भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1609, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1609

अठारहवाँ अध्याय 18/176-186 ] अनुवाद—कृष्णदासकी बात सुनकर पठानोंके मनमें कुछ सङ्कोच हुआ। उसी समय अचानक महाप्रभुमें चेतनता आ गयी॥ 176॥ महाप्रभुकी बाह्यदशा और नृत्य-कीर्तन :- हुङ्कार करिया उठे, बोले 'हरि' 'हरि'। प्रेमावेशे नृत्य करे ऊर्ध्वबाहु करि'॥ 177॥ अनुवाद—महाप्रभु हुङ्कार करके उठ खड़े हुए और जोरसे 'हरि' 'हरि' बोलने लगे। तब महाप्रभु हाथ उठाकर प्रेमावेशमें नृत्य करने लगे॥ 177॥ पापी म्लेच्छोंको हरिनाम्-श्रवण करनेसे कष्ट :- प्रेमावेशे प्रभु यबे करेन चित्कार। म्लेच्छेर हृदये येन लागे शेलधार॥ 178॥ अनुवाद—प्रेमावेशमें जब महाप्रभु चीत्कार कर रहे थे, तब म्लेच्छोंको ऐसा लग रहा था मानो कोई उनके हृदयको बाणकी नोकसे बेध रहा हो॥ 178॥ अनुभाष्य—'लागे शेलधार'—बाणकी नोककी भाँति बेधना (छेदना)॥ 178॥ म्लेच्छोंके द्वारा तत्क्षणात् चारों लोगोंको खोल देना; महाप्रभुके लिये भक्तद्रोहके दर्शनके अवकाश नहीं :- भय पाञा म्लेच्छ छाड़ि' दिल चारिजन। प्रभु ना देखिल निज-गणेर बन्धन॥ 179॥ अनुवाद—भयभीत होकर पठानोंने उसी समय चारों लोगोंको खोल दिया। इसलिये महाप्रभुने अपने साथियोंको बँधे हुए नहीं देखा॥ 179॥ म्लेच्छको देखकर महाप्रभुके द्वारा भावको छिपाना :- भट्टाचार्य आसि' प्रभुरे धरि' बसाइल। म्लेच्छगण देखि' महाप्रभुर 'बाह्य' हैल॥ 180॥ अनुवाद—तब बलभद्र भट्टाचार्यने आकर महाप्रभुको पकड़कर बैठाया। म्लेच्छोंको देखकर महाप्रभुको बाह्यज्ञान हुआ॥ 180॥ म्लेच्छोंके द्वारा महाप्रभुकी वन्दना और चारोंके विरुद्ध शिकायत :- म्लेच्छगण आसि' प्रभुर वन्दिल चरण। प्रभु-आगे कहे,—"एइ ठक् चारिजन॥ 181॥ एइ चारि मिलि' तोमाय धुतुरा खाओयाञा। तोमार धन लैल, तोमाय पागल करिया॥" 182॥ अनुवाद—म्लेच्छोंने आकर महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की और उनसे कहा,—"ये चारों लोग ठग हैं। इन चारोंने मिलकर आपको धतूरा खिलाकर पागल करके आपका सारा धन ले लिया है॥" 181-182॥ चारों लोगोंको ही 'अपना' कहकर महाप्रभुके द्वारा उनका परिचय देना :- प्रभु कहेन,—"ठक् नहे, मोर 'सङ्गी' जन। भिक्षुक संन्यासी, मोर नाहि किछु धन॥ 183॥ मृगी व्याधिते आमि कभु हइ अचेतन। एइ चारि दया करि' करेन पालन॥" 184॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"ये लोग ठग नहीं, बल्कि मेरे साथी हैं। मैं एक भिक्षुक संन्यासी हूँ, मेरे पास कोई धन नहीं है। मैं मिरगीकी बीमारीके कारण कभी-कभी मूर्च्छित हो जाता हूँ। ये चारों लोग कृपा करके मेरा पालन करते हैं॥" 183-184॥ पठानोंमेंसे एक व्यक्ति 'मौलाना' :- सेइ म्लेच्छ-मध्ये एक परम गम्भीर। कालवस्त्र परे सेइ,—लोके कहे 'पीर'॥ 185॥ अनुवाद—उन म्लेच्छोंमें-से एक व्यक्ति बहुत गम्भीर था। उसने काले वस्त्र पहने थे और लोग उसे 'पीर' (साधु) कहते थे॥ 185॥ महाप्रभुके दर्शनसे उसमें नम्रभाव और निर्विशेष-ब्रह्मको स्थापित करनेकी चेष्टा :- चित्त आर्द्र हैल ताँर प्रभुरे देखिया। 'निर्विशेष-ब्रह्म' स्थापे स्वशास्त्र उठाञा॥ 186॥ । 163