श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 19/74-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74-75 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सदाचरित्र, सद्भक्तिरूप दीप्ताग्निके द्वारा जिसका दुर्जातिमें उत्पन्न होनेका कल्मष जलकर समाप्त हो गया है, ऐसा चण्डाल भी पण्डितोंके द्वारा सम्मानित होने योग्य है; किन्तु नास्तिक व्यक्ति वेदज्ञ होनेपर भी सम्मानके योग्य नहीं है। भगवद्भक्तिहीन व्यक्तिके सद्जातिमें जन्म, शास्त्र-ज्ञान, जप और तप मृतदेहके अलङ्कारोंकी भाँति किसी कामके नहीं, केवल लोकरञ्जन मात्र ही हैं॥ 74-75 ॥ अनुभाष्य— सद्भक्तिदीप्ताग्निदग्धदुर्जातिकल्मषः (सती ऐकान्तिकी कृष्णभक्तिः एव दीप्ताग्निः तेन दग्धं निःशेषितं दुर्जात्यादिकम् एव कल्मषं प्रारब्धं पापं यस्य सः, अतः कृष्णभजनादेव) शुचिः (सदाचारः) श्वपाकः (अति-नीचकुलोद्भवः) अपि बुधैः (विद्वद्भिः) श्लाघ्यः (वरणीयः), (परन्तु) नास्तिकः (भगवत्-सेवाविमुखः) वेदज्ञः (वेदशास्त्रपारङ्गतः ब्राह्मणः अपिः) न [पूज्यः, दुःसङ्गत्वात् परमार्थपथिकेन सर्वथा परित्याज्य एवेत्यर्थः]। भगवद्भक्तिहीनस्य (कृष्णसेवा-विमुखस्य) जातिः (प्राक्तन- सुकृतिवशात् उत्तमकुले जन्मादिकं) शास्त्रं (स्वाध्यायादिकं) जपं (मन्त्रोच्चारणादिकं), तपः (साधनाद्यनुशीलनं)-[एतत् सर्वमेव] अप्राणस्य (मृतस्य) देहस्य मण्डनम् (अलङ्करणम् इव व्यर्थमकिञ्चित्करं) लोकरञ्जनं (व्यवहारिकं जड़लोकानां बहिर्दर्शन-सुखकरमिव निष्फलमित्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—ऐकान्तिकी श्रीकृष्णभक्तिरूप दीप्ताग्निके द्वारा जिसका दुर्जातिमें उत्पन्न होनेका कल्मष और प्रारब्ध पाप जलकर समाप्त हो गये हैं, श्रीकृष्णभजनके कारण ऐसा चण्डाल भी पण्डितोंके द्वारा सम्मानित होने योग्य है; किन्तु भगवद्-सेवा-विमुख व्यक्ति वेद-शास्त्रोंमें पारङ्गत होनेपर भी सम्मानके योग्य नहीं है, अपितु दुःसङ्ग जानकर परमार्थ-पथिकको उसका सर्वथा त्याग करना चाहिये। श्रीकृष्णसेवा-विमुख व्यक्तिका पूर्व-सुकृतिके कारण उत्तमकुलमें जन्म, शास्त्र- ज्ञान, जप और तप-ये सभी मृतदेहके अलङ्कारोंकी भाँति व्यर्थ हैं, केवल सांसारिक लोगोंके बाहिरी दर्शनके सुखकर होनेपर भी निष्फल ही हैं॥ ॥ 74-75 ॥ महाप्रभुके प्रेम, प्रभाव-सौन्दर्यादि-दर्शनसे श्रीभट्टको विस्मय :- प्रभुर प्रेमावेश, आर प्रभाव भक्तिसार। सौन्दर्यादि देखि' भट्टेर हैल चमत्कार ॥ 76 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके प्रेमावेश, भक्तिसारके ज्ञान और उनके प्रभाव, सौन्दर्यादिको देखकर श्रीवल्लभभट्ट बड़े आश्चर्यचकित हुए ॥ 76 ॥ परिकरों सहित महाप्रभुके साथ नौकामें बैठना :- सगणे प्रभुरे भट्ट नौकाते चड़ाञा। भिक्षा दिते निज घरे चलिला लञा ॥ 77 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको उनके परिकरों सहित नौकामें चढ़ाकर श्रीवल्लभ भट्ट उन्हें भिक्षा देनेके लिये अपने घर ले गये ॥ 77 ॥ यमुनाके नीले जलको देखकर श्रीकृष्णके उद्दीपनके कारण महाप्रभुका प्रेमावेश :- यमुनार जल देखि' चिक्वण श्यामल। प्रेमावेशे महाप्रभु हइला विह्वल ॥ 78 ॥ महाप्रभुका यमुनामें कूदना, सभीका भयभीत होना :- हुङ्कार करि' यमुनार जले दिला झाँप। प्रभु देखि' सबार मने हैल भय-काँप ॥ 79 ॥ अनुवाद—यमुनाके चमकदार श्याम वर्णके जलको देखकर महाप्रभु प्रेमावेशमें विह्वल हो गये। हुङ्कार करते हुए महाप्रभुने यमुनाके जलमें छलाँग लगा दी। महाप्रभुको कूदते देखकर सभी भयभीत हो गये और काँपने लगे ॥ 78-79 ॥ महाप्रभुको उठाकर नौकामें बैठाना, महाप्रभुका नृत्य :- आस्ते-व्यस्ते सबे धरि' प्रभुरे उठाइल। नौकार उपरे प्रभु नाचिते लागिल ॥ 80 ॥ अनुवाद—जल्दीसे सभीने पकड़कर महाप्रभुको जलमेंसे निकाला। नौकाके ऊपर आकर महाप्रभु नृत्य करने लगे ॥ 80 ॥ 182 |