भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1611

अठारहवाँ अध्याय 18/194–201 ] स्थापित करके अन्तमें उसका खण्डन करके ईश्वरकी 'एबादत्' अर्थात् सेवाकी श्रेष्ठता ही स्थापित हुई है॥ 194॥ भगवद्-प्रेमकी महिमा :- मोक्षादि आनन्द यार नहे एक 'कण'। पूर्णानन्द-प्राप्ति ताँर चरण-सेवन॥ 195॥ अनुवाद— ईश्वरमें सायुज्य मोक्षका आनन्द उनके चरणोंकी सेवासे प्राप्त पूर्णानन्दके एक कणके समान भी नहीं है॥ 195॥ कुरानमें पहले 'कर्म', 'ज्ञान', 'योग'के विषयमें बतलाकर अन्तमें भगवद्भक्ति ही संस्थापित :- 'कर्म', 'ज्ञान', 'योग' आगे करिया स्थापन। सब खण्डि' स्थापे 'ईश्वर', 'ताँहार सेवन' ॥ 196॥ अनुवाद— तुम्हारे शास्त्र कुरानमें पहले 'कर्म', 'ज्ञान', 'योग'की स्थापना की गयी है, परन्तु अन्तमें इन सबका खण्डन करके सविशेष 'ईश्वर' और उनकी सेवाकी ही स्थापना की गयी है॥ 196॥ साधारणतः मुस्लिम-पण्डितोंमें कुरानके वास्तविक तात्पर्यके ज्ञानका अभाव; पूर्वमें वर्णित कर्म और ज्ञानकी विधिकी अपेक्षा बादमें वर्णित भक्तिकी विधि ही बलवान :- तोमार पण्डित-सबार नाहि शास्त्र-ज्ञान। पूर्वापर-विधि-मध्ये 'पर'-बलवान् ॥ 197॥ मौलानाको कुरानके वास्तविक-निर्णय करनेका अनुरोध :- निज-शास्त्र देखि' तुमि विचार करिया। कि लिखियाछे शेषे कह निर्णय करिया॥" 198॥ अनुवाद— तुम्हारे पण्डितोंको शास्त्र-ज्ञान नहीं है। वास्तवमें 'पूर्व' (पहलेवाली) और 'पर' (बादवाली) विधिमें-से 'पर' विधि ही बलवान् होती है। अपने शास्त्र कुरानको देखकर उसमें अन्तमें क्या लिखा है, उसपर विचार करके तुम मुझे अपना निर्णय बतलाओ॥" 197-198॥ मौलानाके द्वारा महाप्रभुके वचनोंकी 'सत्यता'का अनुमोदन; मुस्लिम पण्डितोंके हृदय-दौर्बल्यको स्वीकार करना :- म्लेच्छ कहे,—“येइ कह, सेइ 'सत्य' हय। शास्त्रे लिखियाछे, केह लइते ना पारय॥ 199॥ अनुवाद— उस म्लेच्छाचार्यने कहा,—“आप जो कह रहे हैं, वही 'सत्य' है। कुरानमें तो ऐसा ही लिखा है, किन्तु हमारे कोई भी पण्डित लोग न तो उसे समझते हैं और न ही उसे स्वीकार करते हैं॥ 199॥ उनकी निर्विशेषत्वमें ही दृढ़ आस्था, चिन्मय सविशेषत्वकी सेवामें आस्था नहीं :- 'निर्विशेष-गोसाञि' लञा करेन व्याख्यान। 'साकार-गोसाञि'-सेव्य, कारो नाहि ज्ञान॥ 200॥ अनुवाद— निर्विशेष ईश्वरको लेकर ही सभी कुरानकी व्याख्या करते हैं, किन्तु ईश्वर साकार तथा सेव्य हैं, इसका किसीको भी ज्ञान नहीं है॥ 200॥ अमृतप्रवाह भाष्य— पीरके जैसे काले वस्त्रधारी म्लेच्छाचार्यने कहा,—हमारे शास्त्रकी गूढ़ बात साधारण पण्डित नहीं समझ सकते; इसलिये वे हमारे अल्लाके 'निराकार भाव'को लेकर ही लोगोंको व्याख्या करते हैं। इस बातको अधिकांश लोग नहीं जानते कि चरम अवस्थामें ईश्वरका सच्चिदानन्द आकार ही सेव्य है॥ 199-200॥ अठारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— 'गोसाञि'—आराध्य वस्तु भगवान्; 'साकार'—मनुष्यके अपने जड़ीय ज्ञानका अतिक्रम करके त्रिगुणातीत अप्राकृत सविशेष विग्रह अथवा चिन्मय आकारसे युक्त विग्रह॥ 200॥ महाप्रभुको 'परमेश्वर' मानना और कृपाकी याचना :- सेइत 'गोसाञि' तुमि—साक्षात् 'ईश्वर'। मोरे कृपा कर, मुञि—अयोग्य पामर॥ 201॥ अनुवाद— आप साक्षात् वही ईश्वर हैं। मुझपर कृपा कीजिये, मैं अयोग्य तथा पतित हूँ॥ 201॥ 165