भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1620, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1620

सभी बातें छलपूर्ण हैं; किन्तु श्रीमद्भागवत शास्त्रमें ऐसा छल नहीं है। यमदण्डके भागी कर्मी लोग अथवा अहंग्रहोपासकगण श्रीमद्भागवतके विचारसे सम्पूर्ण अयोग्य हैं; वैष्णवगण ही एकमात्र भागवतका विचार करके भक्तिबलसे संसारसे विमुक्त होते हैं; (भाः 12/13/18)— “श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद्वैष्णवानां प्रियं, यस्मिन् पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते। यत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतं, तच्छृ [अर्थात् “श्रीमद्भागवत निर्मल पुराण है। यह वैष्णवोंका प्रिय ग्रन्थ है। इसमें एक अमल पारमहंस्य- ज्ञान वर्णित हुआ है। इसमें ज्ञान-वैराग्य-भक्तियुक्त नैष्कर्म्य-ज्ञान आविष्कृत (प्रकाशित) हुआ है। मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका श्रवण, पाठ और विचार करके विमुक्ति प्राप्त करते हैं।”] ॥ 17 ॥ एकदिन अचानक बादशाहका आगमन :— आर दिन गौड़ेश्वर, सङ्गे एकजन। आचम्बिते गोसाञि-सभाते कैल आगमन ॥ 18 ॥ सभीके द्वारा आदरपूर्वक बादशाहकी अगवानी :— पात्साह देखिया सबे सम्भ्रमे उठिला। सम्भ्रमे आसन दिया राजारे बसाइला ॥ 19 ॥ अनुवाद—जब श्रीसनातन गोस्वामीकी विद्वान ब्राह्मणोंके साथ गोष्ठी चल रही थी, तब एक दिन अचानक बादशाह एक व्यक्तिको अपने साथ लेकर वहाँ आ पहुँचे। बादशाहको देखकर सभी ब्राह्मण और श्रीसनातन उठकर खड़े हो गये और उन्होंने आदरपूर्वक आसन देकर राजाका सम्मान करते हुए उन्हें बैठाया ॥ 18-19 ॥ अनुभाष्य—'गौड़ेश्वर'—आलाऊद्दीन सैयद हुसेन शाह सेरिफ मक्का 1420 शकाब्दसे 1443 शकाब्द तक गौड़के सिंहासनपर अधिष्ठित थे। इसलिये 1424 शकाब्दमें यही हुसेन शाह ही श्रीसनातनकी सभामें उपस्थित हुए ॥ 18 ॥ बादशाहकी उक्ति, श्रीसनातनके अभिप्रायकी जिज्ञासा :— राजा कहे,—“तोमार स्थाने वैद्य पाठाइलुँ। वैद्य कहे,—व्याधि नाहि, सुस्थ ये देखिलुँ ॥ 20 ॥ आमार ये किछु कार्य, सब तोमा लञा। कार्य छाड़ि' रहिला तुमि घरेते बसिया ॥ 21 ॥ मोर यत कार्य-काम, सब कैला नाश। कि तोमार हृदये आछे, कह मोर पाश ॥” 22 ॥ अनुवाद—बादशाहने कहा,—“मैंने तुम्हारे घरपर वैद्यको भेजा था। वैद्यने मुझसे कहा कि तुम्हें कोई भी बीमारी नहीं है, उसने अच्छी तरहसे जाँचकर तुम्हें पूर्णतया स्वस्थ पाया है। मैं राज-काजके समस्त कार्योंमें तुमपर निर्भर करता हूँ और तुम कार्यको छोड़कर घरपर बैठे हुए हो। तुमने मेरे सब कार्योंका नाश कर दिया है। तुम्हारे हृदयमें क्या विचार है, वह मुझे स्पष्ट रूपसे बतलाओ ॥” 20-22 ॥ श्रीसनातनकी राजकार्यमें अनिच्छा बताना :— सनातन कहे,—“नहे आमा हैते काम। आर एकजन दिया कर समाधान ॥” 23 ॥ अनुवाद—श्रीसनातनने कहा,—“अब मुझसे कोई काम नहीं होगा। अन्य किसी एक व्यक्तिको नियुक्त करके अपने कार्य करवा लीजिये ॥” 23 ॥ बादशाहकी क्रोधपूर्ण उक्ति :— तबे क्रुद्ध हञा राजा कहे आरबार। “तोमार ‘बड़ भाई’ करे दस्यु-व्यवहार ॥ 24 ॥ जीव-पशु मारि' कैल चाक्ला सब नाश। एथा तुमि कैला मोर सर्व कार्य नाश ॥” 25 ॥ अनुवाद—तब क्रोधित होकर बादशाहने पुनः कहा,—“तुम्हारा ‘बड़ा भाई’ अर्थात् मैं डाकुओं जैसा कार्य अर्थात् लूट-पाट करता हूँ। शिकारमें बहुतसे पशुओंको मारकर मैंने चाक्ला नामक स्थानको प्रायः

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