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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

उन्नीसवाँ अध्याय १९/१०८-११७ ] उस समय श्रीविट्ठलका जन्म नहीं हुआ था। मध्यलीला १८/४७ संख्या देखें॥ १०८ ॥ आड़ाइल-ग्रामवासियोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन और वैष्णवताकी प्राप्ति :- प्रभु देखिबारे ग्रामेर सब लोक आइल। प्रभु-दर्शने सब लोक 'कृष्णभक्त' हइल ॥ १०९ ॥ अनुवाद—महाप्रभुके आनेका समाचार पाकर आड़ाइल-ग्रामके सभी लोग उनके दर्शनके लिये आये। महाप्रभुके दर्शनसे सभी लोग 'कृष्णभक्त' बन गये॥ १०९ ॥ ब्राह्मणोंका निमन्त्रण, श्रीवल्लभके द्वारा मना करना :- ब्राह्मणसकल करेन प्रभुर निमन्त्रण। वल्लभ-भट्ट ताँ सबारे करेन निवारण ॥ ११० ॥ “प्रेमान्मादे पड़े गोसाञि मध्य-यमुनाते। प्रयागे चालाइब, इँहा ना दिब रहिते ॥ १११ ॥ याँर इच्छा, प्रयागे याञा करिबे निमन्त्रण।” एत बलि' प्रभु लञा करिल गमन ॥ ११२ ॥ अनुवाद—उस ग्रामके सभी ब्राह्मण महाप्रभुको निमन्त्रण चाहते थे, किन्तु श्रीवल्लभ भट्टने उन सबको ऐसे करनेसे रोका और कहा,—“यहाँ आते हुए प्रेमोन्मादके कारण श्रीचैतन्य गोसाईं बीच यमुनामें कूद पड़े थे, इसलिये मैं इन्हें प्रयाग ले जाऊँगा, यहाँपर नहीं रहने दूँगा। जिसकी इच्छा हो, वह प्रयाग जाकर इन्हें निमन्त्रण करे।” इतना कहकर श्रीवल्लभ भट्ट महाप्रभुको लेकर चल दिये॥ ११०-११२ ॥ महाप्रभुको लेकर नौकासे दूसरी ओर प्रयागमें श्रीवल्लभका आगमन :- गङ्गा-पथे महाप्रभुरे नौकाते बसाञा। प्रयागे आइला भट्ट गोसाञिरे लञा ॥ ११३ ॥ अनुवाद—[यमुनाके मार्गको छोड़कर] श्रीवल्लभ भट्ट महाप्रभुको नौकामें बैठाकर गङ्गाके मार्गसे प्रयागमें ले आये॥ ११३ ॥ महाप्रभुके द्वारा दशाश्वमेध-घाटपर एकान्तमें श्रीरूपमें शक्तिका सञ्चार और शिक्षा-प्रदान :- लोक-भिड़-भये प्रभु 'दशाश्वमेधे' याञा। रूप-गोसाञिरे शिक्षा करा'न शक्ति सञ्चारिया ॥ ११४ ॥ अनुवाद—लोगोंकी भीड़के भयसे महाप्रभु दशाश्वमेध घाटपर गये। वहींपर महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीमें शक्तिका सञ्चार करके उन्हें शिक्षा प्रदान की॥ ११४ ॥ अनुभाष्य—भगवान् अनन्तशक्तिसम्पन्न हैं। शक्तिमान् भगवान्‌से सुकृतिमान् जीव कृपा-शक्ति प्राप्त करता है। मायाके चङ्गुलमें पड़कर श्रीकृष्ण-विमुखतारूपी अज्ञानके कारण जीव सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन तत्त्वमें प्रवेश नहीं कर पाता। भगवान् श्रीगौरहरिने कृपा करके श्रीरूप गोस्वामीको तत्त्वको समझनेकी शक्ति पहले अर्पण करके बादमें उन्हें तत्त्व-शिक्षा प्रदान की॥ ११४ ॥ श्रीकृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व और रसतत्त्वकी सीमातक शिक्षा :- कृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व, रसतत्त्व-प्रान्त। सब शिखाइल प्रभु भागवत-सिद्धान्त ॥ ११५ ॥ श्रीरामानन्दके द्वारा कहे भक्तिसिद्धान्तोंका श्रीरूपको उपदेश :- रामानन्द-पाशे यत सिद्धान्त शुनिला। रूपे कृपा करि' ताहा सब सञ्चारिला ॥ ११६ ॥ श्रीरूपके हृदयमें सभी तत्त्वोंकी स्फूर्ति :- श्रीरूप-हृदये प्रभु शक्ति सञ्चारिला। सर्वतत्त्व-निरूपिया 'प्रवीण' करिला ॥ ११७ ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीको श्रीकृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व तथा रसतत्त्वकी सीमा तक शिक्षा प्रदान की। तब उन्होंने श्रीरूप गोस्वामीको श्रीमद्भागवतके चरम सिद्धान्तके विषयमें बतलाया। महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायसे जितने सिद्धान्त सुने थे, उन्होंने श्रीरूप गोस्वामीपर कृपा करके उन सब सिद्धान्तोंका उनमें सञ्चार किया। महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीके हृदयमें शक्ति सञ्चारित की । 187

[ 19/115-121 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला और समस्त तत्त्वोंका निरूपण करके उन्हें उनमें 'प्रवीण' बना दिया॥115-117॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'प्रान्त'—सीमा॥115॥ कविकर्णपूरके स्वकृत-ग्रन्थमें श्रीरूप-शिक्षाका उल्लेख :- शिवानन्द-सेनेर पुत्र 'कविकर्णपूर'। 'रूपेर-मिलन' स्व-ग्रन्थे लिखियाछेन प्रचुर ॥118॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनके पुत्र 'श्रीकविकर्णपूर'ने स्वरचित ग्रन्थ (श्रीचैतन्यचन्द्रोदयनाटक)में महाप्रभुसे 'श्रीरूपके मिलन'का विस्तारसे वर्णन किया है॥118॥ श्रीरूप-सनातनके द्वारा महाप्रभुकी व्रजलीला-कथा-प्रकाश :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/38)— कालेन वृन्दावनकेलिवार्त्ता लुप्तेति तां ख्यापयितुं विशिष्य। कृपामृतेनाभिषिषेच देव- स्तत्रैव रूपञ्च सनातनञ्च ॥119॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥119॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कालके प्रभावसे वृन्दावनकी रसक्रीड़ाओंकी कथा लुप्त हो गयी थी, उन कथाओंका विशेषरूपसे विस्तार करनेके लिये श्रीगौराङ्गदेवने कृपारूपी अमृतके द्वारा वहाँपर श्रीरूप एवं श्रीसनातनको अभिषिक्त किया था॥119॥ अनुभाष्य- कालेन (भगवदिच्छारूप-कालवशेन) वृन्दावनकेलिवार्त्ता (वृन्दावनसम्बन्धिनी रसक्रीड़ा-कथा) लुप्ता (आच्छन्ना आसीत्) इति (अतः) तां (कथां) विशिष्य (विशिष्टां कृत्वा) ख्यापयितुं (प्रकाशयितुं) देवः (श्रीगौरहरिः) तत्रैव वृन्दावने रूपं च सनातनं च कृपामृतेन (करुणासुधा-वारिणा) अभिषिषेच (अभिषिक्तवान्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥119॥ श्रीरूपपर कृपा करनेवाले महाप्रभु :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/29)में- यः प्रागेव प्रियगुणगणैर्गाढबद्धोऽपि मुक्तो गेहाध्यासाद्रस इव परो मूर्त्त एवाप्यमूर्त्तः। प्रेमालापैर्दृढतरपरिष्वङ्गरङ्गैः प्रयागे तं श्रीरूपं सममनुपमेनानुजग्राह देवः॥120॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो पहले प्रियगुणसमूहके (महाप्रभुके गुणोंके) द्वारा गाढ़-बद्ध होनेके कारण गृहकार्योंसे मुक्त हो गये थे, उन श्रीरूपके ऊपर, उनके छोटे भाई श्रीअनुपमके साथ, स्वयं रसके समान अमूर्त्त होनेपर भी श्रेष्ठ मूर्तिमान् श्रीगौराङ्गदेवने प्रयागमें प्रेमालाप और दृढ़तर (गाढ़) आलिङ्गनके द्वारा अनुग्रह किया था॥120॥ अनुभाष्य- यः (श्रीरूपः) प्रागेव प्रियगुणगणैः (प्रियस्य गौरस्य गुणगणैः गुणसमूहैः) गाढ़बद्धः (गाढ़म् अतिशयं बद्धः आसक्तः) अपि गेहाध्यासात् (लीलाभिनीत-गृहासक्तेः) मुक्तः (त्यक्तस्पृहः) आसीत्, तं (श्रीरूपम्) अनुपमेन (अनुजेन) समं (सार्द्धम्) अमूर्त्तः अपि परः मूर्त्तः रसः इव (स्वरूपं प्रकटीकृत्य) देवः (गौरः) प्रयागे (गङ्गायामुनसङ्गमे) प्रेमालापैः दृढ़तरपरिष्वङ्गरङ्गैः (गाढ़ालिङ्गनविलासैः) अनुजग्राह (अनुकम्पां कृतवान्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥ महाप्रभुके द्वितीय स्वरूप, महाप्रभुके सर्वस्व श्रीरूपमें भक्तिरसतत्त्व-शास्त्रका विस्तार :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/30)में - प्रियस्वरूपे दयितस्वरूपे प्रेमस्वरूपे सहजाभिरूपे। निजानुरूपे प्रभुरेकरूपे ततान रूपे स्वविलासस्वरूपे ॥ 121 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥121॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अपने प्रियस्वरूप, दयितस्वरूप, प्रेमस्वरूप, स्वाभाविक मनोज्ञरूपसे युक्त, मुख्य रूप एवं 188 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/121-131 अपने अनुरूप, - ऐसे अपने विलासरूप श्रीरूप गोस्वामीमें महाप्रभुने (भक्तिरस शास्त्रका) विस्तार किया था ॥ 121 ॥ अनुभाष्य- प्रियस्वरूपे (प्रियः भक्तः तत्स्वरूपः यः तस्मिन् भक्तरूपे) दयितस्वरूपे (दत्तम् आत्मस्वरूपं यस्मै तस्मिन्) प्रेमस्वरूपे (प्रेममय-निजाभिन्न-रूपे) सहजाभिरूपे (सहजं स्वाभाविकम् अभिरूपं मनोज्ञं रूपं यस्य तस्मिन्) निजानुरूपे (प्रेमप्रकाशकतया सदृशं रूपं यस्य तस्मिन्) एकरूपे (एकं मुख्यं रूपं यस्य तस्मिन्) स्वविलासकूपे (स्वस्य स्वस्वरूपस्य विलासः लीलार्थं रूपं यस्य तस्मिन्) रूपे (श्रीरूप-गोस्वामिनि) प्रभुः (श्रीमन्महाप्रभुः) ततान (श्रीरूपद्वारेव भक्तिरसशास्त्रं प्रकाशितवान्)। श्लोक-भावानुवाद-प्रिय भक्त स्वरूप है जिनका, उन भक्तरूप, जिन्हें महाप्रभुने अपना स्वरूप दे दिया है, जो प्रेममय महाप्रभुसे अभिन्नरूप हैं, स्वाभाविक मनोज्ञ रूप है जिनका, प्रेमका प्रकाश होनेके कारण महाप्रभुके जैसा रूप है जिनका, जो महाप्रभुका ही एक मुख्य रूप हैं और अपने स्वरूपका विलास करनेके लिये अर्थात् लीला करनेके लिये जिनका रूप है, ऐसे श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा महाप्रभुने भक्तिशास्त्रोंको प्रकाशित करवाया ॥ 121 ॥ एइमत कर्णपूर लिखे स्थाने-स्थाने। प्रभु कृपा कैला यैछे रूप-सनातने ॥ 122 ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीकविकर्णपूरने स्वरचित ग्रन्थमें स्थान-स्थानपर महाप्रभुने जिस प्रकार श्रीरूप-सनातनपर कृपा की थी, उसका वर्णन किया है ॥ 122 ॥ अनुभाष्य- 'स्थाने स्थाने'-श्रीचैतन्यचन्द्रोदय ग्रन्थमें भिन्न-भिन्न स्थानोंपर ॥ 122 ॥ श्रीरूप-सनातन-सभी श्रीगौरभक्तोंके सर्वाधिक प्रिय :- महाप्रभुर यत बड़ बड़ भक्त मात्र। रूप-सनातन-सबार कृपा-गौरव-पात्र ॥ 123 ॥ अनुवाद-श्रीरूप-सनातन महाप्रभुके सभी बड़े-बड़े भक्तोंके कृपा तथा गौरवके पात्र थे ॥ 123 ॥ सभीके आदरका दृष्टान्त; वृन्दावन दर्शन करनेवालोंसे श्रीरूप-सनातनके सम्बन्धमें आग्रहपूर्वक जिज्ञासा :- केह यदि देशे याय देखि' वृन्दावन। ताँरे प्रश्न करेन प्रभुर पार्षदगण ॥ 124 ॥ “कह,-ताँहा कैछे रहे रूप-सनातन? कैछे रहे, कैछे वैराग्य, कैछे भोजन ? ॥ 125 ॥ कैछे अष्टप्रहर करेन श्रीकृष्ण-भजन?” तबे प्रशंसिया कहे सेइ भक्तगण ॥ 126 ॥ श्रीरूप-सनातनके वैराग्ययुक्त-भक्तिरसके पानकी मत्तताका वर्णन :- "अनिकेत दुँहे, वने यत वृक्षगण। एक एक वृक्षेरे तले एक एक रात्रि शयन ॥ 127 ॥ विप्रगृहे स्थूलभिक्षा, काँहा माधुकरी। शुष्क रुटी-चाना चिबाय, भोग परिहरि' ॥ 128 ॥ करों या-मात्र हाते, काँथा, छिँड़ा-बहिर्वास। कृष्णकथा, कृष्णनाम, नर्त्तन-उल्लास ॥ 129 ॥ अष्टप्रहर कृष्णभजन, चारिदण्ड शयने। नाम-सङ्कीर्त्तन-प्रेमे सेह नहे कोन दिने ॥ 130 ॥ कभु भक्तिरसशास्त्र करये लिखन। चैतन्यकथा शुने, करे चैतन्य-चिन्तन ॥ " 131 ॥ अनुवाद-जो कोई भी श्रीवृन्दावनके दर्शन करके अपने गाँवमें पहुँचता, उससे महाप्रभुके परिकर प्रश्न करते, - "बतलाओ तो, वहाँ रूप और सनातन कैसे रहते हैं? वे क्या करते हैं? उनका वैराग्य कैसा है? वे क्या भोजन करते हैं? वे कैसे अष्टप्रहर श्रीकृष्णका भजन करते हैं?" तब वृन्दावनसे लौटा भक्त श्रीरूप-सनातनकी प्रशंसा करते हुए कहता, - "दोनोंका ही रहनेका कोई निर्दिष्ट स्थान नहीं है। वे दोनों एक-एक वृक्षके नीचे एक-एक रात्रि व्यतीत करते हैं। वे कभी तो ब्राह्मणके घरमें स्थूल भिक्षा ग्रहण करते हैं और कभी कहींपर माधुकरी माँगकर खा लेते हैं। । 189

[ 19/124-134 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भोगका सम्पूर्ण रूपसे त्याग करके कभी सूखी रोटी और चना चबाते हैं। वे हाथमें केवल जलका पात्र ही रखते हैं, पुराने वस्त्रोंका बना कम्बल तथा फटा हुआ बहिर्वास धारण करते हैं। श्रीकृष्णकथा, श्रीकृष्णनाम और नृत्यमें ही उल्लास प्राप्त करते हैं। वे आठों प्रहर श्रीकृष्णका भजन करते हैं, केवल चार दण्ड ही शयन करते हैं। कभी-कभी तो नाम-सङ्कीर्तन और श्रीकृष्ण प्रेममें आविष्ट होनेके कारण वह भी नहीं होता। वे कभी भक्तिरससे सम्बन्धित शास्त्रका लेखन कार्य करते हैं और कभी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कथाका श्रवण करते हैं और श्रीचैतन्य महाप्रभुका चिन्तन करते हैं॥"124-131 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'करोँया' - संन्यासियोंके हाथमें रहनेवाला जलका पात्र ॥ 129 ॥ अनुभाष्य- 'स्थूलभिक्षा'-जिस भिक्षाको ग्रहण करनेपर उदरपूर्तिके लिये अन्य किसी व्यक्तिसे और किसी खाद्य पदार्थकी भिक्षा नहीं करनी पड़ती। 'माधुकरी' - मधुमक्खी जिस प्रकार अनेक पुष्पोंसे मधु संग्रह करके अपने छत्तेमें ले जाती है, उसी प्रकार बहुतसे स्थानोंसे थोड़ा-थोड़ा खाद्य पदार्थ संग्रह करके जो उदर भरते हैं, उन्हींकी वृत्ति ही 'माधुकरी'के नामसे जानी जाती है। 'भोग परिहरि'-सुख प्राप्तिकी आशासे इन्द्रियवृत्तिको वर्द्धित करनेके लिये जो सब उत्तेजक पदार्थ उपयोग किये जाते हैं, उन सबका त्याग करके वे भजनके उपयोगी जीवनकी रक्षा करनेके लिये सूखी रोटी और भुने हुए चनेके द्वारा जीवनका निर्वाह करते थे। ऐसे वैराग्ययुक्त जीवनमें वे कभी तो भक्तिरस शास्त्र लिखकर श्रीकृष्णभजन करते थे, कभी नाम-सङ्कीर्तन और कभी श्रीगौरलीला-स्मरण-मनन आदिके द्वारा श्रीकृष्णभजन करते थे। प्राकृत सहजियाओंमें यह विश्वास प्रबल है कि भक्तिशास्त्रोंको लिखना और पढ़ना तो नये साधकोंके लिये है। इनका परित्याग करके शास्त्रादिकी चर्चासे विराम प्राप्त करना ही भक्तिका 'साधन' है। श्रीरूपानुग-भक्तोंकी इस प्रकारकी बातोंमें आस्था नहीं है। किन्तु यदि साधकका शास्त्रोंके लिखने-पढ़ने आदिके द्वारा धन-उपार्जन करके इन्द्रिय- तृप्ति, जड़़ीय प्रतिष्ठा अथवा पूजा, लाभ अथवा अन्य कोई तुच्छ उद्देश्य हो, जिसे 'उपशाखा' कहा जाता है, तब उस प्रकारके भ्रष्टाचार-परायण व्यक्तिका कभी भी मङ्गल नहीं होता। वास्तविक श्रीमद्रूपानुगोंकी ऐसी तुच्छ फलभोगमूलक कर्मवासना नहीं होती ॥ 128-131 ॥ श्रीरूप-सनातनके भजनके आचरणको सुनकर भक्तोंको सुख :- एइकथा शुनि' महान्तेर महासुख हय। चैतन्येर कृपा याँहे, ताँहे कि विस्मय ? ॥ 132 ॥ अनुवाद-श्रीरूप-सनातनसे सम्बन्धित इन बातोंको सुनकर महाप्रभुके परिकर बहुत प्रसन्न होते। जिनपर श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपा हो, उनके विषयमें यह सब सुनकर कैसा विस्मय ? ॥ 132 ॥ स्वरचित 'भक्तिरसामृतसिन्धु'में महाप्रभुकी कृपाका वर्णन :- चैतन्येर कृपा रूप लिखियाछेन आपने। रसामृतसिन्धु-ग्रन्थेर मङ्गलाचरणे ॥ 133 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपाके विषयमें श्रीरूप गोस्वामीने स्वरचित भक्तिरसामृतसिन्धु ग्रन्थके मङ्गलाचरणमें स्वयं यह लिखा है- ॥ 133 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/2) :- हृदि यस्य प्रेरणया प्रवर्त्तितोऽहं वराकरूपोऽपि। तस्य हरेः पदकमलं वन्दे चैतन्यदेवस्य ॥ 134 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 134 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हृदयमें जिनकी प्रेरणाके द्वारा सामान्य कङ्गालरूपी मैं भक्तिग्रन्थकी रचनामें प्रवृत्त हुआ हूँ, उन श्रीचैतन्यदेव हरिके चरणकमलोंकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 134 ॥ 190 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/134-139 ] अनुभाष्य- [निज-भागवतसेवा-प्रवर्त्तकं स्वाश्रयचरणकमलं भगवन्तं गौरहरिं नमस्करोति-] अहं वराकरूपः (क्षुद्र-दीन-रूपः, स्वयं गोस्वामिकुलचूड़ामणिरपि अतिदैन्यवशादेवेयमुक्तिः) अपि यस्य (कर्त्तृभूतस्य गौरस्य) हृदि (मनसि) प्रेरणया (हृद्विषयानुज्ञया) प्रवर्त्तितः (प्रेरितः), तस्य चैतन्यदेवस्य हरेः (गौरहरेः कृष्णचैतन्यस्य) पदकमलं (चरणारविन्दम्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—[अपनी भगवद्भक्तिके प्रवर्तक भगवान् श्रीगौरहरिको, विशेषरूपसे उनके श्रीचरणकमलोंको नमस्कार करते हुए कह रहे हैं-] मैं अति दीन (स्वयं गोस्वामिकुलके चूड़ामणि होनेपर भी अति दैन्यवशतः ऐसा कह रहे हैं) हृदयमें जिनकी प्रेरणासे भक्तिग्रन्थकी रचनामें प्रवृत्त हुआ हूँ, उन श्रीकृष्णचैतन्यदेवके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥134॥ प्रयागमें दस दिन तक महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको शिक्षा-प्रदान :- एइमत दशदिन प्रयागे रहिया। श्रीरूपे शिक्षा दिल शक्ति सञ्चारिया॥135॥ अनुवाद—महाप्रभुने इस प्रकार दस दिन तक प्रयागमें रहकर श्रीरूपमें शक्ति सञ्चार करके उन्हें शिक्षा प्रदान की॥135॥ श्रीरूप-शिक्षा; सूत्राकारमें भक्तिरसके लक्षणका वर्णन :- प्रभु कहे,—“शुन, रूप, भक्तिरसेर लक्षण। सूत्ररूपे कहि, विस्तार ना याय वर्णन॥136॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–‘हे रूप सुनो! भक्तिरसके लक्षणका सूत्ररूपमें ही वर्णन करूँगा, क्योंकि इसका विस्तारसे वर्णन नहीं किया जा सकता॥136॥ महाप्रभुकी कृपासे श्रीरूपके द्वारा भक्तिरसामृतसिन्धुकी एक बूँदका पान :— पारापार-शून्य गभीर भक्तिरस-सिन्धु। तोमाय चाखाइते तार कहि एक ‘बिन्दु’॥137॥ अनुवाद—भक्तिरस-सिन्धु ओर-छोररहित है और इसकी गहराईको भी कोई नहीं जान सकता। तुम्हें भक्तिरस-सिन्धुको चखानेके लिये इसकी एक बिन्दुकी व्याख्या कर रहा हूँ॥137॥ अनुभाष्य—‘पारापार-शून्य’–पार (अर्थात्) एक ओर, अपार (अर्थात्) दूसरी ओर; इसलिये जिसके दोनों ओरके बीचमें किसी भी ओरकी कोई सीमा नहीं है॥137॥ सर्वप्रथम ब्रह्माण्डके बद्धजीवोंका वर्णन; संख्यामें बहुत अधिक :— एइमत ब्रह्माण्ड भरि’ अनन्त जीवगण। चौराशी-लक्ष योनिते करये भ्रमण॥138॥ अनुवाद—इस प्रकार इस ब्रह्माण्डमें अनन्त जीव हैं जो चौरासी लाख योनियोंमें इस ब्रह्माण्डमें भ्रमण कर रहे हैं॥138॥ अनुभाष्य—‘चौराशी लक्ष्योनि’ (विष्णुपुराणमें)— “जलजा नवलक्षाणि स्थावरा लक्षविंशतिः। कृमयो रुद्रसंख्याकाः पक्षिणां दशलक्षकम्। त्रिंशल्लक्षाणि पशवः चतुलंक्षाणि मानुषाः॥” [अर्थात् “जलचरोंकी नौ लाख योनियाँ हैं, बीस लाख योनियाँ स्थावर पेड़-पौधोंकी हैं, कीट-पतंगोंकी ग्यारह लाख योनियाँ हैं, पक्षियोंकी दस लाख योनियाँ हैं, पशुओंकी तीस लाख योनियाँ हैं और मनुष्योंकी चार लाख योनियाँ हैं।”]॥138॥ जीवात्मा और जीवके स्वरूपका परिमाण :— केशाग्र-शतैक-भाग पुनः शतांश करि। तार सम सूक्ष्म जीवेर ‘स्वरूप’ विचारि॥139॥ अनुवाद—केशके अग्रभागको सौ भागोंमें बाँटनेके बाद, उसके एक भागको पुनः सौ भागोंमें बाँटनेपर, उस एक भागके समान सूक्ष्म जीवका स्वरूप है॥139॥ । 191

[ 19/139-143 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य-मुण्डकमें 3/1/9-“एषोऽणुरात्मा” अर्थात् यह आत्मा अणुके समान सूक्ष्म है ॥139॥ शास्त्र-प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (10/87/30)में श्रुति-स्तव-व्याख्यामें उद्धृत-श्लोक- केशाग्रशतभागस्य शतांशसदृशात्मकः। जीवः सूक्ष्मस्वरूपोऽयं संख्यातीतो हि चित्कणः॥140॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥140॥ अमृतप्रवाह भाष्य-केशके अग्रभागके सौ भाग करनेपर उसके एक भागके पुनः सौवे अंशके सदृश स्वरूप ही जीवका सूक्ष्म स्वरूप है; जीव चित्कण और संख्यातीत (असंख्य) हैं॥140॥ अनुभाष्य- अयं जीवः हि केशाग्रशतभागस्य (अति-सूक्ष्मकेशाग्रायामस्य शतधा विभक्तस्य, पुनः तादृश-परमसूक्ष्मांशस्य) शतांशसदृशात्मकः (पुनः शतखण्डांशतुल्यः) सूक्ष्मस्वरूपः (परमाणुचेतनः चित्कणः सूक्ष्मचिदणुरखण्डः) संख्यातीतः (अनन्तसंख्यः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥140॥ श्वेताश्वतर उपनिषदके मन्त्रानुसार पञ्चदशी चित्रदीप (81)में :- बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेय इति चाह परा श्रुतिः ॥141॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥141॥ अमृतप्रवाह भाष्य-केशके अग्रभागके सौवे भागको लेकर उसे सौ भागोंमें विभाग करनेसे जो सूक्ष्म भाग होता है, जीव-वैसा सूक्ष्म है, प्रधान श्रुतिओंने ऐसा कहा है॥141॥ अनुभाष्य- [यः] बालाग्रशतभागस्य (केशाग्रस्य शतधा खण्डितस्य, तस्य पुनः) शतधा कल्पितस्य (विभक्तस्य) च भागः (खण्डः),- सः [एव] जीवः (जीवस्वरूपाकारः) विज्ञेयः (ज्ञातव्यः) इति च परा (श्रेष्ठा) श्रुतिः (श्वेताश्वतरप्रमुखा) आह। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥141॥ श्रीमद्भागवत (11/16/11)में :- सूक्ष्माणामप्यहं जीवः ॥ 142 ॥ अनुवाद-सूक्ष्म वस्तुओं अर्थात् अणुओंके मध्य मैं जीवात्मा हूँ॥142॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी-किसी पाठमें लिखा हुआ है,- श्रीमद्भागवतमें उद्धवके प्रति श्रीभगवद् वाक्य- “गुणिनामप्यहं सूत्रं महताञ्च महानहम्। सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः॥” सूक्ष्मगणोंमें मैं (भगवान्) 'जीव' (भेदाभेद-प्रकाश) हूँ।॥142॥ अनुभाष्य-भगवान्की विभूतियोंका श्रवण करनेकी इच्छा करनेपर श्रीउद्धवके प्रति श्रीकृष्णकी उक्ति- अहं (चिदचिदीश्वरः अद्वयज्ञानात्मकः श्रीभगवान्) सूक्ष्माणां (अणूनाम् अपि मध्ये) जीवः (जीवात्मा)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥142॥ श्रीमद्भागवत (10/87/30)में :- अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्वगता- स्तर्हि न शास्यतेति नियमो ध्रुव नेतरथा। अजनि च यन्मयं तद्विमुच्य नियन्तृ भवेत् सममनुजानतां यदमतं मतदुष्टतया ॥143॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥143॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे ध्रुव (सर्वाश्रय) ! यदि सभी अनन्त शरीरधारी जीव ध्रुव अर्थात् [आपसे उत्पन्न नहीं होकर] परम नित्य और सर्वव्यापी होते, तो फिर उनका आपके शासनके अधीन रहनेका नियम नहीं होता। यदि जीवको 'अणु', सामान्यतः 'नित्य' कहकर स्वीकार किया जाय, तभी वे आपके अधीन होते हैं। [अग्निरूप 192 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/143-148 ] आपसे चिद्गारीरूप] होकर जिन जीवोंने जन्मग्रहण किया है, आप उनके अपरित्यज्य नियन्ता हैं। इसलिये जो जीव और आपको 'एक' मानते हैं, उनका मत- 'मतवाद'से दूषित है ॥ 143 ॥ अनुभाष्य-जनलोकमें ब्रह्मसत्र यज्ञमें श्रवण करनेके इच्छुक मुनियोंके निकट कुमारोंमें अन्यतम ब्रह्मर्षि सनन्दन श्रुतिओंके द्वारा किये गये भगवद्-स्तवका वर्णन कर रहे हैं- हे ध्रुव (सर्वाश्रय, नित्य)! अपरिमिताः (वस्तुतः एव अनन्ताः) ध्रुवाः (नित्याः) तनुभृतः (शरीरधारिणः जीवाः) यदि सर्वगताः (विभवः व्यापकाः स्युः), तर्हि शास्यता (तच्छास्यता) इति यः त्वया नियमः (नियमनं) सः न स्यात्, इतरथा च [घटेत, नियम्यनियन्तृ-भावावस्थितत्वात्]; यन्मयं (यत् अग्न्यादिमयं स्फुलिङ्गादिकं कार्यं जीवाख्यं वस्तु) अजनि (जातं, तेषां जीवानां) नियन्तृ (शास्तु) भवेत्, तत् अविमुच्य (तान् जीवान् अपरित्यज्य यत् उपादानरूपं परमात्मानं जीवतत्त्वेन) समम् अनुजानतां (केवलाद्वैतवादिनां) मतदुष्टतया (मतस्य दुष्टतया अशुद्धत्वेन) अमतम् एव (अज्ञातप्रायम् अविषयत्वात्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥ विरूप-भेदसे जीव दो प्रकारके - 1) स्थावर, 2) जङ्गम; जङ्गम तीन प्रकारके - जल, स्थल और आकाशके :- तारे मध्ये 'स्थावर', 'जङ्गम'-दुइ भेद। जङ्गमे तिर्यक्-जल-स्थलचर-विभेद ॥ 144 ॥ अनुवाद - माया जगत्में अनन्त जीव 'स्थावर' तथा 'जङ्गम' - इन दो प्रकारके हैं। जङ्गम जीवोंमें पक्षी, जलचर तथा स्थलचर - ये तीन भेद हैं ॥ 144 ॥ अनुभाष्य - 'तार मध्ये' - ब्रह्माण्डके अन्तर्गत बद्धजीवोंमें ॥ 144 ॥ स्थलचरका श्रेष्ठत्व; उनमेंसे मनुष्य जातिकी सर्वश्रेष्ठता; उनमेंसे कर्मी, ज्ञानी और भक्तोंमें तारतम्य-तुलना :- तार मध्ये मनुष्य-जाति अति अल्पतर। तार मध्ये म्लेच्छ, पुलिन्द, बौद्ध, शबर ॥ 145 ॥ अनुवाद - इन जङ्गम जीवोंमें मनुष्य-जातिकी संख्या अति अल्पतर है। और मनुष्य-जातिमें भी म्लेच्छ, पुलिन्द, बौद्ध तथा शबरादि लोग हैं ॥ 145 ॥ अनुभाष्य - 'तार मध्ये' - वेदोंमें निष्ठा रखनेवालोंके विपरीत मनुष्य-जातिमें ॥ 145 ॥ वेदनिष्ठ-मध्ये अर्द्धेक वेद 'मुखे' माने। वेदनिषिद्ध पाप करे, धर्म नाहि गणे ॥ 146 ॥ अनुवाद- वेदनिष्ठ मनुष्योंमें प्रायः आधे तो वेदको केवल 'मुख'से मानते हैं, किन्तु वेदोंमें निषिद्ध पापोंको करते हैं। ऐसे लोग धर्मका पालन नहीं करते हैं ॥ 146 ॥ अनुभाष्य-मुखसे स्वयंको 'वेदनिष्ठ'के रूपमें स्वीकार करके वेदोंके विरुद्ध आचरण करनेवाले - स्वेच्छाचारी 'कुकर्मी' अथवा 'अन्याभिलाषी' हैं ॥ 146 ॥ धर्माचारि-मध्ये बहुत 'कर्मनिष्ठ'। कोटि-कर्मनिष्ठ-मध्ये एक 'ज्ञानी' श्रेष्ठ ॥ 147 ॥ अनुवाद - वेदोंमें वर्णित धर्मका आचरण करने वालोंमें-से भी बहुत सकाम कर्मोंमें निष्ठा रखनेवाले हैं। ऐसे करोड़ों सकाम कर्मियोंमेंसे श्रेष्ठ कोई एक 'ज्ञानी' होता है ॥ 147 ॥ मुक्तगणोंमें भी श्रीकृष्णभक्तका सुदुर्लभ होना :- कोटिज्ञानि-मध्ये हय एकजॅन 'मुक्त'। कोटिमुक्त-मध्ये 'दुर्लभ' एक कृष्णभक्त ॥ 148 ॥ अनुवाद - करोड़ों ज्ञानियोंमेंसे कोई एक व्यक्ति ही मुक्त होता है। करोड़ों मुक्तोंमें भी एक कृष्णभक्त 'दुर्लभ' होता है ॥ 148 ॥ अनुभाष्य - 'कर्मनिष्ठ' - अपने सुखकी कामनाओंसे जो पुण्यादि सत्कर्म करते हैं, उन्हें कर्मनिष्ठ कहते हैं। 'ज्ञानी'-पुनः ऐसे करोड़ों कर्मनिष्ठोंमेंसे निष्काम-कल्पनासे कोई-कोई ही अपने कर्मफलोंको त्याग करता है। इस प्रकारके व्यक्तिको भी कर्मनिष्ठ ही कहा जाता है। ऐसे । 193

[ 19/148-150 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करोड़ों कर्मनिष्ठोंमेंसे जो सत्त्वगुणमें स्थित होकर रजोगुण और तमोगुणको दूर करनेके लिये, प्राकृत पुण्य और पाप, दोनों प्रकारकी अवस्थाओंसे हटकर आत्माकी निर्मलताका अनुसरण करनेके लिये प्रकृतिसे अतीत अभेद-ब्रह्मानुसन्धानमें रत होता है, वही ज्ञानी है। करोड़ों ज्ञानियोंमेंसे कोई-कोई ज्ञानमार्गमें सत्त्वगुणके आश्रित होकर शम-दमादि छः प्रकारके साधनादिरूपा मिश्रा और बिद्धा-भक्तिमूलक सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं। फिर द्वैतबुद्धिसे अपने इन उपायोंको भी असम्पूर्ण मानकर उनका त्याग कर देते हैं। इस प्रकार अनित्य और असत्य साधनको ही नित्यसिद्धिके कारणरूपमें जानकर उस साधनके फलसे अन्तमें वे अभिमान करते हैं कि मैंने अपनी बद्धानुभूतिसे मुक्ति अर्थात् ब्रह्मभूत स्वरूप प्राप्त किया है। उसीके उद्देश्यसे वे अद्वैत-विचारसे 'दृष्टा', 'दर्शन' और 'दृश्य' अथवा 'ज्ञाता', 'ज्ञान' और 'ज्ञेय'के वैशिष्ट्यका लोप करते हैं। वैसे अचित्-मिश्रातीत केवलचिन्मयवादी ज्ञानी ही 'मुक्त' कहे जाते हैं। ऐसे करोड़ों मुक्तोंमें भी श्रीकृष्णभक्त विरले हैं॥ 148 ॥ श्रीकृष्ण भक्तके सुदुर्लभ होने और सर्वश्रेष्ठ होनेका कारण :- कृष्णभक्त—निष्काम, अतएव 'शान्त'। भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी—सकलि 'अशान्त'॥ 149॥ अनुवाद—श्रीकृष्णभक्त निष्काम होते हैं, इसलिये वे 'शान्त' होते हैं। भोग, मोक्ष और सिद्धिकी कामना करनेवाले सभी 'अशान्त' रहते हैं॥ 149॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जीव दो प्रकारके हैं, -नित्यमुक्त और नित्यबद्ध। नित्यबद्ध जीव स्थावर और जङ्गमके भेदसे दो प्रकारके हैं। जो—अचल (जैसे, वृक्षादि) हैं, वे ही 'स्थावर' जीव हैं; जो—सचल हैं, वे ही 'जङ्गम' हैं। जङ्गम तीन प्रकारके हैं,—तिर्यक् अर्थात् पक्षी, जलचर और स्थलचर। स्थलचरोंमें मानवजाति अत्यन्त अल्प संख्यक है। उन अल्पसंख्यक मनुष्योंमें म्लेच्छ, पुलिन्द, बौद्ध और शबरादिको छोड़ देनेपर वेदनिष्ठ मनुष्य ही बाकी रहते हैं। वेदनिष्ठ मनुष्य भी दो प्रकारके हैं,—धर्माचारी और अधर्माचारी। धर्माचारियोंमें अधिकांश कर्मनिष्ठ हैं; कोई-कोई ज्ञाननिष्ठ हैं। करोड़ों ज्ञाननिष्ठोंमें वास्तवमें कोई एक व्यक्ति ही 'मुक्त' है; यहाँ, जो जड़ीयबुद्धिसे मुक्त हैं, उन्हें ही 'मुक्त' कहा गया है। उन सब मुक्त व्यक्तियोंमें, जो श्रद्धालु होकर श्रीकृष्णभजनमें प्रवृत्त हैं, वे ही 'श्रीकृष्णभक्त' हैं। श्रीकृष्णभक्तमें कोई कामना नहीं होती। पहले कहे गये 'मुक्त' व्यक्ति तक सभी कामनायुक्त हैं; धर्माचारी और कर्मनिष्ठ—'भुक्तिकामी' हैं और मुक्त तक ज्ञानी- 'मुक्तिकामी' हैं, उनमेंसे पुनः कोई-कोई योगफलके 'सिद्धिकामी' हैं। जब तक उनके हृदयमें ये तीन प्रकारकी कामनाएँ रहती हैं, तब तक उन्हें यह सब कामनाएँ शान्ति प्रदान नहीं करतीं; इसी कारण वे सभी 'अशान्त' हैं। इसलिये एकमात्र निष्काम श्रीकृष्णभक्त ही शान्त अर्थात् शान्ति प्राप्त किया हुआ है॥ 144-149 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण भक्त ही एकमात्र कामनाशून्य एवं एकमात्र श्रीकृष्णनिष्ठ होनेके कारण शान्त होता है। स्वर्गादि भुक्तिकामी कर्मी, निर्वाणादि मुक्तिकामी ज्ञानी एवं अणिमादि अठारह प्रकारकी सिद्धिकामी योगी अपनी-अपनी कामनाओंके वशीभूत होकर उन्हींकी प्राप्तिके लिये अशान्त रहते हैं। पुनः, कामनाकी तृप्ति होनेपर भी वे असत्-प्राप्तिके कारण श्रीकृष्णनिष्ठ नहीं होनेसे अशान्त ही रहते हैं॥ 149॥ शास्त्रप्रमाण :- श्रीमद्भागवत (6/14/5)में— मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ 150 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे महामुने, करोड़ों-करोड़ों मुक्तों और सिद्धोंमेंसे नारायण-परायण प्रशान्तात्मा पुरुष अत्यन्त दुर्लभ है॥ 150 ॥ 194 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/150-152 ] अनुभाष्य- मुक्तानां (अज्ञानबन्ध-रहितानां) सिद्धानां (योग-सिद्धानां) कोटिषु अपि मध्ये प्रशान्तात्मा (निष्काममनाः) नारायणपरायणः सुदुर्लभः। [तन्त्रवाक्य-'ज्ञानतः सुलभः मुक्तिर्भुक्तिर्यज्ञादि-पुण्यतः। सेयं साधनसाहस्रैर्हरिभक्तिः सुदुर्लभा ॥ "] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [तन्त्र-वाक्य-“ज्ञान-साधनसे 'मुक्ति' और यज्ञादि-पुण्यसे 'भोग' सुलभ हैं, किन्तु हजारों-हजारों साधनोंके द्वारा भी वह हरिभक्ति अतिशय दुर्लभ है।”] ॥ 150 ॥ लताके साथ भक्तिकी उपमा; भक्तिका दूसरा नाम 'श्रीकृष्णानुराग'; बद्धजीवके लिये उस श्रीकृष्णप्रीति-सेवाकी प्राप्तिके क्रमके वर्णनके मूलमें भक्तिप्रदान करनेवाली श्रीकृष्णकृपारूपा सुकृति है, उसके फलस्वरूप सद्गुरुकी प्राप्ति, उनकी कृपासे श्रवणके फलसे सम्बन्धकी उपलब्धि और श्रद्धाका उदय :- ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव। गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्तिलता-बीज ॥ 151 ॥ अनुवाद-ब्रह्माण्डमें भ्रमण करते-करते कोई भाग्यवान् जीव ही गुरु और श्रीकृष्णकी कृपासे भक्तिलताके बीजको प्राप्त करता है ॥ 151 ॥ अनुभाष्य-'ब्रह्माण्ड'का अर्थ चौदह भुवन है (आदिलीला, 5/98 संख्या देखें)। 'भाग्यवान्'-सुकृतिसम्पन्न जीव; अनजानेमें विष्णु- वैष्णवकी सेवा होनेसे जीवकी 'सुकृति' उदित होती है,-(श्रीनारदका जन्म-उपाख्यान-भागवत 1/5/23-30 देखें)। यह भक्ति उन्मुखी सुकृति-जीवात्माकी चिद्- वृत्तिका ही अस्फुट विकास है, यह जड़ीय कर्म नहीं है। सुकृतिके फलस्वरूप श्रद्धा और श्रवणसे सम्बन्धज्ञान प्राप्त होनेपर ही वास्तविक शुद्धभक्ति आरम्भ होती है। 'गुरुप्रसाद'-गुरु कृपा करके शिष्यको श्रीकृष्णभक्ति रूप सर्वोत्तम अनुग्रह दान करते हैं। सुकृतिवान् अनुग्रहयोग्य व्यक्तिके परम कल्याणके उद्देश्यसे श्रीभगवान् अपने प्रियतम किसी एक व्यक्तिमें शक्ति अर्पित करके जगत्में अपनी कृपाशक्तिके वितरणके लिये महान्त-गुरुके रूपमें भेजते हैं। श्रीगुरुदेव शिष्यको श्रीकृष्णसेवारूपी अपनी कृपा प्रदान करते हैं। 'कृष्णप्रसाद'-भक्तिलताके बीजको प्रदान करनेवाले आश्रयजातीय भगवद्-स्वरूप गुरुदेवको शिष्यके निकट भेजना ही श्रीकृष्णकी कृपा है। गुरुकी कृपासे श्रीकृष्ण कृपा प्राप्त होती है एवं श्रीकृष्णकी कृपासे गुरुकृपाकी प्राप्ति होती है। 'भक्तिलता-बीज'-जिस बीजसे भगवान्‌की सेवारूपी लतिका उत्पन्न होती है। भक्तिलताका कारण गुरुकी कृपा और श्रीकृष्णकी कृपा है। अन्याभिलाष-बीज, कर्म-बीज और ज्ञान-बीजसे वैसे-वैसे वृक्षादि उत्पन्न होते हैं। इन सब बीजोंसे भक्तिलताका बीज अलग है। गुरु-कृष्णकी प्रसन्नतासे ही भक्तिलताका बीज प्राप्त होता है। उनके अप्रसन्न होनेसे अन्याभिलाष, कर्म अथवा ज्ञान बीजकी प्राप्ति हो सकती है, किन्तु शुद्धभक्तिका बीज लुप्त हो जाता है। जिनका वास्तवमें सौभाग्य नहीं है, उनके भाग्यमें भक्तिलता-बीजकी प्राप्ति नहीं होती। श्रद्धावान् जीव ही गुरुपादपद्मका आश्रय करता है। सद्गुरुके द्वारा दिया गया अनुग्रह-मन्त्र और प्रदर्शित पथ ही 'भक्तिमार्ग' है ॥ 151 ॥ उसके साथ ही अभिधेय आरम्भ; अनर्थयुक्त अवस्थामें भी भजन :- माली हञा करे सेइ बीज आरोपण। श्रवण-कीर्त्तन-जले करये सेचन ॥ 152 ॥ अनुवाद-उस बीजको प्राप्त करके उस भाग्यवान् जीवको माली बनकर सावधानीसे उस बीजको अपने हृदयमें रोपना होगा और उसे श्रवण और कीर्तनके जलसे सींचना होगा ॥ 152 ॥ अनुभाष्य-गुरुपादपद्मसे श्रवण करके फिर उसका कीर्तन-कार्य ही जलसे सींचना है, उसके द्वारा बीज क्रमशः लतामें परिणत होता है ॥ 152 ॥ । 195

[ 19/153-156 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनर्थमुक्त अवस्थामें भी भजन; रागमयी भक्तिका आश्रय—श्रीकृष्णमाधुर्य है, ब्रह्म और श्रीनारायणका ऐश्वर्य नहीं :— उपजिया बाड़े लता 'ब्रह्माण्ड' भेदि' याय। 'विरजा', 'ब्रह्मलोक' भेदि' 'परव्योम' पाय ॥ 153 ॥ अनुवाद—जलके द्वारा सिञ्चन करनेपर बीज अङ्कुरित होता है और क्रमशः लता बढ़ते हुए 'ब्रह्माण्ड'को भेद करके 'विरजा' एवं 'ब्रह्मलोक'को भी भेदकर 'परव्योम'में पहुँच जाती है॥ 153॥ अनुभाष्य—'ब्रह्माण्ड' अर्थात् चौदह भुवनोंके भीतर भक्तिलताका आश्रयस्वरूप कोई भी वृक्ष नहीं है। ब्रह्माण्डकी किसी भी वस्तुके प्रति भक्ति प्रयोग नहीं हो सकती। ब्रह्माण्डको पार करके 'विरजा-नदी' है; वहाँ तीन गुणोंकी साम्यावस्था लक्षित होती है,—वह प्राकृत- मलको धो देनेवाली नदी है। उसे पार करके ही ज्ञानियोंका आदर्श 'ब्रह्मलोक' है। विरजामें जैसे भक्ति- लताके आश्रय करने योग्य कोई वृक्ष नहीं है, ब्रह्मलोकमें भी वैसे भक्तिलताके सेव्य वृक्षका अभाव है। आश्रय-वृक्षको प्राप्त नहीं करके श्रवण-कीर्त्तनरूपी जलसे सिञ्चित बढ़ती हुई लता ब्रह्मलोकको पार करके 'परव्योम' धामको प्राप्त करती है॥ 153॥ तबे याय तदुपरि 'गोलोक-वृन्दावन'। 'कृष्णचरण'-कल्पवृक्षे करे आरोहण ॥ 154 ॥ अनुवाद—तब लता और बढ़ती हुई उस परव्योमसे भी ऊपर गोलोक वृन्दावनमें पहुँच जाती है। वहाँपर श्रीकृष्णके चरणकमलरूपी कल्पवृक्षका आश्रय ग्रहण करती है॥ 154॥ अनुभाष्य—ब्रह्मलोक और विरजाके एक ओर मायिक ब्रह्माण्ड अवस्थित हैं, वही 'देवीधाम' है। देवीधाम अथवा इतर-व्योम—प्रकृतिके अधीनरूपमें अवस्थित है। प्रकृतिके दूसरी ओर 'वैकुण्ठ' अथवा 'परव्योम' अवस्थित है। वहाँ माया कुछ भी प्रभाव दिखानेमें समर्थ नहीं होती। ब्रह्ममय वैकुण्ठके ऊपरी भागमें गोलोक-वृन्दावन अवस्थित है। वहाँ भक्तिलता श्रीकृष्णचरणरूपी कल्पवृक्षका आश्रय करती है। परव्योममें परव्योमनाथ श्रीनारायणकी जो पूजा विहित होती है, उसमें 'शान्त', 'दास्य' और 'आधा-सख्य'-रस लक्षित होता है; परन्तु गोलोक-वृन्दावनमें श्रीकृष्णकी सेवामें 'शान्त', 'दास्य' और 'गौरव-अर्द्धसख्य'के साथ 'विश्रम्भ-सख्यका आधा', 'वात्सल्य' और 'मधुर',—ये पाँच भाव पूर्ण मात्रामें विकसित हैं; यहीं 'भक्तिलतिका' सम्पूर्णरूपमें आश्रय प्राप्त करती है॥ 154॥ श्रीकृष्णप्रेमरूपी प्रयोजनकी प्राप्ति; साधन-अवस्थामें सदैव श्रवण-कीर्तन :— ताँहा विस्तारित हञा फले प्रेम-फल। इँहा माली सेचे नित्य श्रवण-कीर्त्तनादि-जल ॥ 155 ॥ अनुवाद—वहाँ लता विकसित होकर प्रेमरूपी-फल उत्पन्न करती है। और साधक इस जगत्में रहते हुए ही माली होकर उसे नित्य श्रवण-कीर्त्तनादि जलसे सींचता है॥ 155॥ अनुभाष्य—'ताँहा'—गोलोक-वृन्दावनमें; 'प्रेम-फल'— अप्राकृत परम-लोभनीय श्रीकृष्णेन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छा-मूलक अद्भुत वस्तु है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रकी अपनी वस्तु है, वह बद्धजीवकी भोगमय प्राकृत जड़बुद्धिके गोचर नहीं होती। 'इँहा'—प्रपञ्चमें; यहाँ रहकर उस भक्तिलताके बोये गये बीजको नित्य अप्राकृत श्रीकृष्णनाम, रूप, गुण, लीलाके श्रवण-कीर्त्तनादिरूप जलसे सींचना होता है॥ 155॥ अपक्व (कच्ची) अवस्थामें वैष्णव-अपराध ही साधनपथमें सबसे प्रधान 'विघ्न' :— यदि वैष्णव-अपराध उठे हाती माता। उपाड़े वा छिण्डे, तार शुखि याय पाता ॥ 156 ॥ अनुवाद—यदि साधक वैष्णव-अपराध करे, तो वह अपराधरूपी मत्त हाथी उस भक्तिरूपी लताको जड़से 196 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/156-160 ] उखाड़कर तहस-नहस कर देता है, जिससे लताके पत्ते सूख जाते हैं॥156॥ अनुभाष्य- 'वैष्णव-अपराध'—मतवाले हाथीके समान है। 'अपराध'—दस प्रकारके नामापराध (आदिलीला 8/24 संख्या देखें)। 'हाती माता'—प्रबल भक्तिविरोधी भाव अथवा गुरुकी अवज्ञास्वरूप वैष्णव-अपराध, वही भक्तिलताका विनाश करनेवाला है॥156॥ नामापराधसे सावधान रहना ही मङ्गलका कारण :- ताते माली यत्न करि' करे आवरण। अपराध-हस्तीर यैछे ना हय उद्गम॥157॥ अनुवाद—इसलिये मालीको यत्नपूर्वक उस लताके चारों ओर बाड़ लगा देनी चाहिये, जिससे अपराधरूपी हाथी उसमें प्रवेश ही न कर सके॥157॥ अनुभाष्य-भक्तिलताके चारों ओर बाड़ लगाना आवश्यक है। श्रीकृष्ण-अभक्तके सङ्गत्याग चेष्टारूपी आवरण अथवा बाड़के नहीं रहनेसे अभक्त-सङ्गके फलस्वरूप उत्पन्न अपराधरूप मतवाले हाथीके द्वारा भक्तिलताके उखाड़ने और नष्ट होने अथवा रौंदे जानेकी सम्भावना है। ऐसा न हो, उस विषयमें साधकके लिये सावधान रहना अति आवश्यक है। श्रीरूप प्रभुने 'उपदेशामृत'में कहा है— “अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रहः। जनसङ्गश्च लौल्यञ्च षड्भिर्भक्तिर्विनश्यति॥” [अर्थात् “अधिक आहार या सञ्चय, भक्ति-प्रतिकूल चेष्टा, वृथा-आलाप, नियमाग्रह, असत्सङ्ग एवं लौल्य अर्थात् बुरे मतोंको ग्रहण करनेके लिये चित्तकी चञ्चलता—इन छः प्रकारके दोषोंसे भक्ति विनष्ट हो जाती है।"]॥157॥ अमृतानुकणिका—श्रीमद्भागवत (7/1/1) की टीकामें श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर लिखते हैं,–“महत् पुरुषके प्रति अपराधरूप हाथीके हाथसे महत्-कृपासे प्राप्त भक्तिलताको श्रीशिक्षाष्टकके तृतीय श्लोकमें वर्णित चार गुणों, यथा—'स्वयंको तृणसे भी अधिक दीन समझना, वृक्षसे अधिक सहनशील होना, अमानी होकर सबको यथायोग्य सम्मान देना' रूपी शिलाके आवरणके द्वारा संरक्षण करते हुए श्रवणादि जल-सिञ्चनसे पालन करना चाहिये॥” 157॥ भक्तिकी भाँति आकृति अथवा देखनेमें समानता होनेपर भी जो भक्ति नहीं, ऐसी अभक्तिका समूह :- किन्तु यदि लतार सङ्गे उठे 'उपशाखा'। भुक्ति-मुक्ति-वाञ्छा, यत असंख्य तार लेखा॥ 158॥ 'निषिद्धाचार', 'कुटीनाटी', 'जीवहिंसन'। 'लाभ', 'पूजा', 'प्रतिष्ठादि' यत उपशाखागण॥ 159॥ अभक्तिको आश्रय देनेपर उसकी वृद्धिके कारण भक्तिपर शिथिलताके आवरणकी सम्भावना :- सेकजल पाञा उपशाखा बाड़ि' याय। स्तब्ध हञा मूलशाखा बाड़िते ना पाय॥ 160॥ अनुवाद—किन्तु भक्तिलताके साथ भुक्ति-मुक्ति- सिद्धि आदि अनेक 'उपशाखाएँ' भी उपजती हैं और ये उपशाखाएँ असंख्य हैं। 'निषिद्धाचार', 'कुटीनाटी', 'जीवहिंसा', 'लाभ', 'पूजा', 'प्रतिष्ठा' आदि अनेक उपशाखाएँ हैं। यदि अपराधोंका वर्जन न किया जाय तो श्रवण-कीर्तनरूपी जलको पाकर उपशाखाएँ बढ़ जाती हैं और मूलशाखा अर्थात् भक्तिलता स्तब्ध होकर बढ़ नहीं पाती॥ 158-160॥ अनुभाष्य- 'उपशाखा'—वास्तविक लताकी अपनी शाखाके अतिरिक्त उसके जैसी समान आकृतिवाली अन्य लताकी शाखा इस वास्तविक लतासे लिपटकर उसीके ही 'अङ्ग'के जैसी प्रतीत होती है, परन्तु वह वास्तविक लता नहीं होती। 'भुक्ति'—कर्मफल भोगवादीकी प्राप्य वस्तु है; 'मुक्ति'—ज्ञानवादीकी प्राप्य वस्तु है; 'वाञ्छा'—सिद्धिवादीको प्राप्त होनेवाले योगफलकी विभूतियाँ आदि हैं। 'निषिद्धाचार'—जो सिद्ध पुरुषोंका आचरण नहीं है । 197

[ 19/158-162 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अथवा सिद्धि प्राप्तिमें बाधा है अर्थात् जिस आचरणके द्वारा भक्ति लुप्त हो जाती है। जैसे भोक्ताका अभिमान करके भोगमयी बुद्धिसे जीवका स्त्री-सङ्ग अथवा श्रीकृष्ण-अभक्तका सङ्ग अथवा विषयी-व्यक्तिका दर्शन और स्त्रीदर्शन। 'कुटीनाटी'—कुटिलतापूर्ण नाटक, कपटता; कु-टी एवं ना-टी—आत्म-प्रसादका विरोध अथवा असन्तोष है। 'जीवहिंसा'—श्रीकृष्णभक्तिमूलक नित्यकल्याण-वाणीके कीर्तनमें अथवा प्रचारमें सङ्कोच; अथवा कंजूसी अर्थात् मायावादी, कर्मी और अन्याभिलाषीको आश्रय देना; प्राणियोंको मारना अथवा प्राणीमात्रको ही उद्वेग अथवा क्लेश देना—ये सब जीवहिंसा है। 'लाभ'—जड़ेन्द्रियोंकी तृप्तिके उद्देश्यसे जगत्में धन आदिकी प्राप्ति अथवा उसे संग्रह करनेकी अभिलाषा। 'पूजा'—सांसारिक लोगोंके मनोधर्मको बढ़ावा देकर सम्मान प्राप्त करना। 'प्रतिष्ठा'—संसारमें महत्वपूर्ण व्यक्ति बननेकी लालसा अथवा लोगोंसे अपने नश्वर यशको पानेकी प्रबल इच्छा। श्रवण-कीर्तनादि जलकी सिंचाईके प्रभावसे उपशाखा पुष्ट होकर वर्धित होती है, उससे मूल भक्तिलता बढ़ नहीं पानेके कारण स्तब्ध हो जाती है। निरपराध श्रवण और कीर्तन अर्थात् दुःसङ्गका परित्याग नहीं करके अपराधके साथ अनुष्ठान करते-करते जीव विषयभोग परायण, अथवा मोक्षकामी, अथवा सिद्धिकामी हो जाता है। अथवा वह लोभी या कपटी या अवैध-स्त्रीलम्पट हो जायेगा। अथवा वह छल-भक्तिवाला अथवा प्राकृत-सहजियावादी होगा। अथवा वह उच्चकुलमें जन्मके अभिमानसे अपनेको बड़ा भक्त माननेवाला या राजा परीक्षितके द्वारा प्रदान किये गये कलिके पाँच स्थानोंका [द्यूत (जुआ), मद्यपान, (अवैध) स्त्री-सङ्ग, हिंसा और स्वर्ण (धन)] अधिवासी या वैष्णवोंमें जातिबुद्धि रखनेवाला हो जायेगा। अथवा वह नाम-मन्त्र-विग्रह-भागवतका व्यापारी या अवैध-वृत्तिके द्वारा धन आदिको संग्रह करनेमें तत्पर होगा। या स्वयंको 'निर्जन-भजनानन्दी' कहलाकर प्रतिष्ठाकी आकाङ्क्षा रखनेवाला, चिद् और जड़के समन्वयवादके पोषणके द्वारा यशको प्राप्त करनेका इच्छुक होगा। अथवा अयोग्य गुरुका दास बनकर विष्णु-वैष्णव-विरोधी अद्वैव-वर्णाश्रमके अधीन और उसका पोषक बनेगा और उपरोक्त एक अथवा अनेक वृत्तियोंके द्वारा उसके बहुत प्रकारके परिचय होंगे। अर्थात् वह अपनी इन्द्रियोंके सुखभोगमें प्रमत्त होकर शुद्धभक्तिके अतिरिक्त अन्य नश्वर वस्तुओंको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे अबोध लोगोंको ठगकर जगत्में 'धार्मिक' अथवा 'साधु' अथवा 'महान'के रूपमें परिचय प्राप्त करनेके आकाङ्क्षी होकर वास्तविक शुद्ध हरिसेवक नहीं बन पायेगा॥ 158-160 ॥ प्रथमावस्थामें ही साधकके लिये दुःसङ्गके त्यागकी व्यवस्था करना आवश्यक :- प्रथमेइ उपशाखार करये छेदन। तबे मूलशाखा बाड़ि' याय वृन्दावन ॥ 161 ॥ अनुवाद-इसलिये प्रथम अवस्थामें ही उपशाखाओंको काट देना चाहिये, तभी मूलशाखा (भक्तिलता) बढ़ती हुई वृन्दावनमें जाती है॥161॥ अनुभाष्य-यदि पहले बतायी गयी 'उपशाखाओं'को अङ्कुरित होते देखकर उन्हें उसी समय जड़सहित उखाड़ फेंक दिया जाय, तभी मूल भक्तिलताकी शाखा वृन्दावनमें अप्राकृत प्रेमफलको जन्म देती है; अन्यथा उपशाखाकी प्रबलताके कारण लम्बे समयके लिये हरिभजनका साथ छूट जाता है अर्थात् ब्रह्माण्डमें (स्वर्गादि उच्चलोकोंमें, मर्त्यलोकमें अथवा नरकमें) क्लेशकी प्राप्ति अवश्यम्भावी है॥161॥ तभी प्रयोजनसिद्धि अथवा श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त करनेकी सम्भावना :- 'प्रेमफल' पाकि' पड़े, माली आस्वाद्य। लता अवलम्बि' माली 'कल्पवृक्ष' पाय ॥ 162 ॥ 198 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/162–164 ] अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 162 ॥ अनुभाष्य—लताका आश्रय करके भक्त-माली श्रीकृष्णचरणकमलरूप कल्पवृक्षको प्राप्त करता है। गोलोक-वृन्दावनमें प्रेमफलके पककर गिरनेपर, प्रपञ्चमें अवस्थित भक्त उसका आस्वादन कर सकता है ॥ 162 ॥ ताँहा सेइ कल्पवृक्षेर करये सेवन। सुखे प्रेमफल-रस करे आस्वादन ॥ 163 ॥ अनुवाद—वहाँ भक्त कल्पवृक्षकी अर्थात् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवा करता है और आनन्दपूर्वक प्रेमफल-रसका आस्वादन करता है ॥ 163 ॥ अनुभाष्य—'ताँहा'—अप्राकृत गोलोक-वृन्दावनमें; 'सेइ कल्पवृक्षेर'—श्रीकृष्णचरण-कल्पवृक्षका; 'आस्वादन'—भक्त अप्राकृत रूपसे सेवा करके अप्राकृत सेवा-सुख प्राप्त करता है ॥ 163 ॥ श्रीकृष्णप्रेम ही चार-पुरुषार्थोंका धिक्कारी परमार्थ :- एइत परम-फल 'परम-पुरुषार्थ'। याँर आगे तृण-तुल्य चारि पुरुषार्थ ॥ 164 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवा ही परम फल 'परम-पुरुषार्थ' है जिसके आगे धर्म-अर्थ-काम- मोक्ष, ये चारों पुरुषार्थ तिनकेके समान हैं ॥ 164 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—समस्त जीव अपने-अपने कर्मोंके अनुसार अनेक योनियोंमें ब्रह्माण्डमें भ्रमण कर रहे हैं। उनमेंसे जिनका भक्ति उत्पन्न होनेके उपयोगी सुकृतिरूपी भाग्य उदय होता है, वे गुरु-कृष्णकी कृपासे भक्तिलताका बीज जो 'श्रद्धा' है, उसे प्राप्त करते हैं। उस बीजको प्राप्त करने मात्रसे वह माली बनकर अपने हृदयक्षेत्रमें उसे रोपण करता है। माली बीज रोपित होकर अङ्कुरित होते-होते भगवद्-कथा और भक्तकथाके श्रवण-कीर्तनरूप जलसे उस क्षेत्रको सींचता है। भक्तिलता उत्पन्न होकर बढ़ते-बढ़ते इस मायिक ब्रह्माण्डको पार करके विरजा और ज्योतिर्मय ब्रह्मलोकको पार करके परव्योममें स्थान प्राप्त करती है। उस परव्योममें लता वृद्धिको प्राप्त करके उससे ऊपर गोलोक-वृन्दावन तक जाकर श्रीकृष्णचरणरूप कल्प- वृक्षपर आरोहण करती है। श्रीकृष्णचरणोंपर आरूढ़ भक्ति-लतापर ही 'प्रेमफल' फलित होता है। यहाँ तक माली श्रवण-कीर्तन-जलसे उस लताको सींचता रहता है। इस प्रक्रियाके समय जल सींचनेके अतिरिक्त अन्य एक प्रक्रिया है,—कुछ दिन जल सिञ्चन करते-करते लता जब वर्धित होती रहती है, तब अन्य जन्तु आकर उस लताको तहस-नहस कर डालता है, जिससे यह लता सूख जाती है। इस प्रक्रियामें वैष्णव-अपराध ही वह दुष्ट जन्तु है। वही वैष्णव- अपराध ही मत्त हाथीके समान यह सब क्षति पहुँचाता है। उस समय माली बाड़ बनाकर अथवा आवरण लगाकर विशेष यत्न करता है, जिससे अपराधरूपी हाथी प्रकट ही नहीं हो। वैष्णव-अपराध अथवा नाम-अपराध—दस प्रकारके हैं (आदिलीला 8/24 संख्या देखें)। इस समय और एक उत्पात होता है,—जिस समय भक्तिलता बढ़ती है, उस समय यदि उपशाखाएँ अधिक वर्धित होती हैं, तो उससे दोष उत्पन्न होता है। उपशाखाएँ—जैसे भोगकी इच्छा, मुक्तिकी इच्छा, निषिद्धाचार, कुटीनाटी, जीव-हिंसाकी प्रवृत्ति, लाभकी इच्छा, अपने सांसारिक सम्मान अथवा प्रतिष्ठाकी आशा। विशेष सावधानी नहीं करनेसे श्रवण-कीर्तनादि सिंचाईके जलको प्राप्त करके मूल-लताके प्रतिकूलमें उपशाखाएँ ही अत्यन्त बढ़ने लगती हैं, जिससे मूलशाखा स्तब्ध होकर बढ़ नहीं पाती। इसलिये मालीको इन उपशाखारूप अनर्थोंको श्रवण-कीर्तनरूप जलकी सिंचाईके समय पहलेसे ही उखाड़ देना चाहिये; तभी, मूलशाखा वर्द्धित होकर वृन्दावनमें जाती है। यही प्रेम ही जीवका परम-पुरुषार्थ है; धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ इसके सामने तिनकेके समान हैं ॥ 151-164 ॥ अनुभाष्य—'तृणतुल्य'—अति तुच्छ, तुलनामें मूल्यहीन; प्रेमके समक्ष धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि कर्मी, ज्ञानी, । 199

[ 19/164-167 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला योगी आदिके द्वारा आकाङ्क्षित चार प्रकारके पुरुषार्थ— सर्वथा ही ग्रहण करनेके योग्य नहीं हैं॥ 164 ॥ ब्रह्मानन्दको धिक्कार करनेवाला श्रीकृष्णप्रेम-सेवानन्द :— ललितमाधव (5/2)में— ऋद्धा सिद्धिव्रज-विजयिता सत्यधर्मा समाधि- र्ब्रह्मानन्दो गुरुरपि चमत्कारयत्येव तावत्। यावत् प्रेम्णां मधुरिपु-वशीकार-सिद्धौषधीनां गन्धोऽप्यन्तःकरणसरणी-पान्थतां न प्रयाति ॥ 165 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 165 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब तक श्रीकृष्णको वशीभूत करनेवाले सिद्ध औषधिरूप दास्यादि प्रेमका लेशमात्र अन्तःकरण पथका पथिक नहीं बनता, तब तक ही समृद्धिशालिनी सिद्धिसमूहके विजेता, सत्यादि धर्मसमूह, समाधि और उत्कृष्ट ब्रह्मानन्द अपनी-अपनी चकाचौंधसे जीवको चमत्कृत करते हैं॥ 165 ॥ अनुभाष्य— यावत् मधुरिपुवशीकारसिद्धौषधीनां (मधुरिपोः कृष्णस्य वशीकारे बाध्यकरणविषये सिद्धौषधिरूपाणां) प्रेम्णां (शान्तानां) गन्धलेशोऽपि (लवमात्रमपि) अन्तःकरणसरणीपान्थताम् (अन्तःकरण-मार्गपथिकतां) न प्रयाति (गच्छति), ऋद्धा (सम्पन्ना) सिद्धिव्रजविजयिता (सिद्धीनां विभूतीनां व्रजः समूहः तेषां विजयिता विजयित्वं, विजेतृभावः इत्यर्थः), सत्यधर्मा (सत्यशौचदान-तपोधर्मा), समाधिः (चित्तैकाग्रयं), ब्रह्मानन्दः (सर्वोत्कृष्टं ब्रह्मसुखं) च गुरुः (श्लाघ्यः महान्) अपि तावत् (तत्कालपर्यन्तम्) एव चमत्कारयति (चमत्कारं विदधाति—कृष्णसेवा-सुखे प्राप्ते सति विषयसुखं कैवल्यं ब्रह्मसुखञ्च तुच्छी भवतीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 165 ॥ शुद्धभक्तिके लक्षण—(1) साधनभक्ति :— 'शुद्धभक्ति' हैते हय 'प्रेम' उत्पन्न। अतएव शुद्धभक्तिर कहिये 'लक्षण' ॥ 166 ॥ अनुवाद—'शुद्धभक्ति'के अनुशीलनसे प्रेम उत्पन्न होता है, इसलिये मैं शुद्धभक्तिके 'लक्षण' बतला रहा हूँ॥ 166 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्तिके आभाससे प्रेमकी उत्पत्ति नहीं होती; शुद्धभक्तिसे ही प्रेमकी उत्पत्ति होती है॥ 166 ॥ अनुभाष्य—'शुद्धभक्ति'—त्रिगुणातीत कर्मज्ञानके मिश्रणसे अतिरिक्त अहैतुकी निर्गुणा उत्तमा भक्ति॥ 166 ॥ सम्पूर्ण भागवतकी सार बात :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/11)— अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥ 167 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 167 ॥ अनुभाष्य—अमृतप्रवाह भाष्यमें यह श्लोक उद्धृत नहीं हुआ। इसका अनुवाद— श्रीकृष्णसेवाके विरोधी अवैध स्त्री-सङ्गादि दुर्नीतिमूलक समस्त अभिलाषाओंसे रहित और मुक्ति एवं भुक्तिकी कामनाके द्वारा व्यवधान रहित, श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंकी प्रीतिके अनुकूल-चेष्टामय जो श्रीकृष्णके लिये अर्थात् श्रीकृष्णसम्बन्धी अथवा श्रीकृष्ण-विषयक अनुक्षण भजन है, वही 'उत्तमा भक्ति' है। [प्रागस्य तटस्थ-लक्षणमाह—] अन्याभिलाषिताशून्यं (अन्याभिलाषिता कृष्णभजन-सम्पादन-विरोधि-योषित्सङ्गादिरूपा दुर्नीतिमूला वाञ्छा, तया शून्यं विहीनं), ज्ञानकर्माद्यनावृतं (ज्ञानमत्र—निर्भेद-ब्रह्मानुसन्धानं, न तु भजनीयत्वानुसन्धानमपि, तस्यावश्यापेक्षणीयत्वात्, कर्म च—स्मृत्याद्युक्तं नित्यनैमित्तिकादि, न तु भजनीय-परिचर्यादि, तस्य तदनुशीलनरूपत्वात्; आदि शब्देन वैराग्य-योग-सांख्याभ्यासादयः, तैः अनावृतम् अव्यवहितम् अप्रतिहतं); [ततः स्वरूपलक्षणमाह—] आनुकूल्येन (आनुकूल्यमत्र भजनोद्देश्याया श्रीकृष्णाय रोचमाना प्रवृत्तिः, प्रातिकूल्यं तु तद्विपरीतं ज्ञेयं तस्य भजनविरोधात्, तेनेति—विशेषणे तृतीया, न तु उपलक्षणेऽतः आनुकूल्यस्यापि भक्तित्वविधानं ज्ञेयं) कृष्णानुशीलनं (कृष्णशब्दश्चात्र स्वयं भगवतः श्रीकृष्णस्य, तद्रूपाणां चान्येषामपि श्रीविष्णुतत्त्वानां ग्राहकश्चेति बोध्यः तस्य, कृष्णस्य सम्बन्धि, कृष्णार्थं वा अनुशीलनं कायवाङ्मानसीय- तच्चेष्टा-रूपं प्रीतिविषयात्मकं शैथिल्य-परित्यागपूर्वकं मुहुरेव तत्तत्-कर्म-प्रवर्त्तनं) एव उत्तमा भक्तिः [अनेन वैध-रागानुगमार्गयोः साधक-सिद्धदशयोरुभयत्राप्यस्याः सुष्ठु वैशिष्ट्यं स्फुटं कथितम्]। 200 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/167-169 ]

श्लोक-भावानुवाद-[पहले तटस्थ लक्षण कह रहे हैं-] अन्याभिलाषाओंसे शून्य (कृष्णभजन-सम्पादनकी विरोधी स्त्रीसङ्गादिरूपा दुर्नीतिमूलक वाञ्छासे विहीन), ज्ञान-कर्मादिके द्वारा व्यवधानरहित (यहाँ 'ज्ञान'का तात्पर्य निर्भेद-ब्रह्मानुसन्धानसे है, भजनीय श्रीकृष्णसे नहीं, क्योंकि श्रीकृष्ण-विषयक ज्ञान अवश्य ही अपेक्षणीय है; 'कर्मों'का तात्पर्य स्मृति-शास्त्रोंमें वर्णित नित्य-नैमित्तिकादि कर्मोंसे है, भजनीयकी सेवादिसे नहीं, क्योंकि उसका अनुशीलन कर्त्तव्य है; 'आदि'-शब्दसे वैराग्य-योग-सांख्यके अभ्यासादिको समझना चाहिये); [बादमें उसके स्वरूपलक्षणको कह रहे हैं-] अनुकूल भावसे (अर्थात् भजनके उद्देश्यसे श्रीकृष्णके लिये रोचमाना प्रवृत्तिः, प्रतिकूल भावसे रोचमाना प्रवृत्तिको भजनका विरोधी जानना चाहिये; आनुकूल्येन तृतीया विभक्ति के द्वारा विशेषणरूपमें प्रयोग किया गया है, न कि उपलक्षण रूपसे; अनुकूल भाव ही भक्तिका विधान करता है, ऐसा समझना चाहिये) कृष्णानुशीलन (कृष्ण-शब्दसे यहाँ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और उनके अन्य रूपों अर्थात् श्रीविष्णुतत्त्वको समझना चाहिये; कृष्णसे सम्बन्धित अथवा कृष्णके लिये अनुशीलन अर्थात् शैथिल्य त्यागकर कायिक-वाचिक-मानसिक चेष्टारूप प्रीतिविषयात्मक पुनः पुनः उन-उन कर्मोंमें प्रवृत्त होना) ही उत्तमा भक्ति है [इसके द्वारा वैधी और रागानुगा मार्गोंकी साधक एवं सिद्ध दशा, दोनोंका ही सुन्दररूपसे वैशिष्ट्य कहा गया है] ॥ 167 ॥

पहले दो पद-'तटस्थ' और बादके दो पद-शुद्धभक्तिके 'स्वरूप' लक्षण :- अन्य-वाञ्छा, अन्य-पूजा छाड़ि' 'ज्ञान', 'कर्म'। आनुकूल्ये सर्वेन्द्रिये कृष्णानुशीलन ॥ 168 ॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 168 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-शुद्धभक्तिका लक्षण यह है- शुद्धभक्तिमें श्रीकृष्णकी सेवाके लिये अपनी (पारमार्थिक सिद्धिके पथमें) उन्नतिकी इच्छाके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा नहीं रह सकती। श्रीकृष्णके बिना अन्य किसी सेव्य ब्रह्म-परमात्मादि-स्वरूपकी पूजा रह ही नहीं सकती एवं ज्ञान और कर्म अपने-अपने स्वरूपोंमें नहीं रह सकते। इन सबसे विमुक्त होकर जीवन-यात्रामें जो भक्तिके अनुकूल हैं, केवलमात्र वही ग्रहण करते हुए समस्त इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णानुशीलन करनेका नाम ही 'शुद्धभक्ति' है ॥ 168 ॥

अनुभाष्य- 'अन्य वाञ्छा'- श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त अन्य वासना; 'अन्यपूजा'-श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीकी पूजा; 'कर्म'-स्वरूप-विस्मृति होनेसे फल-भोगकी लालसाके उद्देश्यसे जिन सत्कर्मोंके अनुष्ठानकी व्यवस्था है; 'ज्ञान'-स्वरूप-विस्मृति होनेसे भोगरहित होने (मुक्तिके) उद्देश्यसे आत्माके उत्कर्षके लिये नित्य अभेद्या (जिन्हें कभी भी पृथक् नहीं किया जा सके, ऐसी) सन्धिनी और ह्लादिनी नामक दोनों शक्तियोंसे रहित केवल सम्वित्की चेष्टा; 'आनुकूल्ये कृष्णानुशीलन'- श्रीकृष्णकी प्रीतिके उद्देश्यसे श्रीकृष्णसेवा, श्रीकृष्णके अतिरिक्त मायाके अनुशीलनका त्याग करके अनुकूल भावसे श्रीकृष्णकी सेवा; 'सर्वेन्द्रिये'- समस्त इन्द्रियोंके द्वारा। जड़ेन्द्रियोंके द्वारा मायाका ही अनुशीलन होता है; 'जड़ेन्द्रिय' अर्थात् वाणी, हाथ, पैर, मल और मूत्र त्यागकी इन्द्रियाँ एवं नेत्र, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा तथा मन। जड़ेन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णके बदले मायाकी सेवा करनेपर वह सेवा अपने भोगके लिये ही हो जाती है, इसलिये साधन-भक्तिके अन्तर्गत चौंसठ प्रकारके भक्तिके अङ्गोंकी व्यवस्था की गयी है। इसी साधनभक्तिके बलसे बद्धजीव जड़़ीय भोगोंके चङ्गुलसे निकलकर अनर्थोंसे निवृत्त होकर अप्राकृत सेवाका अधिकारी बनता है ॥ 168 ॥

शुद्धभक्तिरूप 'अभिधेय' से ही श्रीकृष्णप्रेमरूप 'प्रयोजन', -यही सात्वत पञ्चरात्र और भागवतका मत :- एइ 'शुद्धभक्ति'-इहा हैते 'प्रेमा' हय। पञ्चरात्रे, भागवते एइ लक्षण कय ॥ 169 ॥

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[ 19/168-174 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अनुवाद—यही 'शुद्धभक्ति' है, इससे ही 'प्रेम' उत्पन्न होता है। पञ्चरात्र और भागवतमें शुद्धभक्तिके यही लक्षण कहे गये हैं॥ 168-169 ॥ अनुभाष्य— 'शुद्धभक्तिके लक्षण'—पाञ्चरात्रिक और भागवत-सम्प्रदाय, दोनोंका मत एक ही अर्थका प्रतिपादक है॥ 169 ॥

समस्त पञ्चरात्रका मत :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/12)–उद्धृत श्रीनारदपञ्चरात्र वाक्य— सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते॥ 170 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 170 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—समस्त इन्द्रियोंके द्वारा हृषीकेशकी सेवाका नाम 'भक्ति' है। इस स्वरूप-लक्षणमयी सेवाके दो 'तटस्थ' लक्षण हैं—जैसे, यह शुद्धभक्ति समस्त उपाधियोंसे मुक्त होगी और केवल श्रीकृष्णपरायण होकर स्वयं निर्मला रहेगी॥ 170 ॥

अनुभाष्य— सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं (सकलभेदावरणपरिशून्यं कृष्णोतरान्या-भिलाषिता-वर्जितं) तत्परत्वेन (कृष्णसेवैक-तात्पर्येण आनुकूल्येन) निर्मलं (कर्मावरण-ज्ञान-विमोहनाद्युपाधिरूप-मल-निर्मुक्तं) हृषीकेण (सेवोन्मुखेन्द्रियद्वारा) हृषीकेशसेवनं (सर्वेन्द्रियाधिपस्य विष्णोरनुशीलनम् एव) भक्तिः उच्यते (कथ्यते)।

श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य अभिलाषाओंको त्यागकर केवल श्रीकृष्णकी ही सेवाके तात्पर्यसे अनुकूल भावसे कर्मावरण एवं ज्ञान-विमोहनादि उपाधिरूप मलसे निर्मुक्त सेवोन्मुखेन्द्रियोंके द्वारा सर्वेन्द्रियोंके अधिपति श्रीविष्णुके अनुशीलनको ही भक्ति कहते हैं॥ 170 ॥

अहैतुकी अथवा ऐकान्तिकी शुद्धभक्तिसे ही श्रीकृष्णकी प्राप्ति :— श्रीमद्भागवत (3/29/11-14)में— मद्गुण श्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ 171 ॥

लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्। अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे ॥ 172 ॥ सालोक्यसार्ष्टिसारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ 173 ॥ स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृतः। येनातिव्रज्य त्रिगुणं मद्भावायोपपद्यते ॥ 174 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 171-174 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार गङ्गाका प्रवाह समुद्रकी ओर निरन्तर बहता है, उस प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे सर्वान्तर्यामी मुझमें मनकी जो (तैलधारावत्) अविच्छिन्ना अवस्थाका उदय होता है, वही निर्गुण भक्तियोगका लक्षण है। पुरुषोत्तमस्वरूप मुझमें वह भक्ति अहैतुकी अर्थात् अकारण या स्वतःसिद्धा और अव्यवहिता अर्थात् बिना किसी व्यवधानके अथवा अन्य किसी फलकी आकाङ्क्षासे रहित है। (मेरे द्वारा) सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्ष्टि (ऐश्वर्यसम्पत्ति), सारूप्य (चतुर्भुजाकार), सामीप्य (निकटवास) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति) प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी अभिलाषा नहीं है। ऐसी भक्तिको ही 'आत्यन्तिक-भक्तियोग' कहा जाता है। उस भक्तियोगके द्वारा जीव गुणमयी मायाको पार करके मेरा विमल प्रेम प्राप्त करता है॥ 171-174 ॥

अनुभाष्य—शुद्धभक्तियोग पथकी कथा श्रवण करनेकी इच्छुक माता देवहूतिके प्रति भगवान् कपिलदेवकी उक्ति,— (श्रीमद्भागवतके श्लोक (3/29/11-13)के लिये आदिलीला 4/205-207 संख्या देखें।) स (उक्त लक्षणः) भक्तियोगाख्यः एव आत्यन्तिकः (अत्यन्ते सर्वान्ते भवः चरमकाष्ठाम् आपन्नः) उदाहृतः (कथितः) येन (आत्यन्तिक-भक्तियोगेन) [पुरुषः] त्रिगुणं (मायामयं संसारम्) अतिव्रज्य (अतिक्रम्य) मद्भावाय (मम साक्षात्काराय ब्रह्मभूतत्वाय) उपपद्यते (समर्थो भवति) ।

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उन्नीसवाँ अध्याय 19/174-178 ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 174 ॥ छल अथवा अपराध रहनेपर करोड़ों जन्मोंका साधन भी सम्पूर्ण रूपसे विफल :- भुक्ति-मुक्ति आदि-वाञ्छा यदि मने हय। साधन करिले प्रेम उत्पन्न ना हय ॥ 175 ॥ अनुवाद-जब तक भोग-मोक्षादिकी इच्छाएँ मनमें रहती हैं, तब तक साधन करनेपर भी प्रेम उत्पन्न नहीं होता ॥ 175 ॥ अनुभाष्य-हृदयमें कर्मफल भोगकी वासना अथवा संसार-बन्धनसे मुक्तिकी वासना रहनेपर ऐसे फलकी आकाङ्क्षासे युक्त व्यक्ति चौंसठ प्रकारकी साधन-भक्तिका जितना भी अनुष्ठान क्यों न करे, ऐसा तथाकथित बिद्धा-भजन कर्ममात्रमें अथवा निष्फल-ज्ञान-चेष्टामें ही परिणत होगा, इसलिये उसके भाग्यमें साधनभक्तिका फल श्रीकृष्णप्रेम नहीं होगा ॥ 175 ॥ भुक्ति और मुक्तिकी कामनारूपी पिशाची-भक्तिका लोप करनेवाली :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/22)- भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्त्तते। तावद्भक्तिसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत् ॥ 176 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 176 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भुक्ति की स्पृहा और मुक्तिकी स्पृहा, -ये दो पिशाची (राक्षसी) हैं; जब तक ये किसी व्यक्तिके हृदयमें विद्यमान रहती हैं, तब तक उसके हृदयमें भक्तिसुखका प्राकट्य नहीं हो सकता ॥ 176 ॥ अनुभाष्य- यावत् हृदि (अन्तर्मनसि) भुक्तिमुक्तिस्पृहा (भोगमोक्षवासनारूपा) पिशाची (ग्रासकारिणी राक्षसी) वर्त्तते, तावत् अत्र (अन्तःकरणे) भक्तिसुखस्य (कृष्णप्रीतिविधायक-सेवानन्दस्य) कथं (केन प्रकारेण) अभ्युदयः (प्राकट्यं) भवेत्? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 176 ॥ साधनभक्तिसे ही (2) भावभक्ति अथवा रति, रतिसे ही (3) प्रेमभक्ति :- साधनभक्ति हैते हय 'रति'र उदय। रति गाढ़ हैले तार 'प्रेम' नाम कय ॥ 177 ॥ अनुवाद-साधनभक्तिसे 'रति' उदित होती है। रतिके गाढ़ होनेपर उसीको 'प्रेम' कहते हैं ॥ 177 ॥ अनुभाष्य- 'साधनभक्ति' - (भःरःसिः पूःविः द्वितीय लहरी)- "कृतिसाध्या भवेत् साध्यभावा सा साधनाभिधा। नित्यसिद्धस्य भावस्य प्राकट्यं हृदि साध्यता॥" श्रवण-कीर्त्तनादिकी सहायक इन्द्रियोंके द्वारा साधनीय भक्तिको ही 'साधन-भक्ति' कहते हैं; नित्यसिद्ध भावका हृदयमें प्रकट होना ही 'साधन' है। श्रद्धा, साधुसङ्ग (दीक्षा और श्रवण), भजन (निरपराध विष्णु-वैष्णवसेवा), निष्ठा, रुचि और आसक्ति तक 'साधनभक्ति' है। मध्यलीला 23/11-15 संख्या देखें। 'रति' - (भःरःसिः पूःविः तृतीय लहरी) - "व्यक्तं मसृणतेवान्तर्लक्ष्यते रतिलक्षणम्। मुमुक्षुप्रभृतीनाञ्चेद्भवेदेषा रतिर्न हि ॥" हृदयमें स्थित मसृणताके (कोमलताके) प्रकाशित होनेपर उसको ही 'रतिका लक्षण' कहते हैं। मुक्तिकामी अथवा भोगकामी लोगोंमें ऐसी मसृणताके प्रकाशित होनेपर भी उसे 'रति' नहीं कहा जाता। प्रेम'-(भःरःसिः पूःविः चतुर्थ लहरी प्रथम संख्या)- "सम्यङ्मसृणित-स्वान्तो ममत्वातिशयाङ्कितः। भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते ॥" अन्तःकरणके सम्पूर्ण रूपसे मसृण (द्रवित) होनेपर अत्यधिक ममतायुक्त भावके गाढ़ता प्राप्त होनेपर पण्डितगण उसे 'प्रेम' कहते हैं ॥ 177 ॥ प्रेमभक्तिकी गाढ़ताके तारतम्यका वैचित्र्य; चरम अवस्थामें 'महाभाव'- प्रेम वृद्धिक्रमे नाम-स्नेह, मान, प्रणय। राग, अनुराग, भाव, महाभाव हय ॥ 178 ॥ । 203

[ 19/177-12 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उपमा :- यैछे बीज, इक्षु-रस, गुड़, खण्ड-सार। शर्करा, सिता-मिछरि, उत्तम-मिछरी आर ॥ 179 ॥ रतिके साथ विभावादि चार प्रकारके भावोंके मिलनसे रसका उदित होना :- एसब कृष्णभक्ति-रसे स्थायिभाव। स्थायिभावे मिले यदि विभाव, अनुभाव ॥ 180 ॥ सात्त्विक, व्यभिचारि-भावेर मिलने। कृष्णभक्ति-रस हय अमृत आस्वादने ॥ 181 ॥ अनुवाद-प्रेम वर्द्धित होनेपर स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव नाम धारण करता है। जैसे गन्नेका बीज अङ्कुरित होकर गन्ना बनता है, फिर उस गन्नेका रस निकाला जाता है। तब उसको उबालनेपर वह गुड़ बनता है, गुड़से क्रमशः खाण्ड, चीनी, सफेद मिश्री और उत्तम मिश्री बनती है। इसी प्रकार रतिसे महाभाव तक सभी श्रीकृष्णभक्ति-रसमें स्थायी-भाव कहलाते हैं। स्थायी-भावमें विभाव, अनुभाव, सात्त्विक तथा व्यभिचारी भावके मिलनेसे श्रीकृष्णभक्ति-रस अमृतके समान आस्वादनीय हो जाता है ॥ 178-181 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भक्तिकी तीन अवस्थाएँ हैं- साधनावस्था, भावावस्था और प्रेमावस्था। श्रवण-कीर्तनादि नौ प्रकारके अङ्ग पहले साधनभक्तिमें ही क्रियान्वित होते हैं। श्रद्धापूर्वक श्रवण-कीर्तनादि करते-करते पूर्वोक्त सभी अनर्थ जितनी मात्रामें कम होते हैं, उतनी ही श्रद्धावृत्ति क्रमशः उच्चभाव धारण करते हुए निष्ठा, रुचि, आसक्ति, भाव या रति, -इन सब नामोंसे परिचित होती है। साधनभक्तिसे ही रतिका उदय होता है; श्रवण-कीर्तनादिके अनुशीलनसे ही वह रति जितनी गाढ़ होती जाती है, उतना ही 'प्रेमादि' नाम धारण करती है। (क्रमशः) प्रेम वर्धित होते हुए स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव तक उन्नत होता है। इसका उदाहरण यह है, गन्नेका रस-मानो रतिस्थानीय बीजस्वरूप है, वह जितना गाढ़ होता है, उससे पहले गुड़, बादमें खाण्ड, चीनी, सफेद-मिश्री और उत्तम मिश्री-इन सब अवस्थाओंको प्राप्त करता है। रतिसे महाभाव तक, सब कुछ ही श्रीकृष्णभक्तिरसमें स्थायीभाव कहलाते हैं; रतिको ही सर्वत्र 'स्थायीभाव' कहा जाता है। उसी स्थायीभावमें विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी, -इन चारों भावोंके मिलनेपर ही रस उदित होता है। श्रीकृष्णभक्तिके सम्बन्धमें स्थायीभावमें इन सब सामग्रियोंके संयुक्त होनेसे 'श्रीकृष्णभक्तिरस' होता है। स्थायीभाव ही रसोद्दीपन-कार्यका मुख्य आधार है। उसके साथ विभावादि चार सामग्रियाँ संयुक्त होती हैं। इसलिये स्थायीभाव ही रसका 'मूल', विभाव ही रसका 'हेतु', अनुभाव ही रसका 'कार्य', सात्त्विकभाव भी रसका 'विशेषकार्य' एवं सभी सञ्चारी अथवा व्यभिचारी भाव रसके 'सहायक' हैं। विभावके दो भाग हैं- 'आलम्बन' और 'उद्दीपन'। आलम्बन पुनः दो प्रकारसे विभक्त है, - 'विषय' और 'आश्रय'। श्रीकृष्णभक्तिरसमें भक्त ही 'आश्रय', श्रीकृष्ण ही 'विषय' एवं श्रीकृष्णके गुण ही 'उद्दीपन' हैं। अनुभाव तेरह प्रकारके हैं, -1) नृत्य, 2) विलुण्ठन (पृथ्वीपर गिरकर लोटने लगना), 3) गान 4) जोरसे रोना, 5) शरीरको मरोड़ना, 6) हुङ्कार, 7) जम्भाई, 8) दीर्घश्वास, 9) लोकपेक्षा-त्याग (लोग क्या कहेंगे- इसकी परवाह नहीं करना), 10) लार टपकाना, 11) अट्टहास (जोरोंसे हँसना), 12) उद्घूर्णा (चक्कर आना), 13) हिचकी। एक ही समयमें समस्त अनुभाव-लक्षण उदित नहीं होते। रसका कार्य जिस प्रकार होता रहता है, उसी प्रकार कोई-कोई लक्षण समय-समयपर उदित होते हैं। सात्त्विकभाव, -आठ प्रकारके एवं सञ्चारी अथवा व्यभिचारी भाव-तैंतीस प्रकारके होते हैं। (मध्यलीला, 14/167 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें) ॥ 177-181 ॥ अनुभाष्य- 'स्नेह'-(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)- 204 |

उन्नीसवाँ अध्याय 19/178–184 ] “सान्द्रश्चित्द्रवं कुर्वन् प्रेमा ‘स्नेह’ इतीयते। क्षणिकस्यापि नेह स्याद्विश्लेषस्य सहिष्णुता ॥” “चित्तको द्रवीभूत करनेवाले भावके अत्यधिक गाढ़ होनेपर प्रेम ‘स्नेह’-संज्ञा प्राप्त करता है। उसमें एक क्षणका वियोग भी सहन नहीं होता।” ‘मान’—मध्यलीला 2/66 संख्या देखें। ‘प्रणय’—मध्यलीला 2/66 संख्या देखें। ‘राग’—(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)— “स्नेहः स रागो येन स्यात् सुखं दुःखमपि स्फुटम्। तत्सम्बन्ध-लवेऽप्यत्र प्रीतिः प्राणव्ययैरपि॥” “जिस स्नेहमें स्पष्टरूपसे दुःख ही ‘सुख’के रूपमें प्रतीत होता है, वही ‘राग’ है। इस सम्बन्धमात्रसे अपने प्राणोंको नष्ट करके भी श्रीकृष्णकी प्रीतिको उदित करानेकी प्रवृत्ति होती है।” ‘अनुराग’, ‘भाव’ और ‘महाभाव’—मध्यलीला 6/13 संख्याके अनुभाष्यमें ‘अधिरूढ़-महाभाव’का प्रसङ्ग देखें। ‘स्थायीभाव’—(भःरःसिः दःविः प्रथम लहरी)— “विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः। स्वाद्यत्वं हृदि भक्तानामानीता श्रवणादिभिः। एषा कृष्णरतिः स्थायिभावो भक्तिरसो भवेत् ॥” “कृष्णरति-स्थायीभाव-स्वरूप है; श्रवणादिके द्वारा विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी भावोंके सम्मिलनसे, भक्तोंके हृदयमें आस्वादनीय भावसे लाये जानेपर वही ‘भक्तिरस’ होता है।” ‘विभाव’—(भःरःसिः दःविः प्रथम लहरी)— “तत्र ज्ञेया विभावास्तु रत्यास्वादनहेतवः। ते द्विधालम्बना एके तथैवोद्दीपना परे॥” “रतिके आस्वादन-हेतुसमूहको ‘विभाव’ कहते हैं। विभाव-आलम्बन और उद्दीपनके भेदसे दो प्रकारका होता है।” ‘अनुभाव’—(भःरःसिः दःविः द्वितीय लहरी)— “अनुभावास्तु चित्तस्था भावानामवबोधकाः। ते बहिर्विक्रिया-प्रायाः प्रोक्ता उद्भास्वराख्यया ॥” “जो उद्भास्वरयुक्त चित्तमें स्थित भावसमूहके प्रकाशक बाहरमें विकार जैसी चेष्टा प्रदर्शित करते हैं, वे ही ‘अनुभाव’ हैं।” ‘सात्त्विक’ और ‘व्यभिचारी’—मध्यलीला 3/162 संख्या और मध्यलीला 14/167 संख्या देखें॥ 178-181 ॥ उपमा :- यैछे दधि, सिता, घृत, मरीच, कर्पूर। मिलने ‘रसाला’ हय अमृत मधुर ॥ 182 ॥ भक्तके भेदसे पाँच प्रकारकी रति और रतिके भेदसे पाँच प्रकारके भक्तिरस :- भक्तभेदे रति-भेद पञ्च परकार। शान्तरति, दास्यरति, सख्यरति आर ॥ 183 ॥ वात्सल्यरति, मधुररति,—ए पञ्च विभेद। रतिभेदे कृष्णभक्ति-रसे पञ्च भेद ॥ 184 ॥ अनुवाद—जैसे दही, मिश्री, घी, काली मिर्च तथा कर्पूरको मिलानेसे ‘रस’ अमृतकी भाँति मधुर होता है। उसी प्रकार भक्तोंके भेदसे रति भी शान्तरति, दास्यरति, सख्यरति, वात्सल्यरति और मधुररति—पाँच प्रकारकी होती है। रतिभेदसे श्रीकृष्णभक्तिरस भी पाँच प्रकारके होते हैं॥ 182-184 ॥ अनुभाष्य— ‘सिता’—मिश्री। ‘शान्तरति’—(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)— “मानसे निर्विकल्पत्वं शम इत्यभिधीयते” अर्थात् “मानसमें संशयादि रहित भावको ‘शम’ कहते हैं।” (भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)— “विहाय विषयोन्मुख्यं निजानन्द-स्थितिर्यतः। आत्मनः कथ्यते सोऽत्र स्वभावः शम इत्यसौ ॥ प्रायः शमप्रधानानां ममतागन्धवर्जिता। परमात्मतया कृष्णे जाता शान्तरतिर्मता ॥” अर्थात् “विषय वासनाको छोड़कर अपने आनन्दमें अवस्थित होनेको ‘शम’-स्वभाव कहते हैं। शम-प्रधान व्यक्तियोंकी परमात्म-ज्ञानसे श्रीकृष्णके प्रति ममता- गन्धहीन शान्तरति उत्पन्न होती है।” । 205

[ 19/182-185 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'दास्यरति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “स्वस्माद्भवन्ति ये न्यूनास्तेऽनुग्राह्या हरेर्मताः। आराध्यत्वात्मिका तेषां रतिः प्रीतिरितीरिता। तत्रासक्तिकृदन्यत्र प्रीतिसंहारिणी ह्यसौ॥” अर्थात् “श्रीभगवान्से स्वयंको छोटा माननेका अभिमान रखनेवाली रतिसे युक्त होनेपर जीव हरिके अनुग्रहका पात्र बन जाता है। ‘भगवान् ही आराध्य हैं'—ऐसी प्रीति-नामक रति ही आराध्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रमें ‘आसक्ति' उत्पन्न करती है एवं भगवान्के अतिरिक्त मायिक वस्तुओंके प्रति प्रीतिका विनाश करती है।” 'सख्यरति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “ये स्युस्तुल्या मुकुन्दस्य ते सखायः सतां मताः। साम्याद्विश्रम्भरूपैषां रतिः सख्यमिहोच्यते॥ परिहासप्रहासादिकारिणीयमयन्त्रणा।” अर्थात् “विद्वान और सज्जनोंके मतमें जो मुकुन्दके समान होनेके अभिमानसे युक्त रतिवाले हैं, वे ही ‘सखा' हैं; श्रीकृष्णके साथ परस्पर समान भाव होनेके कारण सङ्कोचरहित विश्वासमयी रतिको ‘सख्यरति' कहते हैं। यह सख्यरति-परिहास और उच्च-हास्यादि करानेवाली होती है, इसे अयन्त्रणा अर्थात् बन्धनहीना रति कहते हैं।” 'वात्सल्य-रति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “गुरुवो ये हरेरस्य ते पूज्या इति विश्रुताः। अनुग्रहमयी तेषां रतिर्वात्सल्यमुच्यते। इदं लालनभव्याशीशिचबुकस्पर्शनादिकृत्॥ अर्थात् “गुरु होनेके अभिमानसे युक्त रतिवाले जीवगण ही भगवानके ‘पूज्य' हैं; उनकी अनुग्रहमयी रतिको ‘वात्सल्य रति' कहते हैं। इस वात्सल्य-रतिमें लालन, कल्याण साधन, आशीर्वाद और ठोड़ीको स्पर्श करने आदिके अनुष्ठान हैं।” 'मधुर-रति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “मिथो हरेर्मृगाक्ष्याश्च सम्भोगस्यादि-कारणम्। मधुरापरपर्याया प्रियताख्योदिता रतिः। अस्यां कटाक्षभ्रूक्षेपप्रियवाणीस्मितादयः॥” अर्थात् “श्रीभगवान्के एवं मृगनयनियोंके परस्पर स्मरण-दर्शनादि आठ प्रकारके सम्भोगका मूल कारण- प्रियता अथवा मधुरा-रति है। मधुरा-रतिमें कटाक्ष, भ्रूक्षेप, प्रियवाक्य और मधुर-हास्यादि अनुष्ठान वर्तमान होते हैं॥”182-184॥ पाँच मुख्य भक्तिरस और सात गौणरस :- शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर-रस नाम। कृष्णभक्ति-रसमध्ये ए पञ्च प्रधान॥185॥ अनुवाद-शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-रस, श्रीकृष्णभक्ति-रसमें ये पाँच प्रकारके रस मुख्य हैं॥185॥ अनुभाष्य-‘शान्तभक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः प्रथम लहरी)- “वक्ष्यमाणैर्विभावाद्यैः शमिनां स्वाद्यतां गतः। स्थायी शान्तिरतिर्धीरैः शान्तभक्तिरसः स्मृतः। प्रायः स्वसुखजातीयं सुखं स्यादत्र योगिनाम्। किन्त्वात्मसौख्यमघनं घनं त्वीशमयं सुखम्॥ तत्रापीशस्वरूपानुभवस्यैवारुहेतुता। दासादिवन्मनोज्ञत्वलीलादेर्न तथा मता॥” अर्थात् “शान्तरतिरूपी स्थायीभाव विचाराधीन विभावादिके साथ मिलकर जब शान्तभक्तोंके द्वारा आस्वादनीय होते हैं अर्थात् तद्रूपता प्राप्त करते हैं, तब ‘शान्तभक्तिरस' होता है। शान्तरसमें योगियोंके सर्वमूल- स्वरूप निर्विशेष-ब्रह्मानन्दजातीय सुखकी प्राप्ति होती है, किन्तु यह आत्मानन्द-‘अघन' अर्थात् बहुत कम होता है; और सच्चिदानन्द भगवद्विग्रह-स्फूर्तिमें प्रचुर सेवा-सुख ही ‘गाढ़' होता है। शान्तभक्तोंका साक्षात्कारके लिये सुख अधिक तो होता है, किन्तु दास्य आदिकी भाँति भगवान्की मनोहर लीलाओंमें उनकी वैसी रुचि नहीं होती।” 'दास्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)- “आत्मोचितैर्विभावाद्यैः प्रीतिरास्वाद्यनीयताम्। नीता चेतसि भक्तानां प्रीतिभक्तिरसो मतः॥ अनुग्राह्यस्य दासत्वाल्लाल्यत्वाद्द्वयं द्विधा। भिद्यते सम्भ्रमप्रीतो गौरवप्रीत इत्यादि॥” 206 ।