते हैं। बैठाकर दूसरी पार गमन :- मुझे तो तभी प्रसन्नता होगी, जब हम यहाँसे चलें और बाह्य विकार नाहि, प्रेमाविष्ट मन। गङ्गातटके मार्गसे जाँय। यदि हम अभी जायँगे, तब हम भट्टाचार्य कहे,—चल, याइ महावन ॥ 156 ॥ मकर-सक्रान्तिमें प्रयागमें गङ्गास्नान कर पायेंगे। मेरा मन बहुत उद्विग्न हो रहा है और मैं इसे सहन नहीं एत बलि' महाप्रभुरे नौकाय बसाञा। कर पा रहा हूँ, परन्तु आपकी जो आज्ञा होगी, मैं पार करि' भट्टाचार्य चलिला लञा ॥ 157 ॥ उसीको शिरोधार्य करूँगा॥”147-151॥ अनुवाद-बाहरसे महाप्रभुमें कोई विकार दिखायी अनुभाष्य- 'गड़बड़ि'-लोगोंके आने-जानेसे होनेवाली नहीं दे रहा था, परन्तु उनका मन प्रेममें आविष्ट था। गड़बड़ी ॥ 148 ॥ बलभद्र भट्टाचार्यने महाप्रभुसे कहा,—चलिये, हम लोग वृन्दावनको छोड़नेकी इच्छा नहीं होनेपर भी भट्टकी महावन चलें। यह कहकर बलभद्र भट्टाचार्यने महाप्रभुको इच्छाकी पूर्ति और भट्टकी प्रशंसा :- नौकामें बैठाया। नदी पार करनेके बाद वे महाप्रभुको यद्यपि वृन्दावन-त्यागे नाहि प्रभुर मन। साथ लेकर चल पड़े॥ 156-157॥ भक्त-इच्छा पूरिते कहे मधुर वचन ॥ 152 ॥ अनुभाष्य-'महावन'-गोकुल ॥ 156 ॥ 160 |