श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1639, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/143-148 ] आपसे चिद्गारीरूप] होकर जिन जीवोंने जन्मग्रहण किया है, आप उनके अपरित्यज्य नियन्ता हैं। इसलिये जो जीव और आपको 'एक' मानते हैं, उनका मत- 'मतवाद'से दूषित है ॥ 143 ॥ अनुभाष्य-जनलोकमें ब्रह्मसत्र यज्ञमें श्रवण करनेके इच्छुक मुनियोंके निकट कुमारोंमें अन्यतम ब्रह्मर्षि सनन्दन श्रुतिओंके द्वारा किये गये भगवद्-स्तवका वर्णन कर रहे हैं- हे ध्रुव (सर्वाश्रय, नित्य)! अपरिमिताः (वस्तुतः एव अनन्ताः) ध्रुवाः (नित्याः) तनुभृतः (शरीरधारिणः जीवाः) यदि सर्वगताः (विभवः व्यापकाः स्युः), तर्हि शास्यता (तच्छास्यता) इति यः त्वया नियमः (नियमनं) सः न स्यात्, इतरथा च [घटेत, नियम्यनियन्तृ-भावावस्थितत्वात्]; यन्मयं (यत् अग्न्यादिमयं स्फुलिङ्गादिकं कार्यं जीवाख्यं वस्तु) अजनि (जातं, तेषां जीवानां) नियन्तृ (शास्तु) भवेत्, तत् अविमुच्य (तान् जीवान् अपरित्यज्य यत् उपादानरूपं परमात्मानं जीवतत्त्वेन) समम् अनुजानतां (केवलाद्वैतवादिनां) मतदुष्टतया (मतस्य दुष्टतया अशुद्धत्वेन) अमतम् एव (अज्ञातप्रायम् अविषयत्वात्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥ विरूप-भेदसे जीव दो प्रकारके - 1) स्थावर, 2) जङ्गम; जङ्गम तीन प्रकारके - जल, स्थल और आकाशके :- तारे मध्ये 'स्थावर', 'जङ्गम'-दुइ भेद। जङ्गमे तिर्यक्-जल-स्थलचर-विभेद ॥ 144 ॥ अनुवाद - माया जगत्में अनन्त जीव 'स्थावर' तथा 'जङ्गम' - इन दो प्रकारके हैं। जङ्गम जीवोंमें पक्षी, जलचर तथा स्थलचर - ये तीन भेद हैं ॥ 144 ॥ अनुभाष्य - 'तार मध्ये' - ब्रह्माण्डके अन्तर्गत बद्धजीवोंमें ॥ 144 ॥ स्थलचरका श्रेष्ठत्व; उनमेंसे मनुष्य जातिकी सर्वश्रेष्ठता; उनमेंसे कर्मी, ज्ञानी और भक्तोंमें तारतम्य-तुलना :- तार मध्ये मनुष्य-जाति अति अल्पतर। तार मध्ये म्लेच्छ, पुलिन्द, बौद्ध, शबर ॥ 145 ॥ अनुवाद - इन जङ्गम जीवोंमें मनुष्य-जातिकी संख्या अति अल्पतर है। और मनुष्य-जातिमें भी म्लेच्छ, पुलिन्द, बौद्ध तथा शबरादि लोग हैं ॥ 145 ॥ अनुभाष्य - 'तार मध्ये' - वेदोंमें निष्ठा रखनेवालोंके विपरीत मनुष्य-जातिमें ॥ 145 ॥ वेदनिष्ठ-मध्ये अर्द्धेक वेद 'मुखे' माने। वेदनिषिद्ध पाप करे, धर्म नाहि गणे ॥ 146 ॥ अनुवाद- वेदनिष्ठ मनुष्योंमें प्रायः आधे तो वेदको केवल 'मुख'से मानते हैं, किन्तु वेदोंमें निषिद्ध पापोंको करते हैं। ऐसे लोग धर्मका पालन नहीं करते हैं ॥ 146 ॥ अनुभाष्य-मुखसे स्वयंको 'वेदनिष्ठ'के रूपमें स्वीकार करके वेदोंके विरुद्ध आचरण करनेवाले - स्वेच्छाचारी 'कुकर्मी' अथवा 'अन्याभिलाषी' हैं ॥ 146 ॥ धर्माचारि-मध्ये बहुत 'कर्मनिष्ठ'। कोटि-कर्मनिष्ठ-मध्ये एक 'ज्ञानी' श्रेष्ठ ॥ 147 ॥ अनुवाद - वेदोंमें वर्णित धर्मका आचरण करने वालोंमें-से भी बहुत सकाम कर्मोंमें निष्ठा रखनेवाले हैं। ऐसे करोड़ों सकाम कर्मियोंमेंसे श्रेष्ठ कोई एक 'ज्ञानी' होता है ॥ 147 ॥ मुक्तगणोंमें भी श्रीकृष्णभक्तका सुदुर्लभ होना :- कोटिज्ञानि-मध्ये हय एकजॅन 'मुक्त'। कोटिमुक्त-मध्ये 'दुर्लभ' एक कृष्णभक्त ॥ 148 ॥ अनुवाद - करोड़ों ज्ञानियोंमेंसे कोई एक व्यक्ति ही मुक्त होता है। करोड़ों मुक्तोंमें भी एक कृष्णभक्त 'दुर्लभ' होता है ॥ 148 ॥ अनुभाष्य - 'कर्मनिष्ठ' - अपने सुखकी कामनाओंसे जो पुण्यादि सत्कर्म करते हैं, उन्हें कर्मनिष्ठ कहते हैं। 'ज्ञानी'-पुनः ऐसे करोड़ों कर्मनिष्ठोंमेंसे निष्काम-कल्पनासे कोई-कोई ही अपने कर्मफलोंको त्याग करता है। इस प्रकारके व्यक्तिको भी कर्मनिष्ठ ही कहा जाता है। ऐसे । 193