श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 19/31-40 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीरूपको उन दो दूतोंके द्वारा महाप्रभुकी वृन्दावन-यात्राकी बात बतलाना :- तबे सेइ दुइ चर रूप-ठाञि आइल। 'वृन्दावन चलिला प्रभु'-आसिया कहिल ॥ 31 ॥ अनुवाद-तभी श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा नीलाचल भेजे गये दो दूत उनके पास लौटकर आये। उन्होंने बतलाया कि 'महाप्रभु वृन्दावनके लिये चल पड़े हैं' ॥ 31 ॥ श्रीरूपका छोटे भाईके साथ महाप्रभुके दर्शनके लिये यात्राके संवादका श्रीसनातनको पत्रके द्वारा ज्ञापन; और उन्हें जिस-किसी उपायसे चले आनेका आह्वान :- शुनिया श्रीरूप लिखिला सनातन-ठाञि। 'वृन्दावन चलिला श्रीचैतन्य-गोसाञि ॥ 32 ॥ आमि-दुइभाइ चलिलाङ ताँहारे मिलिते। तुमि यैछे तैछे छुटि' आइस ताँहा हैते ॥ 33 ॥ अनुवाद-दूतोंकी बात सुनकर श्रीरूपने श्रीसनातनके पास पत्र लिखकर भेजा, - 'श्रीचैतन्य गोसाईं वृन्दावनके लिये चल पड़े हैं। हम दोनों भाई उनसे मिलनेके लिये जा रहे हैं, आप भी वहाँसे जिस किसी प्रकारसे छूटकर आ जाइये ॥ 32-33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आमि-दुइभाइ'-मैं रूप और हमारे छोटे भाई अनुपम अथवा वल्लभ ॥ 33 ॥ गौड़देशमें रखी हुई दस हजार मुद्राओंकी सहायतासे बन्धनसे मुक्त होनेका परामर्श देना :- दशसहस्र मुद्रा तथा आछे मुदि-स्थाने। ताहा दिया कर शीघ्र आत्म-विमोचने ॥ 34 ॥ यैछे तैछे छुटि' तुमि आइस वृन्दावन।' एत लिखि' दुइभाइ करिला गमन ॥ 35 ॥ अनुवाद-गौड़देशमें अमुक व्यापारीके पास दस हजार मुद्राएँ रखी हैं, उनके द्वारा शीघ्र ही अपने आपको छुड़ा लीजिये। जिस किसी प्रकारसे छूटकर आप वृन्दावन आ जाइये।' इतना लिखकर दोनों भाई महाप्रभुसे मिलनेके लिये चल पड़े ॥ 34-35 ॥ अनुपमका परिचय :- अनुपम मल्लिक, ताँर नाम-'श्रीवल्लभ'। रूप-गोसाञिर छोटभाइ-परम वैष्णव ॥ 36 ॥ अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीके छोटे भाई परम वैष्णव थे। उनका नाम 'श्रीवल्लभ' था। उनको अनुपम मल्लिक नाम दिया गया था ॥ 36 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 10/84 संख्या देखें ॥ 36 ॥ दोनों भाइयोंका प्रयागमें आगमन और वहाँ महाप्रभुके होनेके विषयमें सुनकर आनन्द :- ताँहारे लञा रूप-गोसाञि प्रयागे आइला। महाप्रभु ताँहा शुनि' आनन्दित हैला ॥ 37 ॥ अनुवाद-श्रीवल्लभको अपने साथ लेकर श्रीरूप गोस्वामी प्रयागमें आ पहुँचे। महाप्रभुके भी वहीं होनेके विषयमें सुनकर वे बहुत आनन्दित हुए ॥ 37 ॥ प्रयागमें महाप्रभुका बिन्दुमाधव दर्शन और लोगोंकी भीड़ :- प्रभु चलियाछेन बिन्दुमाधव-दरशने। लक्ष लक्ष लोक आइसे प्रभुर मिलने ॥ 38 ॥ केह कान्दे, केह हासे, केह नाचे, गाय। 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलि' केह गड़ागड़ि याय ॥ 39 ॥ अनुवाद-महाप्रभु बिन्दुमाधवका दर्शन करनेके लिये जा रहे थे। लाखों-लाखों लोग महाप्रभुसे मिलनेके लिये आ रहे थे। कोई रो रहा था, कोई हँस रहा था, कोई नाच रहा था, कोई गा रहा था। कोई तो 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलते हुए भूमिपर लोटपोट खा रहा था ॥ 38-39 ॥ प्रेमकी बाढ़में प्रयाग निमग्न :- गङ्गा-यमुना प्रयाग नारिल डुबाइते। प्रभु डुबाइल कृष्णप्रेमेर वन्याते ॥ 40 ॥ 176 |