श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1619, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/10-17 ] "शीघ्र आसि' मोरे ताँर दिबा समाचार। शुनिया तदनुरूप करिब व्यवहार॥" 12 ॥ अनुवाद—श्रीरूपने सुना कि महाप्रभु जगन्नाथपुरी लौट आये हैं और वे वनमार्गसे श्रीवृन्दावन जानेकी तैयारी कर रहे हैं। श्रीरूप गोस्वामीने नीलाचलमें दो लोगोंको यह पता करनेके लिये भेजा कि महाप्रभु कब श्रीवृन्दावनके लिये प्रस्थान करेंगे। श्रीरूप गोस्वामीने उनसे कहा,—"तुम लोग शीघ्र आकर मुझे उनका समाचार देना, मैं उसके अनुरूप अपना कार्यक्रम बनाऊँगा॥" 10-12 ॥ श्रीसनातनका राजकार्यसे छुट्टी लेनेका सुयोग खोजना :- एथा सनातन-गोसाञि भावे मने मन। "राजा मोरे प्रीति करे, से—मोर बन्धन॥ 13 ॥ राजा उनसे रुष्ट हो, इसके लिये प्रयत्न :- कोन मते राजा यदि मोरे क्रुद्ध हय। तबे अव्याहति हय, करिलुँ निश्चय॥" 14 ॥ अनुवाद—इधर रामकेलि ग्राममें श्रीसनातन अपने मनमें सोचने लगे,—"राजा मुझसे प्रीति करता है, यह मेरे लिये बन्धन है। यदि किसी प्रकारसे राजा मुझसे रुष्ट हो जाय, तभी मेरा छुटकारा होगा। यही मेरा निश्चय है॥" 13-14 ॥ रोगका छल :- अस्वास्थ्येर छद्म करि' रहे निज-घरे। राजकार्य छाड़िला, ना याय राजद्वारे॥ 15 ॥ अपने घरपर भागवतका विचार :- लोभी कायस्थगण राजकार्य करे। आपने स्वगृहे करे शास्त्रेर विचारे॥ 16 ॥ भट्टाचार्य पण्डित बिश त्रिश लञा। भागवत-विचार करेन सभाते बसिया॥ 17 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन अस्वस्थ होनेका छल करके अपने घरपर ही रहने लगे। उन्होंने राजकार्य करना छोड़ दिया और राज-दरबारमें जाना भी बन्द कर दिया। लोभी कायस्थ (राजकीय लेखा और खाता लिखनेवालोंके अधिकारी) लोग राजकार्य देखने लगे तथा श्रीसनातन गोस्वामी अपने घरपर शास्त्रोंपर विचार-विमर्श करने लगे। वे बीस-तीस भट्टाचार्य पण्डितोंको अपने घरपर ही बुलाकर सभा करके भागवतपर विचार करने लगे॥ 15-17 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—छद्म'-छल। जिस समय श्रीसनातन गोस्वामी राजमन्त्री थे, उस समय उनके अधीन कुछ 'कायस्थ' कर्मचारी थे। श्रीसनातनके वैराग्यभावको देखकर उनमेंसे कुछ व्यक्ति श्रीसनातनके पदको प्राप्त करनेके लोभसे राजकार्यमें विशेष निपुणता दिखलाने लगे। लोगोंका कहना है कि श्रीसनातन गोस्वामीके पद त्याग करनेके बाद उनके अधीन कार्य करनेवाले कर्मचारी प्रसिद्ध पुरन्दर खाँनको यह पद प्राप्त हुआ था॥ 15-16 ॥ अनुभाष्य—'भागवत-विचार'-विद्या 'दो' प्रकारकी है; (मुः उः 1/1/4-5)— "द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति-परा चैवापरा च। तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते।" [अर्थात् "ब्रह्मविद् लोग कहते हैं,—विद्या परा और अपराके भेदसे दो प्रकारकी होती है। उनमें-से ऋक्, यजुः, साम, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष-ये अपरा विद्या हैं। और जिसके द्वारा अक्षर-ब्रह्मको जाना जाता है, वह परा विद्या है।"] पराविद्याकी बात ब्रह्मसूत्र अथवा वेदान्तमें ही कही गयी है। मुक्तिकामी वेदान्तिक लोग भी धर्म-अर्थकामियोंकी भाँति छलसे युक्त होते हैं। इसलिये अपरा-विद्यापरक अथवा परा-विद्यापरक शास्त्रोंमें जहाँ शुद्धभक्तिविरोधी मोक्षकी महिमाका गान हुआ है, वे । 173