श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय १९/१०८-११७ ] उस समय श्रीविट्ठलका जन्म नहीं हुआ था। मध्यलीला १८/४७ संख्या देखें॥ १०८ ॥ आड़ाइल-ग्रामवासियोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन और वैष्णवताकी प्राप्ति :- प्रभु देखिबारे ग्रामेर सब लोक आइल। प्रभु-दर्शने सब लोक 'कृष्णभक्त' हइल ॥ १०९ ॥ अनुवाद—महाप्रभुके आनेका समाचार पाकर आड़ाइल-ग्रामके सभी लोग उनके दर्शनके लिये आये। महाप्रभुके दर्शनसे सभी लोग 'कृष्णभक्त' बन गये॥ १०९ ॥ ब्राह्मणोंका निमन्त्रण, श्रीवल्लभके द्वारा मना करना :- ब्राह्मणसकल करेन प्रभुर निमन्त्रण। वल्लभ-भट्ट ताँ सबारे करेन निवारण ॥ ११० ॥ “प्रेमान्मादे पड़े गोसाञि मध्य-यमुनाते। प्रयागे चालाइब, इँहा ना दिब रहिते ॥ १११ ॥ याँर इच्छा, प्रयागे याञा करिबे निमन्त्रण।” एत बलि' प्रभु लञा करिल गमन ॥ ११२ ॥ अनुवाद—उस ग्रामके सभी ब्राह्मण महाप्रभुको निमन्त्रण चाहते थे, किन्तु श्रीवल्लभ भट्टने उन सबको ऐसे करनेसे रोका और कहा,—“यहाँ आते हुए प्रेमोन्मादके कारण श्रीचैतन्य गोसाईं बीच यमुनामें कूद पड़े थे, इसलिये मैं इन्हें प्रयाग ले जाऊँगा, यहाँपर नहीं रहने दूँगा। जिसकी इच्छा हो, वह प्रयाग जाकर इन्हें निमन्त्रण करे।” इतना कहकर श्रीवल्लभ भट्ट महाप्रभुको लेकर चल दिये॥ ११०-११२ ॥ महाप्रभुको लेकर नौकासे दूसरी ओर प्रयागमें श्रीवल्लभका आगमन :- गङ्गा-पथे महाप्रभुरे नौकाते बसाञा। प्रयागे आइला भट्ट गोसाञिरे लञा ॥ ११३ ॥ अनुवाद—[यमुनाके मार्गको छोड़कर] श्रीवल्लभ भट्ट महाप्रभुको नौकामें बैठाकर गङ्गाके मार्गसे प्रयागमें ले आये॥ ११३ ॥ महाप्रभुके द्वारा दशाश्वमेध-घाटपर एकान्तमें श्रीरूपमें शक्तिका सञ्चार और शिक्षा-प्रदान :- लोक-भिड़-भये प्रभु 'दशाश्वमेधे' याञा। रूप-गोसाञिरे शिक्षा करा'न शक्ति सञ्चारिया ॥ ११४ ॥ अनुवाद—लोगोंकी भीड़के भयसे महाप्रभु दशाश्वमेध घाटपर गये। वहींपर महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीमें शक्तिका सञ्चार करके उन्हें शिक्षा प्रदान की॥ ११४ ॥ अनुभाष्य—भगवान् अनन्तशक्तिसम्पन्न हैं। शक्तिमान् भगवान्से सुकृतिमान् जीव कृपा-शक्ति प्राप्त करता है। मायाके चङ्गुलमें पड़कर श्रीकृष्ण-विमुखतारूपी अज्ञानके कारण जीव सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन तत्त्वमें प्रवेश नहीं कर पाता। भगवान् श्रीगौरहरिने कृपा करके श्रीरूप गोस्वामीको तत्त्वको समझनेकी शक्ति पहले अर्पण करके बादमें उन्हें तत्त्व-शिक्षा प्रदान की॥ ११४ ॥ श्रीकृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व और रसतत्त्वकी सीमातक शिक्षा :- कृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व, रसतत्त्व-प्रान्त। सब शिखाइल प्रभु भागवत-सिद्धान्त ॥ ११५ ॥ श्रीरामानन्दके द्वारा कहे भक्तिसिद्धान्तोंका श्रीरूपको उपदेश :- रामानन्द-पाशे यत सिद्धान्त शुनिला। रूपे कृपा करि' ताहा सब सञ्चारिला ॥ ११६ ॥ श्रीरूपके हृदयमें सभी तत्त्वोंकी स्फूर्ति :- श्रीरूप-हृदये प्रभु शक्ति सञ्चारिला। सर्वतत्त्व-निरूपिया 'प्रवीण' करिला ॥ ११७ ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीको श्रीकृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व तथा रसतत्त्वकी सीमा तक शिक्षा प्रदान की। तब उन्होंने श्रीरूप गोस्वामीको श्रीमद्भागवतके चरम सिद्धान्तके विषयमें बतलाया। महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायसे जितने सिद्धान्त सुने थे, उन्होंने श्रीरूप गोस्वामीपर कृपा करके उन सब सिद्धान्तोंका उनमें सञ्चार किया। महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीके हृदयमें शक्ति सञ्चारित की । 187