श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1645, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/162–164 ] अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 162 ॥ अनुभाष्य—लताका आश्रय करके भक्त-माली श्रीकृष्णचरणकमलरूप कल्पवृक्षको प्राप्त करता है। गोलोक-वृन्दावनमें प्रेमफलके पककर गिरनेपर, प्रपञ्चमें अवस्थित भक्त उसका आस्वादन कर सकता है ॥ 162 ॥ ताँहा सेइ कल्पवृक्षेर करये सेवन। सुखे प्रेमफल-रस करे आस्वादन ॥ 163 ॥ अनुवाद—वहाँ भक्त कल्पवृक्षकी अर्थात् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवा करता है और आनन्दपूर्वक प्रेमफल-रसका आस्वादन करता है ॥ 163 ॥ अनुभाष्य—'ताँहा'—अप्राकृत गोलोक-वृन्दावनमें; 'सेइ कल्पवृक्षेर'—श्रीकृष्णचरण-कल्पवृक्षका; 'आस्वादन'—भक्त अप्राकृत रूपसे सेवा करके अप्राकृत सेवा-सुख प्राप्त करता है ॥ 163 ॥ श्रीकृष्णप्रेम ही चार-पुरुषार्थोंका धिक्कारी परमार्थ :- एइत परम-फल 'परम-पुरुषार्थ'। याँर आगे तृण-तुल्य चारि पुरुषार्थ ॥ 164 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवा ही परम फल 'परम-पुरुषार्थ' है जिसके आगे धर्म-अर्थ-काम- मोक्ष, ये चारों पुरुषार्थ तिनकेके समान हैं ॥ 164 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—समस्त जीव अपने-अपने कर्मोंके अनुसार अनेक योनियोंमें ब्रह्माण्डमें भ्रमण कर रहे हैं। उनमेंसे जिनका भक्ति उत्पन्न होनेके उपयोगी सुकृतिरूपी भाग्य उदय होता है, वे गुरु-कृष्णकी कृपासे भक्तिलताका बीज जो 'श्रद्धा' है, उसे प्राप्त करते हैं। उस बीजको प्राप्त करने मात्रसे वह माली बनकर अपने हृदयक्षेत्रमें उसे रोपण करता है। माली बीज रोपित होकर अङ्कुरित होते-होते भगवद्-कथा और भक्तकथाके श्रवण-कीर्तनरूप जलसे उस क्षेत्रको सींचता है। भक्तिलता उत्पन्न होकर बढ़ते-बढ़ते इस मायिक ब्रह्माण्डको पार करके विरजा और ज्योतिर्मय ब्रह्मलोकको पार करके परव्योममें स्थान प्राप्त करती है। उस परव्योममें लता वृद्धिको प्राप्त करके उससे ऊपर गोलोक-वृन्दावन तक जाकर श्रीकृष्णचरणरूप कल्प- वृक्षपर आरोहण करती है। श्रीकृष्णचरणोंपर आरूढ़ भक्ति-लतापर ही 'प्रेमफल' फलित होता है। यहाँ तक माली श्रवण-कीर्तन-जलसे उस लताको सींचता रहता है। इस प्रक्रियाके समय जल सींचनेके अतिरिक्त अन्य एक प्रक्रिया है,—कुछ दिन जल सिञ्चन करते-करते लता जब वर्धित होती रहती है, तब अन्य जन्तु आकर उस लताको तहस-नहस कर डालता है, जिससे यह लता सूख जाती है। इस प्रक्रियामें वैष्णव-अपराध ही वह दुष्ट जन्तु है। वही वैष्णव- अपराध ही मत्त हाथीके समान यह सब क्षति पहुँचाता है। उस समय माली बाड़ बनाकर अथवा आवरण लगाकर विशेष यत्न करता है, जिससे अपराधरूपी हाथी प्रकट ही नहीं हो। वैष्णव-अपराध अथवा नाम-अपराध—दस प्रकारके हैं (आदिलीला 8/24 संख्या देखें)। इस समय और एक उत्पात होता है,—जिस समय भक्तिलता बढ़ती है, उस समय यदि उपशाखाएँ अधिक वर्धित होती हैं, तो उससे दोष उत्पन्न होता है। उपशाखाएँ—जैसे भोगकी इच्छा, मुक्तिकी इच्छा, निषिद्धाचार, कुटीनाटी, जीव-हिंसाकी प्रवृत्ति, लाभकी इच्छा, अपने सांसारिक सम्मान अथवा प्रतिष्ठाकी आशा। विशेष सावधानी नहीं करनेसे श्रवण-कीर्तनादि सिंचाईके जलको प्राप्त करके मूल-लताके प्रतिकूलमें उपशाखाएँ ही अत्यन्त बढ़ने लगती हैं, जिससे मूलशाखा स्तब्ध होकर बढ़ नहीं पाती। इसलिये मालीको इन उपशाखारूप अनर्थोंको श्रवण-कीर्तनरूप जलकी सिंचाईके समय पहलेसे ही उखाड़ देना चाहिये; तभी, मूलशाखा वर्द्धित होकर वृन्दावनमें जाती है। यही प्रेम ही जीवका परम-पुरुषार्थ है; धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ इसके सामने तिनकेके समान हैं ॥ 151-164 ॥ अनुभाष्य—'तृणतुल्य'—अति तुच्छ, तुलनामें मूल्यहीन; प्रेमके समक्ष धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि कर्मी, ज्ञानी, । 199