श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1631, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/96-102 ] श्रीनन्दकी ही वन्दना करता हूँ, - जिनके आँगनमें परब्रह्म श्रीकृष्ण लीला करते हैं॥96॥ अनुभाष्य- भवभीताः (संसार-भयातुराः) अपरे (हरिजनेतराः मोक्षाभिलाषिणः) श्रुतिं (वेदशास्त्रम्), इतरे (हरिजनेतराः केचन फलकामि-कर्मिणः) स्मृतिं (लौकिक-प्रयोगानुष्ठानपर-शास्त्रम्), अन्ये (संसारिणः) भारतं (महाभारतादि-सकलजनसुखपाठ्य- ग्रन्थादिकं) भजन्तु; अहं तु इह (जगति) [तं] नन्दं (व्रजेन्द्रं) वन्दे, - यस्य (नन्दस्य) अलिन्दे (बहिर्द्वार-प्राङ्गणे) परंब्रह्म (श्रीकृष्णः) [विराजते]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥96॥ 'आगे कह', - प्रभु-वाक्ये उपाध्याय कहिल। रघुपति उपाध्याय नमस्कार कैल॥97॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - 'आगे कहो।' श्रीरघुपति उपाध्यायने महाप्रभुको नमस्कार किया और महाप्रभुके वचनानुसार उन्होंने एक और श्लोक पढ़ा॥97॥ यमुनाके तटपर कुञ्जविहारी श्रीकृष्ण :- पद्यावली (98)में उद्धृत श्लोक- कम्प्रति कथयितुमीशे सम्प्रति को वा प्रतीतिमायातु। गोपति-तनयाकुञ्जे गोपवधूटी-विटं ब्रह्म ॥98॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥98॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसे बतला सकता हूँ, अब कौन उसपर विश्वास करेगा कि यमुना तटके कुञ्जोंमें गोपवधुओंके लम्पट परमब्रह्म लीला करते हैं? ॥98॥ अनुभाष्य- गोपति-तनयाकुञ्जे (गोपतिः सूर्यः तस्य तनया कालिन्दी तस्याः तटस्थकुञ्जे) गोपवधूटीविटं (गोपवधूच्यः तरुण्यः स्वल्पवयस्काः गोपरामाः,-क्षुद्रार्थे टीप्, तासां विटं लम्पटं) [परं] ब्रह्म (श्रीकृष्णः) [विराजते इति] सम्प्रति कं [जनं] प्रति कथयितुम् ईशे (समर्थो भवामि), कः वा प्रतीतिं (विश्वासम्) आयातु (स्थापयेत्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥98॥ श्रीरघुपतिके द्वारा श्लोक सुनानेपर महाप्रभुमें प्रेमावेश :- प्रभु कहेन, - कह, तँहो पड़े कृष्णलीला। प्रेमावेशे प्रभुर देह-मन आलुयाइला ॥99॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - कुछ और कहो। श्रीरघुपति उपाध्याय श्रीकृष्णलीला पढ़ने लगे। प्रेमावेशमें महाप्रभुके देह और मन शिथिल हो गये॥99॥ अनुभाष्य- 'आलुयाइला'-असंलग्न होना; प्राकृत विचारशून्य होकर मन उदासीन होनेसे दैहिक क्रियाका भी शिथिल होना॥99॥ श्रीउपाध्यायमें विस्मय और महाप्रभुको 'श्रीकृष्ण' मानना :- प्रेम देखि' उपाध्यायेर हैल चमत्कार। 'मनुष्य नहे, इँहो- कृष्ण' - करिल निर्द्धार ॥ 100 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके प्रेमावेशको देखकर श्रीरघुपति उपाध्याय आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने निर्णय किया कि महाप्रभु 'मनुष्य नहीं, ये- श्रीकृष्ण हैं'॥100॥ महाप्रभु और श्रीरघुपतिका संलाप; महाप्रभुके प्रश्न और श्रीउपाध्यायका उत्तर देना :- (1) श्रीकृष्णका "श्याम' रूप ही श्रेष्ठ- प्रभु कहे, - "उपाध्याय, श्रेष्ठ मान' काय ?" 'श्याममेव परं रूपं'- कहे उपाध्याय ॥ 101 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "उपाध्याय, किस रूपको सबसे श्रेष्ठ मानते हो?" श्रीरघुपति उपाध्यायने कहा, - 'श्रीश्यामसुन्दर ही परम रूप हैं'॥101॥ अनुभाष्य-महाप्रभुने श्रीरघुपतिसे जिज्ञासा की- श्रीकृष्ण, श्रीनारायण, राम और नृसिंहादि भगवान्के असंख्य आकार (रूप) हैं; उनमेंसे आपने किस आकारको सर्वश्रेष्ठ रूप जाना है? ॥101॥ (2) मथुरा ही श्रेष्ठ धाम :- " 'श्याम'-रूपेर वासस्थान श्रेष्ठ मान' काय ?" 'पुरी मधुपूरी वरा'- कहे उपाध्याय ॥ 102 ॥ | 185