श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1627, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/66-75 ] अनुवाद- श्रीरूप और श्रीवल्लभ, दोनों भाइयोंने अति दीनतापूर्वक दूरसे ही भूमिपर गिरकर श्रीवल्लभभट्टको दण्डवत् प्रणाम किया ॥ 66 ॥ श्रीभट्टकी आलिङ्गनकी चेष्टासे दोनोंका पीछे हटना :- भट्ट मिलिबारे याय, दुँहे पलाय दूरे। "अस्पृश्य पामर मुञि, ना छुँइह मोरे ॥"67॥ अनुवाद- श्रीवल्लभभट्ट जैसे ही उनसे मिलनेके लिये आगे बढ़े, वे दोनों दूर भाग गये और श्रीरूप कहने लगे, - "मैं अस्पृश्य और महापापी हूँ, आप मुझे स्पर्श मत कीजिये ॥"67 ॥ कुलीन पण्डिताभिमानी श्रीवल्लभको बहिरङ्ग-मानकर महाप्रभुके द्वारा उन्हें जड़ीय-प्रतिष्ठा देना या छलना :- भट्टेर विस्मय हैल, प्रभुर हर्ष मन। भट्टरे कहिला प्रभु ताँर विवरण ॥68॥ "इँहो ना स्पर्शियह, इँहो जाति अति-हीन ! वैदिक, याज्ञिक तुमि कुलीन प्रवीण ! ॥"69॥ अनुवाद- दोनों भाइयोंके व्यवहारसे श्रीवल्लभ भट्ट विस्मित हो गये, किन्तु महाप्रभुका मन बहुत प्रसन्न हुआ। महाप्रभुने श्रीवल्लभभट्टको दोनों भाइयोंका विवरण देते हुए कहा,- "आप इन्हें स्पर्श मत कीजिये, ये दोनों छोटी जातिके हैं। आप वैदिक सदाचारका पालन करनेवाले और यज्ञोंमें प्रवीण व्यक्ति हैं। साथ ही आप उच्च कुलके ब्राह्मण भी हैं ॥" 68-69 ॥ दोनोंके मुखसे निरन्तर श्रीकृष्णनाम सुनकर श्रीभट्टका विस्मय और दोनोंको सर्वोत्तम मानना :- दुँहार मुखे निरन्तर कृष्णनाम शुनि' । भट्ट कहे, प्रभुर किछु इङ्गित-भङ्गी जानि' ॥70॥ "दुँहार मुखे कृष्णनाम करिछे नर्त्तन । एइ दुइ 'अधम' नहे, हय सर्वोत्तम ॥ 71 ॥ अनुवाद- दोनोंके मुखसे निरन्तर कृष्णनाम सुनकर श्रीवल्लभभट्ट महाप्रभुके वचनोंकी कुछ इङ्गित-भङ्गिमाको समझ गये। उन्होंने कहा, - "दोनोंके मुखमें कृष्णनाम नृत्य कर रहा है। ये दोनों 'अधम' नहीं, अपितु सर्वोत्तम हैं ॥ 70-71 ॥ श्रीमद्भागवत (3/33/7) में- अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुराया ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥"72॥ अनुवाद- हे भगवन्, जिनके मुखमें आपका नाम वर्तमान है, वे श्वपच (कुत्तेका मांस खानेवाले) होनेपर भी श्रेष्ठ है। जो आपका नाम-कीर्तन करते हैं, उन्होंने सब प्रकारकी तपस्या कर ली है, समस्त यज्ञ कर लिये हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया है एवं अङ्गसहित समस्त वेदोंका पाठ कर लिया है, इसलिये उनकी आर्योंमें गणना होती है ॥"72॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 11/192 संख्या देखें ॥ 72 ॥ श्रीभट्टकी सुबुद्धिको देखकर और सुसिद्धान्तको सुनकर महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा :- शुनि' महाप्रभु ताँरे बहु प्रशंसिला । प्रेमाविष्ट हञा श्लोक पड़िते लागिला ॥ 73 ॥ अनुवाद-इस श्लोकको सुनकर महाप्रभुने श्रीवल्लभभट्टकी बहुत प्रशंसा की। प्रेमाविष्ट होकर महाप्रभु श्लोक पढ़ने लगे ॥ 73 ॥ नीचवंशमें उत्पन्न होनेपर भी हरिभक्त ही पूज्य, अभक्त होनेके कारण नामका ही ब्राह्मण वेदज्ञ होनेपर भी घृणाका पात्र :- हरिभक्तिसुधोदय (3/11-12) में- शुचिः सद्द्भक्तिदीप्ताग्निदग्धदुर्जातिकल्मषः । श्वपाकोऽपि बुधैः श्लाघ्यो न वेदज्ञोऽपि नास्तिकः ॥74॥ भगवद्भक्तिहीनस्य जातिः शास्त्रं जपस्तपः । अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं लोकरञ्जनम् ॥ 75 ॥ । 181