भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1608, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1608

[ 18/167-176 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—कृष्णदास तो राजपूत होनेके कारण बिलकुल निडर थे। सनोड़िया ब्राह्मण भी निडर और बोलनेमें निपुण थे॥ 167 ॥ अनुभाष्य—'मुखे बड़ दड़'—अति निपुण वक्ता, बातचीत-परिचयमें पटु॥ 167 ॥ विप्र कहे,—“पाठान, तोमार पातसार दोहाइ। चल तुमि, आमि सिक़्दार-पाश याइ ॥ 168 ॥ अनुवाद—सनोड़िया ब्राह्मणने कहा,—“पठान, बादशाह तुम्हारा स्वामी है। तुम हमें अपने सरदारके पास लेकर चलो॥ 168 ॥ अनुभाष्य—'सिक़्दार'—शान्तिरक्षक विशेष कर्मचारी, अथवा पदपर विराजमान सेनाका अध्यक्ष, अथवा सिक्का (बादशाही मुद्रा)-दार (भारप्राप्त कर्मचारी) ॥ 168 ॥ एइ यति—आमार गुरु, आमि—माथुर ब्राह्मण। पातसार आगे आमार आछे 'शत जन' ॥ 169 ॥ अनुवाद—ये संन्यासी हमारे गुरु हैं और मैं मथुराका ब्राह्मण हूँ। मैं ऐसे सैकड़ों लोगोंको जानता हूँ, जो बादशाहकी नौकरी करते हैं॥ 169 ॥ एइ यति व्याधिते कभु हयेन मूर्च्छित। अबँहि चेतन पाइबे, हइबे सम्वित ॥ 170 ॥ अनुवाद—ये संन्यासी रोगके कारण कभी मूर्च्छित हो जाते हैं। थोड़ी देर प्रतीक्षा करके देखो, इनमें चेतनता आ जायेगी और इनकी सामान्य दशा हो जायेगी ॥ 170 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अबँहि'—अभी ॥ 170 ॥ अनुभाष्य—'सम्वित्'—ज्ञान ॥ 170 ॥ क्षणेक इँहा बैस, बान्धि' राखह सबारे। इँहाके पुछिया, तबे मारिह आमारे ॥” 171 ॥ अनुवाद—थोड़ी देर तक यहीं बैठो और हम सबको भले ही बँधा ही रहने दो। जब इनकी चेतनता लौट आये, तब इनसे ही सब कुछ पूछना। उसके बाद ही चाहे हमें मार डालना ॥” 171 ॥ पठानके द्वारा क्रोधपूर्वक सभीको 'डाकू' कहना :— पाठान कहे,—“तुमि पश्चिमा माथुर दुइजन। 'गौड़िया' ठक् एइ काँपे दुइजन ॥” 172 ॥ अनुवाद—पठानने कहा,—“तुम सभी ठग हो, तुम दोनों पश्चिम भारतके मथुराके रहनेवाले हो और ये जो भयसे काँप रहे हैं, दोनों बङ्गालके हैं॥” 172 ॥ उसके उत्तरमें कृष्णदासके द्वारा पठानको भय दिखाना और कड़वे वचन कहना :— कृष्णदास कहे,—“आमार घर एइ ग्रामे। दुइशत तुर्की आछे, शतेक कामाने ॥ 173 ॥ अखनि आसिबे सब, आमि यदि फुकारि। घोड़ा-पिड़ा लुटि' लबे तोमा-सबा-मारि' ॥ 174 ॥ गौड़िया—'बाटपाड़' नहे, तुमि—'बाटपाड़'। तीर्थवासी लुठ', आर चाह' मारिवार ॥” 175 ॥ अनुवाद—कृष्णदासने कहा,—“इसी ग्राममें मेरा घर है। मेरे पास दो सौ तुर्की सैनिक और एक सौ तोपें हैं। यदि मैं उन्हें वंशी बजाकर बुलाऊँगा, तो वे सभी अभी आ जायेंगे। फिर वे तुम सबको मारकर तुम्हारे घोड़े, काठी और सब सामान ले लेंगे। गौड़ीय ठग नहीं हैं, बल्कि तुम ही ठग हो। तुम लोग तीर्थयात्रियोंको लूटते हो और उन्हें मारना चाहते हो॥” 174-175 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'घोड़ा-पिड़ा'—घोड़ा तथा उसकी पीठपर रखी काठी आदि वस्तुएँ॥ 174 ॥ अनुभाष्य—'फुकारि'—वंशीध्वनि करके॥ 174 ॥ पठानोंको भय :— शुनिया पाठान मने सङ्कोच हइल। हेनकाले महाप्रभु 'चैतन्य' पाइल ॥ 176 ॥ 162 ।