श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1629, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/81-88 ] नृत्यके कारण नौकाका डगमगाना :- महाप्रभुर भरे नौका करे टलमल। डुबिते लागिल नौका, झलके भरे जल ॥ 81 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भारसे नौका डगमगाने लगी। नौकाके डगमगानेसे उसमें जल भरने लगा और वह डूबने लगी ॥ 81 ॥ बहिरङ्ग-श्रीभट्टके सामने भावको छुपानेकी चेष्टा करनेपर भी महाप्रभुकी प्रेम-मत्तता :- यद्यपि भट्टेर आगे प्रभुर धैर्य हैल मन। दुर्वार उद्भट प्रेम, नहे सम्वरण ॥ 82 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीवल्लभ भट्टके आगे महाप्रभुने मनमें धैर्य धारण करनेका प्रयास किया, तथापि दुर्दमनीय प्रबल प्रेम होनेके कारण वे उसको सम्वरण नहीं कर पाये ॥ 82 ॥ अनुभाष्य—'दुर्वार'—जिसका प्रकाश रोका अर्थात् बन्द नहीं किया जा सके; 'उद्भट'—उदार, श्रेष्ठ, अभिनव, विचित्र, प्रसिद्ध, असाधारण, प्रबल ॥ 82 ॥ महाप्रभुका धैर्य-धारण, दूसरी ओर उतरना :- देश-पात्र देखि' महाप्रभु धैर्य हइल। आड़ाइलेर घाटे नौका आसि' उत्तरिल ॥ 83 ॥ अनुवाद—स्थान तथा पात्रको देखकर अन्तमें महाप्रभुने धैर्य धारण किया। तब नौका स्थिर होकर चलती हुई आड़ाइल ग्रामके घाटपर आ पहुँची ॥ 83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उस देशमें अधिकांश लोग प्रेमशून्य हैं और सामने उपस्थित श्रीवल्लभ भट्ट भी बहुत ही तर्कप्रिय व्यक्ति हैं; ऐसा देखकर महाप्रभुने धैर्य धारण किया ॥ 83 ॥ अनुभाष्य—देश-पात्र—[जलमें] निमग्न प्रायः नौकाके ऊपर नृत्यादि सुविधाजनक नहीं है; और फिर, श्रीवल्लभ-दीक्षितकी भाँति प्रेमरहित पण्डितके समक्ष सात्त्विकभावका उल्लास नहीं होता ॥ 83 ॥ श्रीवल्लभके द्वारा महाप्रभुके स्नान करनेके बाद उन्हें अपने घरपर लाना :- भये भट्ट सङ्गे रहे, मध्याह्न कराञा। निज-गृहे आनिला प्रभुरे सङ्गेते लञा ॥ 84 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी कुशलताके भयके कारण श्रीवल्लभ भट्ट सब समय उनके साथमें रहे। उन्होंने महाप्रभुको वहींपर स्नान कराया और उन्हें अपने साथ ही अपने घरपर ले आये ॥ 84 ॥ श्रीवल्लभके द्वारा अपने हाथोंसे महाप्रभुके श्रीचरणोंको धोना और सपरिवार चरणामृतका सम्मान :- आनन्दित हञा भट्ट दिल दिव्यासन। आपने करिल प्रभुर पादप्रक्षालन ॥ 85 ॥ महाप्रभुको नये वस्त्र प्रदान :- सवंशे सेइ जल मस्तके धरिल। नूतन कौपीन-बहिर्वास पराइल ॥ 86 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने आनन्दित होकर महाप्रभुको बैठनेके लिये दिव्य-आसन प्रदान किया और अपने हाथोंसे उन्होंने स्वयं महाप्रभुके चरणोंको धोया। फिर उन्होंने और उनके परिवारने उस जलको अपने-अपने मस्तकपर धारण किया। तब उन्होंने महाप्रभुको नया बहिर्वास तथा कौपीन प्रदान किया ॥ 85-86 ॥ महाप्रभुकी पूजा और बलभद्रके द्वारा रसोई बनाना :- गन्ध-पुष्प-धूप-दीपे महापूजा कैल। भट्टाचार्ये मान्य करि' पाक कराइल ॥ 87 ॥ अनुवाद—गन्ध, पुष्प, धूप और दीपसे श्रीवल्लभभट्टने महाप्रभुकी महापूजा की। तब उन्होंने बलभद्र भट्टाचार्यको सम्मान देते हुए उनके द्वारा भोजन बनवाया ॥ 87 ॥ महाप्रभु और दोनों भाइयोंका श्रीवल्लभके घरमें भोजन करना :- भिक्षा कराइल प्रभुरे सस्नेह यतने। रूपगोसाञि-दुइभाइये कराइल भोजने ॥ 88 ॥ । 183