श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1640, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/148-150 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करोड़ों कर्मनिष्ठोंमेंसे जो सत्त्वगुणमें स्थित होकर रजोगुण और तमोगुणको दूर करनेके लिये, प्राकृत पुण्य और पाप, दोनों प्रकारकी अवस्थाओंसे हटकर आत्माकी निर्मलताका अनुसरण करनेके लिये प्रकृतिसे अतीत अभेद-ब्रह्मानुसन्धानमें रत होता है, वही ज्ञानी है। करोड़ों ज्ञानियोंमेंसे कोई-कोई ज्ञानमार्गमें सत्त्वगुणके आश्रित होकर शम-दमादि छः प्रकारके साधनादिरूपा मिश्रा और बिद्धा-भक्तिमूलक सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं। फिर द्वैतबुद्धिसे अपने इन उपायोंको भी असम्पूर्ण मानकर उनका त्याग कर देते हैं। इस प्रकार अनित्य और असत्य साधनको ही नित्यसिद्धिके कारणरूपमें जानकर उस साधनके फलसे अन्तमें वे अभिमान करते हैं कि मैंने अपनी बद्धानुभूतिसे मुक्ति अर्थात् ब्रह्मभूत स्वरूप प्राप्त किया है। उसीके उद्देश्यसे वे अद्वैत-विचारसे 'दृष्टा', 'दर्शन' और 'दृश्य' अथवा 'ज्ञाता', 'ज्ञान' और 'ज्ञेय'के वैशिष्ट्यका लोप करते हैं। वैसे अचित्-मिश्रातीत केवलचिन्मयवादी ज्ञानी ही 'मुक्त' कहे जाते हैं। ऐसे करोड़ों मुक्तोंमें भी श्रीकृष्णभक्त विरले हैं॥ 148 ॥ श्रीकृष्ण भक्तके सुदुर्लभ होने और सर्वश्रेष्ठ होनेका कारण :- कृष्णभक्त—निष्काम, अतएव 'शान्त'। भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी—सकलि 'अशान्त'॥ 149॥ अनुवाद—श्रीकृष्णभक्त निष्काम होते हैं, इसलिये वे 'शान्त' होते हैं। भोग, मोक्ष और सिद्धिकी कामना करनेवाले सभी 'अशान्त' रहते हैं॥ 149॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जीव दो प्रकारके हैं, -नित्यमुक्त और नित्यबद्ध। नित्यबद्ध जीव स्थावर और जङ्गमके भेदसे दो प्रकारके हैं। जो—अचल (जैसे, वृक्षादि) हैं, वे ही 'स्थावर' जीव हैं; जो—सचल हैं, वे ही 'जङ्गम' हैं। जङ्गम तीन प्रकारके हैं,—तिर्यक् अर्थात् पक्षी, जलचर और स्थलचर। स्थलचरोंमें मानवजाति अत्यन्त अल्प संख्यक है। उन अल्पसंख्यक मनुष्योंमें म्लेच्छ, पुलिन्द, बौद्ध और शबरादिको छोड़ देनेपर वेदनिष्ठ मनुष्य ही बाकी रहते हैं। वेदनिष्ठ मनुष्य भी दो प्रकारके हैं,—धर्माचारी और अधर्माचारी। धर्माचारियोंमें अधिकांश कर्मनिष्ठ हैं; कोई-कोई ज्ञाननिष्ठ हैं। करोड़ों ज्ञाननिष्ठोंमें वास्तवमें कोई एक व्यक्ति ही 'मुक्त' है; यहाँ, जो जड़ीयबुद्धिसे मुक्त हैं, उन्हें ही 'मुक्त' कहा गया है। उन सब मुक्त व्यक्तियोंमें, जो श्रद्धालु होकर श्रीकृष्णभजनमें प्रवृत्त हैं, वे ही 'श्रीकृष्णभक्त' हैं। श्रीकृष्णभक्तमें कोई कामना नहीं होती। पहले कहे गये 'मुक्त' व्यक्ति तक सभी कामनायुक्त हैं; धर्माचारी और कर्मनिष्ठ—'भुक्तिकामी' हैं और मुक्त तक ज्ञानी- 'मुक्तिकामी' हैं, उनमेंसे पुनः कोई-कोई योगफलके 'सिद्धिकामी' हैं। जब तक उनके हृदयमें ये तीन प्रकारकी कामनाएँ रहती हैं, तब तक उन्हें यह सब कामनाएँ शान्ति प्रदान नहीं करतीं; इसी कारण वे सभी 'अशान्त' हैं। इसलिये एकमात्र निष्काम श्रीकृष्णभक्त ही शान्त अर्थात् शान्ति प्राप्त किया हुआ है॥ 144-149 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण भक्त ही एकमात्र कामनाशून्य एवं एकमात्र श्रीकृष्णनिष्ठ होनेके कारण शान्त होता है। स्वर्गादि भुक्तिकामी कर्मी, निर्वाणादि मुक्तिकामी ज्ञानी एवं अणिमादि अठारह प्रकारकी सिद्धिकामी योगी अपनी-अपनी कामनाओंके वशीभूत होकर उन्हींकी प्राप्तिके लिये अशान्त रहते हैं। पुनः, कामनाकी तृप्ति होनेपर भी वे असत्-प्राप्तिके कारण श्रीकृष्णनिष्ठ नहीं होनेसे अशान्त ही रहते हैं॥ 149॥ शास्त्रप्रमाण :- श्रीमद्भागवत (6/14/5)में— मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ 150 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे महामुने, करोड़ों-करोड़ों मुक्तों और सिद्धोंमेंसे नारायण-परायण प्रशान्तात्मा पुरुष अत्यन्त दुर्लभ है॥ 150 ॥ 194 ।