श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 19/139-143 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य-मुण्डकमें 3/1/9-“एषोऽणुरात्मा” अर्थात् यह आत्मा अणुके समान सूक्ष्म है ॥139॥ शास्त्र-प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (10/87/30)में श्रुति-स्तव-व्याख्यामें उद्धृत-श्लोक- केशाग्रशतभागस्य शतांशसदृशात्मकः। जीवः सूक्ष्मस्वरूपोऽयं संख्यातीतो हि चित्कणः॥140॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥140॥ अमृतप्रवाह भाष्य-केशके अग्रभागके सौ भाग करनेपर उसके एक भागके पुनः सौवे अंशके सदृश स्वरूप ही जीवका सूक्ष्म स्वरूप है; जीव चित्कण और संख्यातीत (असंख्य) हैं॥140॥ अनुभाष्य- अयं जीवः हि केशाग्रशतभागस्य (अति-सूक्ष्मकेशाग्रायामस्य शतधा विभक्तस्य, पुनः तादृश-परमसूक्ष्मांशस्य) शतांशसदृशात्मकः (पुनः शतखण्डांशतुल्यः) सूक्ष्मस्वरूपः (परमाणुचेतनः चित्कणः सूक्ष्मचिदणुरखण्डः) संख्यातीतः (अनन्तसंख्यः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥140॥ श्वेताश्वतर उपनिषदके मन्त्रानुसार पञ्चदशी चित्रदीप (81)में :- बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेय इति चाह परा श्रुतिः ॥141॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥141॥ अमृतप्रवाह भाष्य-केशके अग्रभागके सौवे भागको लेकर उसे सौ भागोंमें विभाग करनेसे जो सूक्ष्म भाग होता है, जीव-वैसा सूक्ष्म है, प्रधान श्रुतिओंने ऐसा कहा है॥141॥ अनुभाष्य- [यः] बालाग्रशतभागस्य (केशाग्रस्य शतधा खण्डितस्य, तस्य पुनः) शतधा कल्पितस्य (विभक्तस्य) च भागः (खण्डः),- सः [एव] जीवः (जीवस्वरूपाकारः) विज्ञेयः (ज्ञातव्यः) इति च परा (श्रेष्ठा) श्रुतिः (श्वेताश्वतरप्रमुखा) आह। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥141॥ श्रीमद्भागवत (11/16/11)में :- सूक्ष्माणामप्यहं जीवः ॥ 142 ॥ अनुवाद-सूक्ष्म वस्तुओं अर्थात् अणुओंके मध्य मैं जीवात्मा हूँ॥142॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी-किसी पाठमें लिखा हुआ है,- श्रीमद्भागवतमें उद्धवके प्रति श्रीभगवद् वाक्य- “गुणिनामप्यहं सूत्रं महताञ्च महानहम्। सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः॥” सूक्ष्मगणोंमें मैं (भगवान्) 'जीव' (भेदाभेद-प्रकाश) हूँ।॥142॥ अनुभाष्य-भगवान्की विभूतियोंका श्रवण करनेकी इच्छा करनेपर श्रीउद्धवके प्रति श्रीकृष्णकी उक्ति- अहं (चिदचिदीश्वरः अद्वयज्ञानात्मकः श्रीभगवान्) सूक्ष्माणां (अणूनाम् अपि मध्ये) जीवः (जीवात्मा)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥142॥ श्रीमद्भागवत (10/87/30)में :- अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्वगता- स्तर्हि न शास्यतेति नियमो ध्रुव नेतरथा। अजनि च यन्मयं तद्विमुच्य नियन्तृ भवेत् सममनुजानतां यदमतं मतदुष्टतया ॥143॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥143॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे ध्रुव (सर्वाश्रय) ! यदि सभी अनन्त शरीरधारी जीव ध्रुव अर्थात् [आपसे उत्पन्न नहीं होकर] परम नित्य और सर्वव्यापी होते, तो फिर उनका आपके शासनके अधीन रहनेका नियम नहीं होता। यदि जीवको 'अणु', सामान्यतः 'नित्य' कहकर स्वीकार किया जाय, तभी वे आपके अधीन होते हैं। [अग्निरूप 192 ।