श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1637, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/134-139 ] अनुभाष्य- [निज-भागवतसेवा-प्रवर्त्तकं स्वाश्रयचरणकमलं भगवन्तं गौरहरिं नमस्करोति-] अहं वराकरूपः (क्षुद्र-दीन-रूपः, स्वयं गोस्वामिकुलचूड़ामणिरपि अतिदैन्यवशादेवेयमुक्तिः) अपि यस्य (कर्त्तृभूतस्य गौरस्य) हृदि (मनसि) प्रेरणया (हृद्विषयानुज्ञया) प्रवर्त्तितः (प्रेरितः), तस्य चैतन्यदेवस्य हरेः (गौरहरेः कृष्णचैतन्यस्य) पदकमलं (चरणारविन्दम्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—[अपनी भगवद्भक्तिके प्रवर्तक भगवान् श्रीगौरहरिको, विशेषरूपसे उनके श्रीचरणकमलोंको नमस्कार करते हुए कह रहे हैं-] मैं अति दीन (स्वयं गोस्वामिकुलके चूड़ामणि होनेपर भी अति दैन्यवशतः ऐसा कह रहे हैं) हृदयमें जिनकी प्रेरणासे भक्तिग्रन्थकी रचनामें प्रवृत्त हुआ हूँ, उन श्रीकृष्णचैतन्यदेवके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥134॥ प्रयागमें दस दिन तक महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको शिक्षा-प्रदान :- एइमत दशदिन प्रयागे रहिया। श्रीरूपे शिक्षा दिल शक्ति सञ्चारिया॥135॥ अनुवाद—महाप्रभुने इस प्रकार दस दिन तक प्रयागमें रहकर श्रीरूपमें शक्ति सञ्चार करके उन्हें शिक्षा प्रदान की॥135॥ श्रीरूप-शिक्षा; सूत्राकारमें भक्तिरसके लक्षणका वर्णन :- प्रभु कहे,—“शुन, रूप, भक्तिरसेर लक्षण। सूत्ररूपे कहि, विस्तार ना याय वर्णन॥136॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–‘हे रूप सुनो! भक्तिरसके लक्षणका सूत्ररूपमें ही वर्णन करूँगा, क्योंकि इसका विस्तारसे वर्णन नहीं किया जा सकता॥136॥ महाप्रभुकी कृपासे श्रीरूपके द्वारा भक्तिरसामृतसिन्धुकी एक बूँदका पान :— पारापार-शून्य गभीर भक्तिरस-सिन्धु। तोमाय चाखाइते तार कहि एक ‘बिन्दु’॥137॥ अनुवाद—भक्तिरस-सिन्धु ओर-छोररहित है और इसकी गहराईको भी कोई नहीं जान सकता। तुम्हें भक्तिरस-सिन्धुको चखानेके लिये इसकी एक बिन्दुकी व्याख्या कर रहा हूँ॥137॥ अनुभाष्य—‘पारापार-शून्य’–पार (अर्थात्) एक ओर, अपार (अर्थात्) दूसरी ओर; इसलिये जिसके दोनों ओरके बीचमें किसी भी ओरकी कोई सीमा नहीं है॥137॥ सर्वप्रथम ब्रह्माण्डके बद्धजीवोंका वर्णन; संख्यामें बहुत अधिक :— एइमत ब्रह्माण्ड भरि’ अनन्त जीवगण। चौराशी-लक्ष योनिते करये भ्रमण॥138॥ अनुवाद—इस प्रकार इस ब्रह्माण्डमें अनन्त जीव हैं जो चौरासी लाख योनियोंमें इस ब्रह्माण्डमें भ्रमण कर रहे हैं॥138॥ अनुभाष्य—‘चौराशी लक्ष्योनि’ (विष्णुपुराणमें)— “जलजा नवलक्षाणि स्थावरा लक्षविंशतिः। कृमयो रुद्रसंख्याकाः पक्षिणां दशलक्षकम्। त्रिंशल्लक्षाणि पशवः चतुलंक्षाणि मानुषाः॥” [अर्थात् “जलचरोंकी नौ लाख योनियाँ हैं, बीस लाख योनियाँ स्थावर पेड़-पौधोंकी हैं, कीट-पतंगोंकी ग्यारह लाख योनियाँ हैं, पक्षियोंकी दस लाख योनियाँ हैं, पशुओंकी तीस लाख योनियाँ हैं और मनुष्योंकी चार लाख योनियाँ हैं।”]॥138॥ जीवात्मा और जीवके स्वरूपका परिमाण :— केशाग्र-शतैक-भाग पुनः शतांश करि। तार सम सूक्ष्म जीवेर ‘स्वरूप’ विचारि॥139॥ अनुवाद—केशके अग्रभागको सौ भागोंमें बाँटनेके बाद, उसके एक भागको पुनः सौ भागोंमें बाँटनेपर, उस एक भागके समान सूक्ष्म जीवका स्वरूप है॥139॥ । 191