श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1612, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 18/202–211 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला मौलानाके द्वारा स्वयं साधन और साध्य वस्तुकी मीमांसाकी चेष्टामें असमर्थताको मानना :- अनेक देखिनु मुञि म्लेच्छ-शास्त्र हैते। 'साध्य-साधन-वस्तु' नारि निर्द्धारिते ॥ 202 ॥ अनुवाद-मैंने मुस्लिम-शास्त्रोंमें बहुत ढूँढ़ा है, किन्तु साध्य-वस्तु क्या है और उसे पानेका साधन क्या है, मैं इसको निर्धारित नहीं कर पाया हूँ ॥ 202 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे मौलानाकी जिह्वापर स्वतः ही श्रीकृष्णनामकी स्फूर्ति और जड़ीय अभिमान दूर होना :- तोमा देखि' जिह्वा मोर बले 'कृष्णनाम'। 'आमि-बड़ ज्ञानी'-एड़ गेल अभिमान ॥ 203 ॥ महाप्रभुको प्रणाम करके साध्य-साधनकी जिज्ञासा :- कृपा करि' बल मोरे 'साध्य-साधने'।" एत बलि' पड़े महाप्रभुर चरणे ॥ 204 ॥ अनुवाद-आपको देखकर मेरी जिह्वा श्रीकृष्णनाम बोल रही है। 'मैं बहुत बड़ा ज्ञानी हूँ'-मेरा यह अभिमान भी दूर हो गया है। आप कृपा करके मुझे परम 'साध्य' और उसे पानेके 'साधन'के विषयमें बतलाइये।" इतना कहकर वे महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े॥ 203-204 ॥ महाप्रभुके द्वारा उसे आश्वासन, श्रीकृष्णनामके आभाससे ही उसके पापपुञ्जका विनाश :- प्रभु कहे,-“उठ, कृष्णनाम तुमि लइला। कोटि जन्मेरे पाप गेल, 'पवित्र' हइला ॥"205 ॥ महाप्रभुके आदेशसे सभीके द्वारा श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :- 'कृष्ण' कह, 'कृष्ण' कह, -कैला उपदेश। सबे 'कृष्ण' कहे, सबार हैल प्रेमावेश ॥ 206 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "उठो, तुमने कृष्णनामका उच्चारण किया है, इसलिये तुम्हारे करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो गये हैं। अब तुम 'पवित्र' हो गये हो।" 'कृष्ण' बोलो, 'कृष्ण' बोलो-महाप्रभुने यह उपदेश उन सब पठानोंको दिया। जैसे ही वे 'कृष्ण'का उच्चारण करने लगे, सभीमें प्रेमका आवेश हो गया ॥ 205-206 ॥ महाप्रभुके द्वारा उसका 'रामदास'-नाम-संस्कार प्रदान :- 'रामदास' बलि' प्रभु ताँर कैल नाम। आर एक पाठान, ताँर नाम - 'बिजली-खाँन' ॥ 207 ॥ पठानोंके सरदार बिजली खाँका परिचय :- अल्प वयस ताँर, राजार कुमार। 'रामदास' आदि पाठान-चाकर ताँहार ॥ 208 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने उस म्लेच्छाचार्यको परोक्षरूपसे हरिनामकी दीक्षा देते हुए उसे 'रामदास' कहकर उसका नामकरण किया। उन लोगोंमें-से एक 'बिजली खाँन' नामका पठान था। उसकी आयु बहुत कम थी और वह राजाका पुत्र था। 'रामदास' आदि पठान उसके दास थे॥ 207-208 ॥ उसके द्वारा भी महाप्रभुके श्रीचरणोंमें शरण-ग्रहण, महाप्रभुका उसके मस्तकपर पदार्पण :- 'कृष्ण' बलि' पड़े सेइ महाप्रभुर पाय। प्रभु श्रीचरण दिल ताँहार माथाय ॥ 209 ॥ अनुवाद-वह बिजली-खाँन भी 'कृष्ण' बोलते हुए महाप्रभुके चरणोंमें पड़ गया। महाप्रभुने अपने श्रीचरणकमलको उसके मस्तकपर रख दिया ॥ 209 ॥ महाप्रभुकी यात्रा, उन सब पठानोंके द्वारा वैराग्यधर्मको ग्रहण करना :- ताँ-सबारे कृपा करि' प्रभु त' चलिला। सेइत पाठान सब 'वैरागी' हइला ॥ 210 ॥ अनुवाद-उन सबपर कृपा करके महाप्रभु तो चल दिये। वे सब पठान वैरागी बन गये ॥ 210 ॥ उनकी 'पठान-वैष्णव'के रूपमें ख्याति और उनके द्वारा सर्वत्र महाप्रभुके गुणोंका गान :- 'पाठाम-वैष्णव' बलि' हैल ताँर ख्याति। सर्वत्र गाहिया बुले महाप्रभुर कीर्त्ति ॥ 211 ॥ 166