भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1644, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1644

[ 19/158-162 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अथवा सिद्धि प्राप्तिमें बाधा है अर्थात् जिस आचरणके द्वारा भक्ति लुप्त हो जाती है। जैसे भोक्ताका अभिमान करके भोगमयी बुद्धिसे जीवका स्त्री-सङ्ग अथवा श्रीकृष्ण-अभक्तका सङ्ग अथवा विषयी-व्यक्तिका दर्शन और स्त्रीदर्शन। 'कुटीनाटी'—कुटिलतापूर्ण नाटक, कपटता; कु-टी एवं ना-टी—आत्म-प्रसादका विरोध अथवा असन्तोष है। 'जीवहिंसा'—श्रीकृष्णभक्तिमूलक नित्यकल्याण-वाणीके कीर्तनमें अथवा प्रचारमें सङ्कोच; अथवा कंजूसी अर्थात् मायावादी, कर्मी और अन्याभिलाषीको आश्रय देना; प्राणियोंको मारना अथवा प्राणीमात्रको ही उद्वेग अथवा क्लेश देना—ये सब जीवहिंसा है। 'लाभ'—जड़ेन्द्रियोंकी तृप्तिके उद्देश्यसे जगत्में धन आदिकी प्राप्ति अथवा उसे संग्रह करनेकी अभिलाषा। 'पूजा'—सांसारिक लोगोंके मनोधर्मको बढ़ावा देकर सम्मान प्राप्त करना। 'प्रतिष्ठा'—संसारमें महत्वपूर्ण व्यक्ति बननेकी लालसा अथवा लोगोंसे अपने नश्वर यशको पानेकी प्रबल इच्छा। श्रवण-कीर्तनादि जलकी सिंचाईके प्रभावसे उपशाखा पुष्ट होकर वर्धित होती है, उससे मूल भक्तिलता बढ़ नहीं पानेके कारण स्तब्ध हो जाती है। निरपराध श्रवण और कीर्तन अर्थात् दुःसङ्गका परित्याग नहीं करके अपराधके साथ अनुष्ठान करते-करते जीव विषयभोग परायण, अथवा मोक्षकामी, अथवा सिद्धिकामी हो जाता है। अथवा वह लोभी या कपटी या अवैध-स्त्रीलम्पट हो जायेगा। अथवा वह छल-भक्तिवाला अथवा प्राकृत-सहजियावादी होगा। अथवा वह उच्चकुलमें जन्मके अभिमानसे अपनेको बड़ा भक्त माननेवाला या राजा परीक्षितके द्वारा प्रदान किये गये कलिके पाँच स्थानोंका [द्यूत (जुआ), मद्यपान, (अवैध) स्त्री-सङ्ग, हिंसा और स्वर्ण (धन)] अधिवासी या वैष्णवोंमें जातिबुद्धि रखनेवाला हो जायेगा। अथवा वह नाम-मन्त्र-विग्रह-भागवतका व्यापारी या अवैध-वृत्तिके द्वारा धन आदिको संग्रह करनेमें तत्पर होगा। या स्वयंको 'निर्जन-भजनानन्दी' कहलाकर प्रतिष्ठाकी आकाङ्क्षा रखनेवाला, चिद् और जड़के समन्वयवादके पोषणके द्वारा यशको प्राप्त करनेका इच्छुक होगा। अथवा अयोग्य गुरुका दास बनकर विष्णु-वैष्णव-विरोधी अद्वैव-वर्णाश्रमके अधीन और उसका पोषक बनेगा और उपरोक्त एक अथवा अनेक वृत्तियोंके द्वारा उसके बहुत प्रकारके परिचय होंगे। अर्थात् वह अपनी इन्द्रियोंके सुखभोगमें प्रमत्त होकर शुद्धभक्तिके अतिरिक्त अन्य नश्वर वस्तुओंको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे अबोध लोगोंको ठगकर जगत्में 'धार्मिक' अथवा 'साधु' अथवा 'महान'के रूपमें परिचय प्राप्त करनेके आकाङ्क्षी होकर वास्तविक शुद्ध हरिसेवक नहीं बन पायेगा॥ 158-160 ॥ प्रथमावस्थामें ही साधकके लिये दुःसङ्गके त्यागकी व्यवस्था करना आवश्यक :- प्रथमेइ उपशाखार करये छेदन। तबे मूलशाखा बाड़ि' याय वृन्दावन ॥ 161 ॥ अनुवाद-इसलिये प्रथम अवस्थामें ही उपशाखाओंको काट देना चाहिये, तभी मूलशाखा (भक्तिलता) बढ़ती हुई वृन्दावनमें जाती है॥161॥ अनुभाष्य-यदि पहले बतायी गयी 'उपशाखाओं'को अङ्कुरित होते देखकर उन्हें उसी समय जड़सहित उखाड़ फेंक दिया जाय, तभी मूल भक्तिलताकी शाखा वृन्दावनमें अप्राकृत प्रेमफलको जन्म देती है; अन्यथा उपशाखाकी प्रबलताके कारण लम्बे समयके लिये हरिभजनका साथ छूट जाता है अर्थात् ब्रह्माण्डमें (स्वर्गादि उच्चलोकोंमें, मर्त्यलोकमें अथवा नरकमें) क्लेशकी प्राप्ति अवश्यम्भावी है॥161॥ तभी प्रयोजनसिद्धि अथवा श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त करनेकी सम्भावना :- 'प्रेमफल' पाकि' पड़े, माली आस्वाद्य। लता अवलम्बि' माली 'कल्पवृक्ष' पाय ॥ 162 ॥ 198 ।