श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1641, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/150-152 ] अनुभाष्य- मुक्तानां (अज्ञानबन्ध-रहितानां) सिद्धानां (योग-सिद्धानां) कोटिषु अपि मध्ये प्रशान्तात्मा (निष्काममनाः) नारायणपरायणः सुदुर्लभः। [तन्त्रवाक्य-'ज्ञानतः सुलभः मुक्तिर्भुक्तिर्यज्ञादि-पुण्यतः। सेयं साधनसाहस्रैर्हरिभक्तिः सुदुर्लभा ॥ "] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [तन्त्र-वाक्य-“ज्ञान-साधनसे 'मुक्ति' और यज्ञादि-पुण्यसे 'भोग' सुलभ हैं, किन्तु हजारों-हजारों साधनोंके द्वारा भी वह हरिभक्ति अतिशय दुर्लभ है।”] ॥ 150 ॥ लताके साथ भक्तिकी उपमा; भक्तिका दूसरा नाम 'श्रीकृष्णानुराग'; बद्धजीवके लिये उस श्रीकृष्णप्रीति-सेवाकी प्राप्तिके क्रमके वर्णनके मूलमें भक्तिप्रदान करनेवाली श्रीकृष्णकृपारूपा सुकृति है, उसके फलस्वरूप सद्गुरुकी प्राप्ति, उनकी कृपासे श्रवणके फलसे सम्बन्धकी उपलब्धि और श्रद्धाका उदय :- ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव। गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्तिलता-बीज ॥ 151 ॥ अनुवाद-ब्रह्माण्डमें भ्रमण करते-करते कोई भाग्यवान् जीव ही गुरु और श्रीकृष्णकी कृपासे भक्तिलताके बीजको प्राप्त करता है ॥ 151 ॥ अनुभाष्य-'ब्रह्माण्ड'का अर्थ चौदह भुवन है (आदिलीला, 5/98 संख्या देखें)। 'भाग्यवान्'-सुकृतिसम्पन्न जीव; अनजानेमें विष्णु- वैष्णवकी सेवा होनेसे जीवकी 'सुकृति' उदित होती है,-(श्रीनारदका जन्म-उपाख्यान-भागवत 1/5/23-30 देखें)। यह भक्ति उन्मुखी सुकृति-जीवात्माकी चिद्- वृत्तिका ही अस्फुट विकास है, यह जड़ीय कर्म नहीं है। सुकृतिके फलस्वरूप श्रद्धा और श्रवणसे सम्बन्धज्ञान प्राप्त होनेपर ही वास्तविक शुद्धभक्ति आरम्भ होती है। 'गुरुप्रसाद'-गुरु कृपा करके शिष्यको श्रीकृष्णभक्ति रूप सर्वोत्तम अनुग्रह दान करते हैं। सुकृतिवान् अनुग्रहयोग्य व्यक्तिके परम कल्याणके उद्देश्यसे श्रीभगवान् अपने प्रियतम किसी एक व्यक्तिमें शक्ति अर्पित करके जगत्में अपनी कृपाशक्तिके वितरणके लिये महान्त-गुरुके रूपमें भेजते हैं। श्रीगुरुदेव शिष्यको श्रीकृष्णसेवारूपी अपनी कृपा प्रदान करते हैं। 'कृष्णप्रसाद'-भक्तिलताके बीजको प्रदान करनेवाले आश्रयजातीय भगवद्-स्वरूप गुरुदेवको शिष्यके निकट भेजना ही श्रीकृष्णकी कृपा है। गुरुकी कृपासे श्रीकृष्ण कृपा प्राप्त होती है एवं श्रीकृष्णकी कृपासे गुरुकृपाकी प्राप्ति होती है। 'भक्तिलता-बीज'-जिस बीजसे भगवान्की सेवारूपी लतिका उत्पन्न होती है। भक्तिलताका कारण गुरुकी कृपा और श्रीकृष्णकी कृपा है। अन्याभिलाष-बीज, कर्म-बीज और ज्ञान-बीजसे वैसे-वैसे वृक्षादि उत्पन्न होते हैं। इन सब बीजोंसे भक्तिलताका बीज अलग है। गुरु-कृष्णकी प्रसन्नतासे ही भक्तिलताका बीज प्राप्त होता है। उनके अप्रसन्न होनेसे अन्याभिलाष, कर्म अथवा ज्ञान बीजकी प्राप्ति हो सकती है, किन्तु शुद्धभक्तिका बीज लुप्त हो जाता है। जिनका वास्तवमें सौभाग्य नहीं है, उनके भाग्यमें भक्तिलता-बीजकी प्राप्ति नहीं होती। श्रद्धावान् जीव ही गुरुपादपद्मका आश्रय करता है। सद्गुरुके द्वारा दिया गया अनुग्रह-मन्त्र और प्रदर्शित पथ ही 'भक्तिमार्ग' है ॥ 151 ॥ उसके साथ ही अभिधेय आरम्भ; अनर्थयुक्त अवस्थामें भी भजन :- माली हञा करे सेइ बीज आरोपण। श्रवण-कीर्त्तन-जले करये सेचन ॥ 152 ॥ अनुवाद-उस बीजको प्राप्त करके उस भाग्यवान् जीवको माली बनकर सावधानीसे उस बीजको अपने हृदयमें रोपना होगा और उसे श्रवण और कीर्तनके जलसे सींचना होगा ॥ 152 ॥ अनुभाष्य-गुरुपादपद्मसे श्रवण करके फिर उसका कीर्तन-कार्य ही जलसे सींचना है, उसके द्वारा बीज क्रमशः लतामें परिणत होता है ॥ 152 ॥ । 195