श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1643, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/156-160 ] उखाड़कर तहस-नहस कर देता है, जिससे लताके पत्ते सूख जाते हैं॥156॥ अनुभाष्य- 'वैष्णव-अपराध'—मतवाले हाथीके समान है। 'अपराध'—दस प्रकारके नामापराध (आदिलीला 8/24 संख्या देखें)। 'हाती माता'—प्रबल भक्तिविरोधी भाव अथवा गुरुकी अवज्ञास्वरूप वैष्णव-अपराध, वही भक्तिलताका विनाश करनेवाला है॥156॥ नामापराधसे सावधान रहना ही मङ्गलका कारण :- ताते माली यत्न करि' करे आवरण। अपराध-हस्तीर यैछे ना हय उद्गम॥157॥ अनुवाद—इसलिये मालीको यत्नपूर्वक उस लताके चारों ओर बाड़ लगा देनी चाहिये, जिससे अपराधरूपी हाथी उसमें प्रवेश ही न कर सके॥157॥ अनुभाष्य-भक्तिलताके चारों ओर बाड़ लगाना आवश्यक है। श्रीकृष्ण-अभक्तके सङ्गत्याग चेष्टारूपी आवरण अथवा बाड़के नहीं रहनेसे अभक्त-सङ्गके फलस्वरूप उत्पन्न अपराधरूप मतवाले हाथीके द्वारा भक्तिलताके उखाड़ने और नष्ट होने अथवा रौंदे जानेकी सम्भावना है। ऐसा न हो, उस विषयमें साधकके लिये सावधान रहना अति आवश्यक है। श्रीरूप प्रभुने 'उपदेशामृत'में कहा है— “अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रहः। जनसङ्गश्च लौल्यञ्च षड्भिर्भक्तिर्विनश्यति॥” [अर्थात् “अधिक आहार या सञ्चय, भक्ति-प्रतिकूल चेष्टा, वृथा-आलाप, नियमाग्रह, असत्सङ्ग एवं लौल्य अर्थात् बुरे मतोंको ग्रहण करनेके लिये चित्तकी चञ्चलता—इन छः प्रकारके दोषोंसे भक्ति विनष्ट हो जाती है।"]॥157॥ अमृतानुकणिका—श्रीमद्भागवत (7/1/1) की टीकामें श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर लिखते हैं,–“महत् पुरुषके प्रति अपराधरूप हाथीके हाथसे महत्-कृपासे प्राप्त भक्तिलताको श्रीशिक्षाष्टकके तृतीय श्लोकमें वर्णित चार गुणों, यथा—'स्वयंको तृणसे भी अधिक दीन समझना, वृक्षसे अधिक सहनशील होना, अमानी होकर सबको यथायोग्य सम्मान देना' रूपी शिलाके आवरणके द्वारा संरक्षण करते हुए श्रवणादि जल-सिञ्चनसे पालन करना चाहिये॥” 157॥ भक्तिकी भाँति आकृति अथवा देखनेमें समानता होनेपर भी जो भक्ति नहीं, ऐसी अभक्तिका समूह :- किन्तु यदि लतार सङ्गे उठे 'उपशाखा'। भुक्ति-मुक्ति-वाञ्छा, यत असंख्य तार लेखा॥ 158॥ 'निषिद्धाचार', 'कुटीनाटी', 'जीवहिंसन'। 'लाभ', 'पूजा', 'प्रतिष्ठादि' यत उपशाखागण॥ 159॥ अभक्तिको आश्रय देनेपर उसकी वृद्धिके कारण भक्तिपर शिथिलताके आवरणकी सम्भावना :- सेकजल पाञा उपशाखा बाड़ि' याय। स्तब्ध हञा मूलशाखा बाड़िते ना पाय॥ 160॥ अनुवाद—किन्तु भक्तिलताके साथ भुक्ति-मुक्ति- सिद्धि आदि अनेक 'उपशाखाएँ' भी उपजती हैं और ये उपशाखाएँ असंख्य हैं। 'निषिद्धाचार', 'कुटीनाटी', 'जीवहिंसा', 'लाभ', 'पूजा', 'प्रतिष्ठा' आदि अनेक उपशाखाएँ हैं। यदि अपराधोंका वर्जन न किया जाय तो श्रवण-कीर्तनरूपी जलको पाकर उपशाखाएँ बढ़ जाती हैं और मूलशाखा अर्थात् भक्तिलता स्तब्ध होकर बढ़ नहीं पाती॥ 158-160॥ अनुभाष्य- 'उपशाखा'—वास्तविक लताकी अपनी शाखाके अतिरिक्त उसके जैसी समान आकृतिवाली अन्य लताकी शाखा इस वास्तविक लतासे लिपटकर उसीके ही 'अङ्ग'के जैसी प्रतीत होती है, परन्तु वह वास्तविक लता नहीं होती। 'भुक्ति'—कर्मफल भोगवादीकी प्राप्य वस्तु है; 'मुक्ति'—ज्ञानवादीकी प्राप्य वस्तु है; 'वाञ्छा'—सिद्धिवादीको प्राप्त होनेवाले योगफलकी विभूतियाँ आदि हैं। 'निषिद्धाचार'—जो सिद्ध पुरुषोंका आचरण नहीं है । 197