श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1613, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय 18/211-220 ] अनुवाद—वे सब 'पठान-वैष्णव'के नामसे प्रसिद्ध हो गये। वे सर्वत्र महाप्रभुके गुणोंका गान करते हुए भ्रमण करने लगे॥ 211 ॥ सर्वत्र महाभागवत बिजली खाँकी महिमाका विस्तार :— सेइ बिजली-खाँन हैल 'महा-भागवत'। सर्वतीर्थे हैल ताँर परम-महत्त्व॥ 212 ॥ अनुवाद—वे बिजली-खाँन महाभागवत बन गये और सभी तीर्थोंमें उनकी महिमा फैल गयी॥ 212 ॥ पश्चिम-भारतमें आकर महाप्रभुके द्वारा म्लेच्छोंका उद्धार :— ऐछे लीला करे प्रभु श्रीकृष्णचैतन्य। 'पश्चिमे' आसिया कैल यवनादि धन्य॥ 213 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु ऐसी लीलाएँ करते हैं। पश्चिम भारतमें आकर उन्होंने यवनोंको भी धन्य कर दिया॥ 213 ॥ सोरोक्षेत्रमें गङ्गास्नान और गङ्गातटक पथसे प्रयागमें गमन :— सोरो क्षेत्रे आसि' प्रभु कैला गङ्गास्नान। गङ्गातीर-पथे कैला प्रयागे पयान॥ 214 ॥ अनुवाद—सोरोक्षेत्रमें आकर महाप्रभुने गङ्गास्नान किया और फिर गङ्गातटके मार्गसे उन्होंने प्रयागकी ओर यात्रा की॥ 214 ॥ सनोड़िया-ब्राह्मण और कृष्णदासको विदायी देनेकी इच्छा :— सेइ विप्रे, कृष्णदासे, प्रभु विदाय दिला। मोड़-हाते दुइजन कहिते लागिला॥ 215 ॥ अनुवाद—सोरोक्षेत्रमें महाप्रभुने सनोड़िया ब्राह्मण तथा कृष्णदासको घर लौट जानेके लिये कहा, तब वे दोनों हाथ जोड़कर कहने लगे॥ 215 ॥ अनुभाष्य—'सेइ विप्रे, कृष्णदासे'—श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य सनोड़िया ब्राह्मणको और कृष्णदास-राजपूतको सोरोसे विदायी दी॥ 215 ॥ उनकी प्रयाग तक अनुगमनकी प्रार्थना :— “प्रयाग पर्यन्त दुँहे तोमा-सङ्गे याब। तोमार चरण-सङ्ग पुनः काँहा पाब?॥ 216 ॥ म्लेच्छदेश, केह काँहा करये उत्पात। भट्टाचार्य-पण्डित, कहिते ना जानेन बातू॥” 217 ॥ अनुवाद—“हम दोनों प्रयाग तक आपके साथ जायेंगे। आपके चरणकमलोंका सङ्ग पुनः हमें कहाँ प्राप्त होगा? म्लेच्छ देश है, कौन कहाँ क्या उत्पात खड़ा कर दे? बलभद्र भट्टाचार्य यद्यपि पण्डित हैं, किन्तु वे यहाँकी भाषा नहीं जानते हैं॥” 216-217 ॥ महाप्रभुका मन्द-मुसकाना और उनका महाप्रभुके पीछे-पीछे चलना :— शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिते लागिला। सेइ दुइजन प्रभुर सङ्गे चलि' आइला॥ 218 ॥ अनुवाद—उन दोनोंकी बात सुनकर महाप्रभु मन्द-मन्द मुस्करा दिये। वे दोनों महाप्रभुके साथ चले आये॥ 218 ॥ मार्गमें महाप्रभुका दर्शन करनेवाले प्रत्येक व्यक्तिके द्वारा ही श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :— येइ येइ जन प्रभुर पाइल दरशन। सेइ प्रेमे मत्त हय, करे कृष्ण-सङ्कीर्त्तन॥ 219 ॥ उससे किसी दूसरे व्यक्तिको श्रवण करनेका सुयोग, इस प्रकार श्रवण-कीर्त्तनधाराकी परम्परासे सभी देशोंका उद्धार :— ताँर सङ्गे अन्योन्ये, ताँर सङ्गे आन। एइमत 'वैष्णव' कैला सब देश-ग्राम॥ 220 ॥ अनुवाद—जिस-जिस व्यक्तिको महाप्रभुके दर्शन प्राप्त हुए, वही प्रेममें मत्त हो गया और श्रीकृष्ण-सङ्कीर्त्तन करने लगा। महाप्रभुके दर्शनसे जो व्यक्ति वैष्णव बना, उसका जिसने सङ्ग किया, वह भी वैष्णव बन गया। । 167