श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/24-30 ]
नष्ट कर दिया है। और इधर तुम मेरी समस्त योजनाओंको नष्ट करनेमें लगे हो॥"24-25॥
श्रीसनातनकी कार्यसे छुटकारा पानेके लिये दण्डकी प्रार्थना :- सनातन कहे, – “तुमि स्वतन्त्र गौड़ेश्वर। ये येइ दोष करे, देह' तार फल ॥" 26 ॥
अनुवाद- श्रीसनातनने कहा,- “आप गौड़देशके बादशाह और पूर्ण स्वतन्त्र हैं। आपके राज्यमें जो व्यक्ति जो दोष करता है, आप उसे उसका फल देते हैं॥"26॥
बादशाहकी आज्ञासे श्रीसनातनको बाँधना :- एत शुनि' गौड़ेश्वर उठि' घरे गेला। पलाइब बलि' सनातनरे बान्धिला ॥ 27 ॥
अनुवाद-यह सुनकर बादशाह उठकर अपने घर चला गया। उसने श्रीसनातनको बन्दी बनानेका आदेश दिया जिससे वे कहीं भाग न जाँय ॥ 27 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-सुना जाता है कि श्रीसनातन गोस्वामीको बादशाह हुसेनशाह 'छोटा भाई' मानता था। जब श्रीसनातनने कर्मत्यागकी अत्यन्त दृढ़ता दिखलायी, तब हुसेनशाहने प्रणय-रोषपूर्वक कहा कि,- “मैं तुम्हारा 'बड़ा भाई' हूँ, मैं बिल्कुल भी राज्यका पालन नहीं करता हूँ। मैं तो सेनाको लेकर युद्धके द्वारा केवल देश-विदेशको लूटते हुए घूमता हूँ एवं जातिसे यवन होनेके कारण गौड़-चाक्लामें शिकार करके बहुतसे जीव-पशुओंका नाश ही करता हूँ। तुमपर ही मेरा विश्वास है; तुम्हारा बड़ा भाई, मैं, जब केवल डाकुओंके जैसे कार्य तथा जीवोंके नाशके कार्यमें ही लगा हुआ था, और छोटे भाई, तुमने भी तब कार्यका परित्याग करके सब कार्योंका नाश कर दिया है, अब राज्य किस प्रकार चलेगा?" श्रीसनातनने छोटे भाईके नाते परिहास करते हुए कहा, - 'आप गौड़देशके बादशाह हैं, स्वतन्त्र राजा हैं, आपके पास दण्ड प्रदान करनेकी पूर्ण सत्ता है; जो जैसा भी दोष करता है, आप उसे उसका फल प्रदान करते हैं।' इस वचनमें गूढ़ रहस्य है, - राजा स्वयं डाकुओं जैसा व्यवहार करता है, इसलिये वह उसका फल ग्रहण करे और मन्त्रीका (मेरा) जब कार्यमें आलस्य दिखलायी देता है, तब उसका (मेरा) कार्यसे छुटकारा रूपी फल हो। इससे श्रीसनातनके अभिलषित विषयको जानकर बादशाह उठकर चला गया ॥ 24-27 ॥
बादशाहका उड़ीसा जानेका अभियान; श्रीसनातनको साथमें चलनेके लिये आह्वान :- हेनकाले गेल राजा उड़िया मारिते। सनातने कहे, - "तुमि चल मोर साथे ॥"28 ॥
अनुवाद-उसी समय बादशाह उड़ीसापर आक्रमण करनेके लिये गया। बादशाहने सनातनसे कहा,-“तुम भी मेरे साथ चलो ॥" 28 ॥
अनुभाष्य-1424 शकाब्दमें हुसेनशाहने उड़ीसाके सामन्तराज गणोंको [उनके साथ युद्ध करनेके लिये] बाध्य किया ॥ 28 ॥
विष्णु-विरोधी कार्यमें श्रीसनातनका असहयोग :- तेँ हो कहे, – “याबे तुमि देवताय दुःख दिते। मोर शक्ति नाहि, तोमार सङ्गे याइते ॥"29 ॥
अनुवाद- श्रीसनातनने कहा,- “आप श्रीजगन्नाथदेवको दुःख देने जा रहे हैं। मुझमें आपके साथ जानेकी शक्ति नहीं है ॥"29॥
बादशाहकी यात्रा, महाप्रभुकी भी पुरीसे वृन्दावन-यात्रा :- तबे ताँरे बान्धि' राखि' करिला गमन। एथा नीलाचल हैते प्रभु चलिला वृन्दावन ॥ 30 ॥
अनुवाद- श्रीसनातनको बन्दी बनाकर बादशाह उड़ीसा युद्धके लिये चला गया। इधर महाप्रभु नीलाचलसे वृन्दावनकी ओर चल दिये ॥ 30 ॥
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