भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1618

[ 19/2-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥२॥ महाप्रभुके दर्शनके बाद श्रीरूप-सनातनका अपने घरमें लौटना :— श्रीरूप-सनातन रहे रामकेलि-ग्रामे। प्रभुरे मिलिया गेला आपन-भवने॥३॥ अनुवाद—महाप्रभुसे रामकेलि ग्राममें मिलनेके बाद श्रीरूप और श्रीसनातन अपने घर लौट गये थे॥३॥ विषय-त्याग और महाप्रभुकी प्राप्तिके लिये दोनोंका पुरश्चरण :— दुइभाइ विषय-त्यागेर उपाय सृजिल। बहुधन दिया दुइ ब्राह्मणे वरिल॥४॥ कृष्णमन्त्रे कराइल दुइ पुरश्चरण। अचिरात् पाइबारे चैतन्य-चरण॥५॥ अनुवाद—दोनों भाइयोंने विषय-त्यागका उपाय सोच निकाला। इस कार्यके लिये उन्होंने बहुत-सा धन देकर दो ब्राह्मणोंको वरण किया। उन ब्राह्मणोंने तीनों सन्ध्या श्रीकृष्णमन्त्रका जप, श्रीकृष्ण-अर्चर्नादि पुरश्चरण नियमपूर्वक दो बार किये जिससे दोनों भाइयोंको श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी अतिशीघ्र प्राप्ति हो॥४-५॥ अनुभाष्य—‘पुरश्चरण’—मध्यलीला 15/108 संख्या देखें॥५॥ श्रीरूपका फतेहाबादमें अपने घरपर आगमन :— श्रीरूप-गोसाञि तबे नौकाते भरिया। आपणार घरे आइला बहुधन लञा॥६॥ अनुवाद—उसके बाद श्रीरूपगोस्वामी बहुत-सा धन नौकामें भरकर अपने घरमें लेकर आये॥६॥ ब्राह्मण-वैष्णवोंको आधा, स्वजनोंको एक-चौथाई धनका वितरण :— ब्राह्मण-वैष्णवे दिला तार अर्द्ध-धने। एक चौठि धन दिला कुटुम्ब-भरणे॥७॥ अनुवाद—उन्होंने उस धनका आधा भाग तो ब्राह्मणों और वैष्णवोंमें बाँट दिया तथा उन्होंने एक चौथाई धन अपने कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये दे दिया॥७॥ भावी-विपत्तिसे उद्धारके लिये धनको बचाकर रखना :— दण्डबन्ध लागि' चौठि सञ्चय करिला। भाल-भाल विप्र-स्थाने स्थाप्य राखिला॥८॥ अनुवाद—भविष्यमें आनेवाली किसी विपत्तिसे उद्धारके लिये बचा हुआ एक चौथाई धन एक अच्छे ब्राह्मणके पास रखवा दिया॥८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘दण्डबन्ध’—उपस्थित विपत्ति, राजदण्ड और बन्धनादिसे उद्धारके लिये॥८॥ गौड़में श्रीसनातनके लिये दस हजार मुद्राका रक्षण :— गौड़े राखिल मुद्रा दश-हाजारे। सनातन व्यय करे, राखे मुदि-घरे॥९॥ अनुवाद—श्रीरूपने गौड़देशमें श्रीसनातनके खर्च करनेके उद्देश्यसे दस हजार मुद्राएँ एक व्यापारीके घरपर रख दीं॥९॥ महाप्रभुके पुरी-गमन और वृन्दावनमें जानेके लिये तैयार होनेकी वार्त्ताका श्रवण :— श्रीरूप शुनिल प्रभुर नीलाद्रि-गमन। वनपथे याबेन प्रभु श्रीवृन्दावन॥१०॥ उसके लिये दो दूतोंको भेजना :— रूप-गोसाञि नीलाचले पाठाइल दुइजन। प्रभु यबे वृन्दावन करेन गमन॥११॥ 172 |