श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1626, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/61-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य- 'वल्लभभट्ट'-ये त्रैलङ्गदेशमें 'निडाडाभलु'-रेलस्टेशनसे सोलह मीलकी दूरीपर 'काङ्कड़वाड़' अथवा 'काकूँरपाडु'-नामक ग्रामके निवासी 'लक्ष्मण-दीक्षित'के पुत्र हैं। आन्ध्रके ब्राह्मणोंमें पाँच विभाग हैं, - वेल्ल-नाटी, वेगी-नाटी, मुरकि-नाटी, तेलगु-नाटी और काशाल-नाटी; उनमेंसे वेल्ल-नाटी आन्ध्र-ब्राह्मणकुलमें 1400 शकाब्दमें श्रीवल्लभाचार्यने जन्म ग्रहण किया। कोई-कोई कहते हैं कि वल्लभके जन्म होनेसे पहले ही उनके पिताने संन्यास ग्रहणकर घरका त्याग कर दिया था, बादमें पुनः घर लौटनेके बाद वल्लभाचार्यको पुत्रके रूपमें प्राप्त किया था। अन्य मतके अनुसार, - विक्रम सम्वत् 1535 अर्थात् 1400 शकाब्दकी चैत्री कृष्णा-एकादशी तिथिमें त्रैलङ्गदेशीय वेल्लनाटी-ब्राह्मण-वंशमें उत्पन्न 'खम्पंपाटीवारु' उपाधिधारी लक्ष्मणभट्ट-दीक्षितके पुत्रके रूपमें वल्लभाचार्य 'चम्पकारण्य'में, मतान्तरमें, - मध्यप्रदेशके अन्तर्गत वि. एन. आर. लाईनमें राजिम स्टेशनके निकट चाँपाझार- ग्राममें आविर्भूत हुए थे। ग्यारह वर्षों तक काशीमें वास करके विद्या अध्ययनके बाद अपने देशमें लौटते समय मार्गमें शेषाद्रिमें उन्होंने अपने पिताके परलोक-प्राप्तिके विषयमें सुना। भाई और माताको घरपर छोड़कर तुङ्गाभद्राके तटपर विद्यानगरमें जाकर बुक्कराजके पौत्र कृष्णदेवका उल्लास विधान किया। उसके बाद तीन बार छः-छः वर्षवाली दिग्विजयमें अठारह वर्ष व्यतीत किये। तीस वर्षकी आयुमें काशीमें स्वजातीय ब्राह्मणकी 'महालक्ष्मी'-नामक कन्याका पाणिग्रहण किया। इन्होंने गोवर्धन-पर्वतके नीचे श्रीमूर्त्ति स्थापित करके प्रयागके निकट आड़ाइल ग्राममें वास किया था। इनके दो पुत्र-श्रीगोपीनाथ और श्रीविट्ठलेश्वर थे। अन्तिम अवस्थामें त्रिदण्ड-संन्यास ग्रहण करके 1452 शकाब्दमें इन्होंने वाराणसीमें परलोक गमन किया। श्रीवल्लभके 'षोडशग्रन्थ', ब्रह्मसूत्रका 'अनुभाष्य', श्रीमद्भागवतकी 'सुबोधिनी'-टीका आदि कुछ ग्रन्थोंके अतिरिक्त और भी अनेक ग्रन्थ हैं॥ 61 ॥ श्रीवल्लभभट्टका महाप्रभुको प्रणाम, दोनोंमें परस्पर श्रीकृष्ण-कथाका आलाप :- तेंहो दण्डवत् कैल, प्रभु कैला आलिङ्गन। दुइजने कृष्णकथा हैल ततक्षण॥ 62 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभभट्टने महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया तथा महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया। तभी दोनों श्रीकृष्णकथाकी चर्चा करने लगे॥ 62 ॥ महाप्रभुमें प्रेमावेश और श्रीवल्लभको बहिरङ्ग-देखकर आवेशका सङ्कोपन :- कृष्णकथाय प्रभुर महाप्रेम उथलिल। भट्टेर सङ्कोचे प्रभु सम्वरण कैल॥ 63 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णकथाकी चर्चामें महाप्रभुमें महा- प्रेमावेश होने लगा, किन्तु उन्होंने श्रीवल्लभभट्टके सङ्कोचसे उसे सम्वरण कर लिया॥ 63 ॥ महाप्रभुके प्रेमावेशको देखकर श्रीवल्लभका विस्मय :- अन्तरे गर-गर प्रेम, नहे सम्वरण। देखि' चमत्कार हैल वल्लभ-भट्टेर मन॥ 64 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके हृदयमें प्रेमका प्रचण्ड वेग था, जिसे वे सम्वरण नहीं कर पा रहे थे। श्रीवल्लभ-भट्ट महाप्रभुमें प्रेमके वेगको देखकर आश्चर्यचकित हो गये॥ 64 ॥ महाप्रभुको भट्टका निमन्त्रण, भट्टको दोनों भाइयोंका परिचय देना :- तबे भट्ट महाप्रभुरे निमन्त्रण कैला। महाप्रभु दुइभाइ ताँहारे मिलाइला॥ 65 ॥ अनुवाद-तब श्रीवल्लभभट्टने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने दोनों भाइयों श्रीरूप और श्रीवल्लभको उनसे मिलवाया॥ 65 ॥ अमानी होकर दोनोंके द्वारा श्रीवल्लभका सम्मान :- दुइभाइ दूर हैते भूमिते पड़िया। भट्टे दण्डवत् कैला अति दीन हञा॥ 66 ॥ 180 ।