श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1617, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय कथासार—श्रीरूप-सनातन रामकेलिग्राममें महाप्रभुके दर्शन करनेके बाद विषयोंके त्यागके उपायोंको कार्यान्वित करने लगे। उन्होंने चैतन्य महाप्रभुके चरणोंका आश्रय प्राप्त करनेके लिये 'कृष्णमन्त्र'के दो पुरश्चरण करवाये। श्रीरूपगोस्वामी अपनी सम्पत्तिमें-से दस हजार मुद्राएँ गौड़देशमें एक व्यापारीके पास रखकर बाकी धनको नौकामें चढ़ाकर बाकला-चन्द्रद्वीपमें गये। उस धनको उन्होंने ब्राह्मणों, वैष्णवों और कुटुम्बियोंमें बाँट दिया और एक भाग किसी विपत्तिसे बचनेके लिये अलग रख दिया। महाप्रभु वनके पथसे किस दिन वृन्दावन-यात्रा करेंगे, इसे जाननेके लिये उन्होंने अपने दो सेवकोंको पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें भेजा। दूसरी ओर श्रीसनातन गोस्वामी रोगके छलसे पण्डितोंको लेकर भागवतादिकी चर्चा करने लगे। गौड़ेश्वर बादशाह हुसेनशाहने पहले वैद्यके द्वारा, बादमें स्वयं अपने नेत्रोंसे देखकर सनातनके राजकार्यको छोड़नेके छलको जानकर उन्हें कारागारमें बन्द करके उड़ीसा देशपर आक्रमण करनेके लिये यात्रा की। महाप्रभुने जब वृन्दावन जानेके लिये वनपथसे यात्रा आरम्भ की, तब श्रीरूप गोस्वामीने गृहत्याग कर दिया। उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीको यह सन्देश भिजवाया कि वे गृहत्याग करके अपने भाई अनुपम मल्लिकके साथ महाप्रभुसे मिलने जा रहे हैं। श्रीरूप गोस्वामी प्रयागमें पहुँचकर महाप्रभुके पास दस दिन तक रहे। इसी बीच श्रीवल्लभभट्टने महाप्रभुको निमन्त्रण करके महाप्रभुका विशेष सम्मान किया। महाप्रभुने श्रीरूपका श्रीवल्लभभट्टके साथ परिचय करा दिया। उसके बाद श्रीरघुपति उपाध्यायके वहाँ पहुँचनेपर उनका महाप्रभुके साथ बहुत रस-आलाप हुआ। इस स्थानपर श्रीकविराज गोस्वामीने श्रीरूप और श्रीसनातनके व्रजजीवनके विषयमें कुछ वर्णन किया है। प्रयागमें दस दिन रहकर महाप्रभुने श्रीरूपको भक्तिरसतत्त्वकी सूत्ररूपमें शिक्षा देकर रसामृतसिन्धुकी रचना करनेकी आज्ञा दी। श्रीरूपको वहाँसे वृन्दावन भेजकर महाप्रभु काशीमें जाकर श्रीचन्द्रशेखरके घरमें रहे। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीरूपके द्वारा व्रजरसकेलि-तत्त्वको प्रकट करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :- वृन्दावनीयां रसकेलिवात्ताँ कालेन लुप्तां निजशक्तिमुक्तः। सञ्चार्य रूपे व्यतनोत् पुनः स प्रभुर्विधौ प्रागिव लोकसृष्टिम् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौरने सृष्टिसे पहले ब्रह्माके हृदयमें जिस प्रकार (सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनात्मक भगवत्तत्त्वकी) प्रेरणा की थी, उसी प्रकार श्रीरूप गोस्वामीमें अत्यधिक उत्सुक होकर निज-शक्तिका सञ्चार करके कालधर्मसे (कालके प्रभावसे) लुप्त हुई वृन्दावनकी रसकेलिवात्र्ताका विस्तार किया था ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— सः प्रभुः (श्रीगौरः) उत्कः (उत्कण्ठितः सन्) लोक-सृष्टिं प्राक् (विश्व-सृष्ट्यादेः पूर्वं) विधौ (विधातरि ब्रह्मणि) इव रूपे (श्रीरूपगोस्वामिनि) निजशक्तिं सञ्चार्य (निधाय) कालेन (कालधर्मेण) लुप्ताम् (अन्तर्हितामिति) वृन्दावनीयां रसकेलिवार्त्तां (वृन्दावनसम्बन्धिनीं श्रीव्रजेन्द्रनन्दन-विलास-कथां) पुनः व्यतनोत् (प्रकाशितवान्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ 171