श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1614, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 18/219–228 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला इस प्रकार सभी नगरों और गाँवोंके लोग एकके बाद एक वैष्णव बन गये॥ 219-220॥ दक्षिणकी भाँति पश्चिमदेशका भी उद्धार करना :- दक्षिण याइते यैछे शक्ति प्रकाशिला। सेइमत ‘पश्चिमदेश’ प्रेमे भासाइला॥ 221॥ अनुवाद—दक्षिण भारतमें जाते समय महाप्रभुने जैसे अपनी शक्तिको प्रकाशित किया था, उसी प्रकार उन्होंने 'पश्चिम-भारत'को भी श्रीकृष्णप्रेममें डुबो दिया॥ 221॥ अनुभाष्य—'पश्चिम'-देश'-कोई-कोई कहते हैं कि उस समय श्रीमन्महाप्रभु वृन्दावनसे कुरुक्षेत्र जाकर फिर प्रयाग गये थे। कुरुक्षेत्रमें भद्रकाली-मन्दिरके निकट श्रीगौरविग्रह आज भी विराजमान है॥ 221॥ अठारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभुका प्रयागमें आगमन; दस दिन त्रिवेणी-दर्शन और स्नान :- एइमत चलि' प्रभु 'प्रयाग' आइला। दशदिन त्रिवेणीते मकर-स्नान कैला॥ 222॥ अनुवाद—इस प्रकार चलते-चलते महाप्रभु 'प्रयाग'में आ गये। दस दिनों तक उन्होंने त्रिवेणीमें मकर-स्नान किया॥ 222॥ महाप्रभुका चरित्र अगाध; वृन्दावनके प्रेम-वर्णनमें साक्षात् शेषकी भी असमर्थता :- वृन्दावन-गमन, प्रभु-चरित्र अनन्त। 'सहस्र-वदन' याँर नाहि पा'न अन्त॥ 223॥ अनुवाद—महाप्रभुका वृन्दावनमें गमन तथा वहाँपर उनकी लीलाएँ अनन्त हैं, 'सहस्र-मुखवाले' अनन्त-शेष भी उनकी लीलाओंका अन्त नहीं पाते॥ 223॥ ग्रन्थकारका दैन्य और दिग्दर्शनमात्र वर्णन :- ताहा के कहिते पारे क्षुद्र जीव हञा। दिग्दर्शन कैलुँ मुञि सूत्र करिया॥ 224॥ अनुवाद—तब क्षुद्र जीव होकर कौन उनका वर्णन कर सकता है? मैंने तो सूत्रके रूपमें उनका दिग्दर्शन मात्र करवाया है॥ 224॥ दुर्भागे व्यक्तियोंका ही श्रीचैतन्यलीलामें अविश्वास :- अलौकिक-लीला प्रभुर अलौकिक-रीति। शुनिलेओ भाग्यहीनेर ना हय प्रतीति॥ 225॥ अनुवाद—महाप्रभुकी लीलाएँ और उनकी रीतियाँ, सब अलौकिक हैं। किन्तु भाग्यहीन व्यक्तियोंको उन लीलाओंको सुनकर भी उनके प्रति विश्वास नहीं होता॥ 225॥ सभी श्रोताओंको ही श्रीचैतन्यलीलामें दृढ़-श्रद्धा और वास्तविक सत्यवस्तुके ज्ञानमें विश्वास करनेका अनुरोध :- आद्योपान्त चैतन्यलीला—'अलौकिक' जान'। श्रद्धा करि' शुन इहा, 'सत्य' करि' मान'॥ 226॥ अनुवाद—आदिसे अन्त तक श्रीचैतन्यलीलाओंको अलौकिक जानो। इस प्रकार श्रद्धापूर्वक उनका श्रवण करो और उन्हें 'सत्य' मानो॥ 226॥ अविश्वासी और तार्किकके द्वारा अपने ही अमङ्गलको बुलाना :- येइ तर्क करे इँहा, सेइ—'मूर्खराज'। आपनार मुण्डे से आपनि पाड़े बाज॥ 227॥ अनुवाद—जो इसमें तर्क करता है—वह 'महामूर्ख' है। वह अपने ही सिरपर जान-बूझकर वज्रपात करता है॥ 227॥ चैतन्यचरितामृत-रसामृतसिन्धुके जलमें जगत् प्लावित :- चैतन्य-चरित्र एइ—'अमृतेर सिन्धु'। जगत् आनन्दे भासाय यार एकबिन्दु॥ 228॥ अनुवाद—यह श्रीचैतन्यचरित 'अमृतका सिन्धु' है, जिसकी एक बूँद भी समस्त जगत्को आनन्दमें डुबो सकती है॥ 228॥ 168 |