भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1632, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1632

[ 19/102-108 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, - "श्यामसन्दर रूपके किस पद्यावली (82)में उद्धृत माधवेन्द्रपुरीकृत श्लोक :- वासस्थानको श्रेष्ठ मानते हो?" श्रीरघुपति उपाध्यायने श्याममेव परं रूपं पुरी मधुपुरी वरा। कहा, - 'श्रीमथुरापुरीको ही श्रेष्ठ मानता हूँ॥' 102 ॥ वयः कैशोरकं ध्येयमाद्य एव परो रसः ॥ 106 ॥ अनुभाष्य- श्रीकृष्ण कभी मथुरामण्डलमें, कभी अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 106 ॥ द्वारकापुरीमें परव्योममें अवस्थान करते हैं; इन दोनोंमेंसे अमृतप्रवाह भाष्य-श्यामरूप ही सर्वश्रेष्ठ रूप, मथुरापुरीका ही श्रेष्ठ होना कहा गया है। श्रीरूपपादने मधुपुरी ही श्रेष्ठा पुरी, कैशोर अवस्था ही ध्यान-योग्य भी 'उपदेशामृत'में- "वैकुण्ठाजनितो वरा मधुपुरी" आदि और आद्य अर्थात् शृङ्गार-रस ही श्रेष्ठ रस है॥106॥ कहा है ॥ 102 ॥ अनुभाष्य- (3) किशोर-अवस्था ही आराध्य :- [भगवद्रूपाणां वर्णाकाराणां भगवन्मूर्त्तिभेदानां मध्ये] श्यामं "बाल्य, पौगण्ड, कैशोरे, श्रेष्ठ मान' काय ?" (नन्दनन्दन-श्यामसुन्दरस्य अभ्रवपुः) रूपम् एव परं (श्रेष्ठम्); 'वयः कैशोरकं ध्येयं'-कहे उपाध्याय ॥ 103 ॥ [पुरीणां वैकुण्ठ-मथुरादीनां मध्ये] मधुपुरी पुरी (मथुरा एव) वरा (श्रेष्ठा); [बाल्य-पौगण्ड-कैशोर-वयसां मध्ये यौवनपूर्वं अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, - "श्यामसुन्दरकी बाल्य, धीरदलित-नायकोचितं] कैशोरकं वयः [एव] ध्येयं पौगण्ड तथा कैशोर अवस्थांमेंसे किसे श्रेष्ठ मानते हो?" (निरन्तरमाराध्यम्); [चिन्मयरसभेदानां मध्ये] आद्यः (मधुरः श्रीरघुपति उपाध्यायने कहा, - 'कैशोर अवस्था ही ध्यान शृङ्गारः) रसः एव परः (श्रेष्ठः)। करने योग्य है ॥' 103 ॥ श्लोक-भावानुवाद-पयार संख्या 101-104 का अनुभाष्य- श्रीकृष्णकी तीन प्रकारकी अवस्थाओंमेंसे अनुवाद और अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 106 ॥ आप किसे श्रेष्ठ मानते हो ? ॥ 103 ॥ महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन, उपाध्यायके द्वारा नृत्य :- (4) अप्राकृत शृङ्गार-रस ही सर्वोत्तम प्रेमावेशे प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन। और श्रेष्ठ-आराध्य :- प्रेमे मत्त हञा तेंहो करेन नर्त्तन ॥ 107 ॥ "रसगण-मध्ये तुमि श्रेष्ठ मान' काय?" श्रीवल्लभका विस्मय, पुत्रको महाप्रभुके 'आद्य एव परो रस:' - कहे उपाध्याय ॥ 104 ॥ चरणोंमें समर्पित करना :- देखि' वल्लभ-भट्ट मने चमत्कार हैल। अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, - "रसोंमेंसे तुम किस दुइ (?) पुत्र आनि' प्रभुर चरणे पाड़िल ॥ 108 ॥ रसको श्रेष्ठ मानते हो?" श्रीरघुपति उपाध्यायने कहा, - 'आदिरस (शृङ्गाररस) ही परम रस है॥' 104 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने प्रेमावेशमें श्रीरघुपति उपाध्यायका आलिङ्गन किया। श्रीरघुपति उपाध्याय भी प्रेममें मत्त महाप्रभुको आनन्द :- होकर नृत्य करने लगे। उन दोनोंके प्रेममें मत्त नृत्यको प्रभु कहे, - "भाल तत्त्व शिखाइला मोरे।" देखकर श्रीवल्लभ भट्ट आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने एत बलि' श्लोक पड़े गद्गद-स्वरे ॥ 105 ॥ अपने दोनों [(?) इसी पयारका अनुभाष्य देखें] पुत्रोंको लाकर महाप्रभुके चरणोंमें समर्पित कर दिया ॥ 107-108 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "तुमने मुझे बहुत सुन्दर तत्त्वकी शिक्षा प्रदान की है।" यह कहकर महाप्रभुने अनुभाष्य- 'दुइपुत्र' - श्रीगोपीनाथ और श्रीविट्ठलेश्वर। गद्गद स्वरमें एक श्लोक पढ़ा ॥ 105 ॥ महाप्रभु 1434 अथवा 1435 शकाब्दमें प्रयागमें आये थे, 186 |

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