श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1642, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/153-156 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनर्थमुक्त अवस्थामें भी भजन; रागमयी भक्तिका आश्रय—श्रीकृष्णमाधुर्य है, ब्रह्म और श्रीनारायणका ऐश्वर्य नहीं :— उपजिया बाड़े लता 'ब्रह्माण्ड' भेदि' याय। 'विरजा', 'ब्रह्मलोक' भेदि' 'परव्योम' पाय ॥ 153 ॥ अनुवाद—जलके द्वारा सिञ्चन करनेपर बीज अङ्कुरित होता है और क्रमशः लता बढ़ते हुए 'ब्रह्माण्ड'को भेद करके 'विरजा' एवं 'ब्रह्मलोक'को भी भेदकर 'परव्योम'में पहुँच जाती है॥ 153॥ अनुभाष्य—'ब्रह्माण्ड' अर्थात् चौदह भुवनोंके भीतर भक्तिलताका आश्रयस्वरूप कोई भी वृक्ष नहीं है। ब्रह्माण्डकी किसी भी वस्तुके प्रति भक्ति प्रयोग नहीं हो सकती। ब्रह्माण्डको पार करके 'विरजा-नदी' है; वहाँ तीन गुणोंकी साम्यावस्था लक्षित होती है,—वह प्राकृत- मलको धो देनेवाली नदी है। उसे पार करके ही ज्ञानियोंका आदर्श 'ब्रह्मलोक' है। विरजामें जैसे भक्ति- लताके आश्रय करने योग्य कोई वृक्ष नहीं है, ब्रह्मलोकमें भी वैसे भक्तिलताके सेव्य वृक्षका अभाव है। आश्रय-वृक्षको प्राप्त नहीं करके श्रवण-कीर्त्तनरूपी जलसे सिञ्चित बढ़ती हुई लता ब्रह्मलोकको पार करके 'परव्योम' धामको प्राप्त करती है॥ 153॥ तबे याय तदुपरि 'गोलोक-वृन्दावन'। 'कृष्णचरण'-कल्पवृक्षे करे आरोहण ॥ 154 ॥ अनुवाद—तब लता और बढ़ती हुई उस परव्योमसे भी ऊपर गोलोक वृन्दावनमें पहुँच जाती है। वहाँपर श्रीकृष्णके चरणकमलरूपी कल्पवृक्षका आश्रय ग्रहण करती है॥ 154॥ अनुभाष्य—ब्रह्मलोक और विरजाके एक ओर मायिक ब्रह्माण्ड अवस्थित हैं, वही 'देवीधाम' है। देवीधाम अथवा इतर-व्योम—प्रकृतिके अधीनरूपमें अवस्थित है। प्रकृतिके दूसरी ओर 'वैकुण्ठ' अथवा 'परव्योम' अवस्थित है। वहाँ माया कुछ भी प्रभाव दिखानेमें समर्थ नहीं होती। ब्रह्ममय वैकुण्ठके ऊपरी भागमें गोलोक-वृन्दावन अवस्थित है। वहाँ भक्तिलता श्रीकृष्णचरणरूपी कल्पवृक्षका आश्रय करती है। परव्योममें परव्योमनाथ श्रीनारायणकी जो पूजा विहित होती है, उसमें 'शान्त', 'दास्य' और 'आधा-सख्य'-रस लक्षित होता है; परन्तु गोलोक-वृन्दावनमें श्रीकृष्णकी सेवामें 'शान्त', 'दास्य' और 'गौरव-अर्द्धसख्य'के साथ 'विश्रम्भ-सख्यका आधा', 'वात्सल्य' और 'मधुर',—ये पाँच भाव पूर्ण मात्रामें विकसित हैं; यहीं 'भक्तिलतिका' सम्पूर्णरूपमें आश्रय प्राप्त करती है॥ 154॥ श्रीकृष्णप्रेमरूपी प्रयोजनकी प्राप्ति; साधन-अवस्थामें सदैव श्रवण-कीर्तन :— ताँहा विस्तारित हञा फले प्रेम-फल। इँहा माली सेचे नित्य श्रवण-कीर्त्तनादि-जल ॥ 155 ॥ अनुवाद—वहाँ लता विकसित होकर प्रेमरूपी-फल उत्पन्न करती है। और साधक इस जगत्में रहते हुए ही माली होकर उसे नित्य श्रवण-कीर्त्तनादि जलसे सींचता है॥ 155॥ अनुभाष्य—'ताँहा'—गोलोक-वृन्दावनमें; 'प्रेम-फल'— अप्राकृत परम-लोभनीय श्रीकृष्णेन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छा-मूलक अद्भुत वस्तु है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रकी अपनी वस्तु है, वह बद्धजीवकी भोगमय प्राकृत जड़बुद्धिके गोचर नहीं होती। 'इँहा'—प्रपञ्चमें; यहाँ रहकर उस भक्तिलताके बोये गये बीजको नित्य अप्राकृत श्रीकृष्णनाम, रूप, गुण, लीलाके श्रवण-कीर्त्तनादिरूप जलसे सींचना होता है॥ 155॥ अपक्व (कच्ची) अवस्थामें वैष्णव-अपराध ही साधनपथमें सबसे प्रधान 'विघ्न' :— यदि वैष्णव-अपराध उठे हाती माता। उपाड़े वा छिण्डे, तार शुखि याय पाता ॥ 156 ॥ अनुवाद—यदि साधक वैष्णव-अपराध करे, तो वह अपराधरूपी मत्त हाथी उस भक्तिरूपी लताको जड़से 196 ।