भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1636

[ 19/124-134 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भोगका सम्पूर्ण रूपसे त्याग करके कभी सूखी रोटी और चना चबाते हैं। वे हाथमें केवल जलका पात्र ही रखते हैं, पुराने वस्त्रोंका बना कम्बल तथा फटा हुआ बहिर्वास धारण करते हैं। श्रीकृष्णकथा, श्रीकृष्णनाम और नृत्यमें ही उल्लास प्राप्त करते हैं। वे आठों प्रहर श्रीकृष्णका भजन करते हैं, केवल चार दण्ड ही शयन करते हैं। कभी-कभी तो नाम-सङ्कीर्तन और श्रीकृष्ण प्रेममें आविष्ट होनेके कारण वह भी नहीं होता। वे कभी भक्तिरससे सम्बन्धित शास्त्रका लेखन कार्य करते हैं और कभी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कथाका श्रवण करते हैं और श्रीचैतन्य महाप्रभुका चिन्तन करते हैं॥"124-131 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'करोँया' - संन्यासियोंके हाथमें रहनेवाला जलका पात्र ॥ 129 ॥ अनुभाष्य- 'स्थूलभिक्षा'-जिस भिक्षाको ग्रहण करनेपर उदरपूर्तिके लिये अन्य किसी व्यक्तिसे और किसी खाद्य पदार्थकी भिक्षा नहीं करनी पड़ती। 'माधुकरी' - मधुमक्खी जिस प्रकार अनेक पुष्पोंसे मधु संग्रह करके अपने छत्तेमें ले जाती है, उसी प्रकार बहुतसे स्थानोंसे थोड़ा-थोड़ा खाद्य पदार्थ संग्रह करके जो उदर भरते हैं, उन्हींकी वृत्ति ही 'माधुकरी'के नामसे जानी जाती है। 'भोग परिहरि'-सुख प्राप्तिकी आशासे इन्द्रियवृत्तिको वर्द्धित करनेके लिये जो सब उत्तेजक पदार्थ उपयोग किये जाते हैं, उन सबका त्याग करके वे भजनके उपयोगी जीवनकी रक्षा करनेके लिये सूखी रोटी और भुने हुए चनेके द्वारा जीवनका निर्वाह करते थे। ऐसे वैराग्ययुक्त जीवनमें वे कभी तो भक्तिरस शास्त्र लिखकर श्रीकृष्णभजन करते थे, कभी नाम-सङ्कीर्तन और कभी श्रीगौरलीला-स्मरण-मनन आदिके द्वारा श्रीकृष्णभजन करते थे। प्राकृत सहजियाओंमें यह विश्वास प्रबल है कि भक्तिशास्त्रोंको लिखना और पढ़ना तो नये साधकोंके लिये है। इनका परित्याग करके शास्त्रादिकी चर्चासे विराम प्राप्त करना ही भक्तिका 'साधन' है। श्रीरूपानुग-भक्तोंकी इस प्रकारकी बातोंमें आस्था नहीं है। किन्तु यदि साधकका शास्त्रोंके लिखने-पढ़ने आदिके द्वारा धन-उपार्जन करके इन्द्रिय- तृप्ति, जड़़ीय प्रतिष्ठा अथवा पूजा, लाभ अथवा अन्य कोई तुच्छ उद्देश्य हो, जिसे 'उपशाखा' कहा जाता है, तब उस प्रकारके भ्रष्टाचार-परायण व्यक्तिका कभी भी मङ्गल नहीं होता। वास्तविक श्रीमद्रूपानुगोंकी ऐसी तुच्छ फलभोगमूलक कर्मवासना नहीं होती ॥ 128-131 ॥ श्रीरूप-सनातनके भजनके आचरणको सुनकर भक्तोंको सुख :- एइकथा शुनि' महान्तेर महासुख हय। चैतन्येर कृपा याँहे, ताँहे कि विस्मय ? ॥ 132 ॥ अनुवाद-श्रीरूप-सनातनसे सम्बन्धित इन बातोंको सुनकर महाप्रभुके परिकर बहुत प्रसन्न होते। जिनपर श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपा हो, उनके विषयमें यह सब सुनकर कैसा विस्मय ? ॥ 132 ॥ स्वरचित 'भक्तिरसामृतसिन्धु'में महाप्रभुकी कृपाका वर्णन :- चैतन्येर कृपा रूप लिखियाछेन आपने। रसामृतसिन्धु-ग्रन्थेर मङ्गलाचरणे ॥ 133 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपाके विषयमें श्रीरूप गोस्वामीने स्वरचित भक्तिरसामृतसिन्धु ग्रन्थके मङ्गलाचरणमें स्वयं यह लिखा है- ॥ 133 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/2) :- हृदि यस्य प्रेरणया प्रवर्त्तितोऽहं वराकरूपोऽपि। तस्य हरेः पदकमलं वन्दे चैतन्यदेवस्य ॥ 134 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 134 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हृदयमें जिनकी प्रेरणाके द्वारा सामान्य कङ्गालरूपी मैं भक्तिग्रन्थकी रचनामें प्रवृत्त हुआ हूँ, उन श्रीचैतन्यदेव हरिके चरणकमलोंकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 134 ॥ 190 ।