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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

उन्नीसवाँ अध्याय 19/150-152 ] अनुभाष्य- मुक्तानां (अज्ञानबन्ध-रहितानां) सिद्धानां (योग-सिद्धानां) कोटिषु अपि मध्ये प्रशान्तात्मा (निष्काममनाः) नारायणपरायणः सुदुर्लभः। [तन्त्रवाक्य-'ज्ञानतः सुलभः मुक्तिर्भुक्तिर्यज्ञादि-पुण्यतः। सेयं साधनसाहस्रैर्हरिभक्तिः सुदुर्लभा ॥ "] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [तन्त्र-वाक्य-“ज्ञान-साधनसे 'मुक्ति' और यज्ञादि-पुण्यसे 'भोग' सुलभ हैं, किन्तु हजारों-हजारों साधनोंके द्वारा भी वह हरिभक्ति अतिशय दुर्लभ है।”] ॥ 150 ॥ लताके साथ भक्तिकी उपमा; भक्तिका दूसरा नाम 'श्रीकृष्णानुराग'; बद्धजीवके लिये उस श्रीकृष्णप्रीति-सेवाकी प्राप्तिके क्रमके वर्णनके मूलमें भक्तिप्रदान करनेवाली श्रीकृष्णकृपारूपा सुकृति है, उसके फलस्वरूप सद्गुरुकी प्राप्ति, उनकी कृपासे श्रवणके फलसे सम्बन्धकी उपलब्धि और श्रद्धाका उदय :- ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव। गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्तिलता-बीज ॥ 151 ॥ अनुवाद-ब्रह्माण्डमें भ्रमण करते-करते कोई भाग्यवान् जीव ही गुरु और श्रीकृष्णकी कृपासे भक्तिलताके बीजको प्राप्त करता है ॥ 151 ॥ अनुभाष्य-'ब्रह्माण्ड'का अर्थ चौदह भुवन है (आदिलीला, 5/98 संख्या देखें)। 'भाग्यवान्'-सुकृतिसम्पन्न जीव; अनजानेमें विष्णु- वैष्णवकी सेवा होनेसे जीवकी 'सुकृति' उदित होती है,-(श्रीनारदका जन्म-उपाख्यान-भागवत 1/5/23-30 देखें)। यह भक्ति उन्मुखी सुकृति-जीवात्माकी चिद्- वृत्तिका ही अस्फुट विकास है, यह जड़ीय कर्म नहीं है। सुकृतिके फलस्वरूप श्रद्धा और श्रवणसे सम्बन्धज्ञान प्राप्त होनेपर ही वास्तविक शुद्धभक्ति आरम्भ होती है। 'गुरुप्रसाद'-गुरु कृपा करके शिष्यको श्रीकृष्णभक्ति रूप सर्वोत्तम अनुग्रह दान करते हैं। सुकृतिवान् अनुग्रहयोग्य व्यक्तिके परम कल्याणके उद्देश्यसे श्रीभगवान् अपने प्रियतम किसी एक व्यक्तिमें शक्ति अर्पित करके जगत्में अपनी कृपाशक्तिके वितरणके लिये महान्त-गुरुके रूपमें भेजते हैं। श्रीगुरुदेव शिष्यको श्रीकृष्णसेवारूपी अपनी कृपा प्रदान करते हैं। 'कृष्णप्रसाद'-भक्तिलताके बीजको प्रदान करनेवाले आश्रयजातीय भगवद्-स्वरूप गुरुदेवको शिष्यके निकट भेजना ही श्रीकृष्णकी कृपा है। गुरुकी कृपासे श्रीकृष्ण कृपा प्राप्त होती है एवं श्रीकृष्णकी कृपासे गुरुकृपाकी प्राप्ति होती है। 'भक्तिलता-बीज'-जिस बीजसे भगवान्‌की सेवारूपी लतिका उत्पन्न होती है। भक्तिलताका कारण गुरुकी कृपा और श्रीकृष्णकी कृपा है। अन्याभिलाष-बीज, कर्म-बीज और ज्ञान-बीजसे वैसे-वैसे वृक्षादि उत्पन्न होते हैं। इन सब बीजोंसे भक्तिलताका बीज अलग है। गुरु-कृष्णकी प्रसन्नतासे ही भक्तिलताका बीज प्राप्त होता है। उनके अप्रसन्न होनेसे अन्याभिलाष, कर्म अथवा ज्ञान बीजकी प्राप्ति हो सकती है, किन्तु शुद्धभक्तिका बीज लुप्त हो जाता है। जिनका वास्तवमें सौभाग्य नहीं है, उनके भाग्यमें भक्तिलता-बीजकी प्राप्ति नहीं होती। श्रद्धावान् जीव ही गुरुपादपद्मका आश्रय करता है। सद्गुरुके द्वारा दिया गया अनुग्रह-मन्त्र और प्रदर्शित पथ ही 'भक्तिमार्ग' है ॥ 151 ॥ उसके साथ ही अभिधेय आरम्भ; अनर्थयुक्त अवस्थामें भी भजन :- माली हञा करे सेइ बीज आरोपण। श्रवण-कीर्त्तन-जले करये सेचन ॥ 152 ॥ अनुवाद-उस बीजको प्राप्त करके उस भाग्यवान् जीवको माली बनकर सावधानीसे उस बीजको अपने हृदयमें रोपना होगा और उसे श्रवण और कीर्तनके जलसे सींचना होगा ॥ 152 ॥ अनुभाष्य-गुरुपादपद्मसे श्रवण करके फिर उसका कीर्तन-कार्य ही जलसे सींचना है, उसके द्वारा बीज क्रमशः लतामें परिणत होता है ॥ 152 ॥ । 195

[ 19/153-156 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनर्थमुक्त अवस्थामें भी भजन; रागमयी भक्तिका आश्रय—श्रीकृष्णमाधुर्य है, ब्रह्म और श्रीनारायणका ऐश्वर्य नहीं :— उपजिया बाड़े लता 'ब्रह्माण्ड' भेदि' याय। 'विरजा', 'ब्रह्मलोक' भेदि' 'परव्योम' पाय ॥ 153 ॥ अनुवाद—जलके द्वारा सिञ्चन करनेपर बीज अङ्कुरित होता है और क्रमशः लता बढ़ते हुए 'ब्रह्माण्ड'को भेद करके 'विरजा' एवं 'ब्रह्मलोक'को भी भेदकर 'परव्योम'में पहुँच जाती है॥ 153॥ अनुभाष्य—'ब्रह्माण्ड' अर्थात् चौदह भुवनोंके भीतर भक्तिलताका आश्रयस्वरूप कोई भी वृक्ष नहीं है। ब्रह्माण्डकी किसी भी वस्तुके प्रति भक्ति प्रयोग नहीं हो सकती। ब्रह्माण्डको पार करके 'विरजा-नदी' है; वहाँ तीन गुणोंकी साम्यावस्था लक्षित होती है,—वह प्राकृत- मलको धो देनेवाली नदी है। उसे पार करके ही ज्ञानियोंका आदर्श 'ब्रह्मलोक' है। विरजामें जैसे भक्ति- लताके आश्रय करने योग्य कोई वृक्ष नहीं है, ब्रह्मलोकमें भी वैसे भक्तिलताके सेव्य वृक्षका अभाव है। आश्रय-वृक्षको प्राप्त नहीं करके श्रवण-कीर्त्तनरूपी जलसे सिञ्चित बढ़ती हुई लता ब्रह्मलोकको पार करके 'परव्योम' धामको प्राप्त करती है॥ 153॥ तबे याय तदुपरि 'गोलोक-वृन्दावन'। 'कृष्णचरण'-कल्पवृक्षे करे आरोहण ॥ 154 ॥ अनुवाद—तब लता और बढ़ती हुई उस परव्योमसे भी ऊपर गोलोक वृन्दावनमें पहुँच जाती है। वहाँपर श्रीकृष्णके चरणकमलरूपी कल्पवृक्षका आश्रय ग्रहण करती है॥ 154॥ अनुभाष्य—ब्रह्मलोक और विरजाके एक ओर मायिक ब्रह्माण्ड अवस्थित हैं, वही 'देवीधाम' है। देवीधाम अथवा इतर-व्योम—प्रकृतिके अधीनरूपमें अवस्थित है। प्रकृतिके दूसरी ओर 'वैकुण्ठ' अथवा 'परव्योम' अवस्थित है। वहाँ माया कुछ भी प्रभाव दिखानेमें समर्थ नहीं होती। ब्रह्ममय वैकुण्ठके ऊपरी भागमें गोलोक-वृन्दावन अवस्थित है। वहाँ भक्तिलता श्रीकृष्णचरणरूपी कल्पवृक्षका आश्रय करती है। परव्योममें परव्योमनाथ श्रीनारायणकी जो पूजा विहित होती है, उसमें 'शान्त', 'दास्य' और 'आधा-सख्य'-रस लक्षित होता है; परन्तु गोलोक-वृन्दावनमें श्रीकृष्णकी सेवामें 'शान्त', 'दास्य' और 'गौरव-अर्द्धसख्य'के साथ 'विश्रम्भ-सख्यका आधा', 'वात्सल्य' और 'मधुर',—ये पाँच भाव पूर्ण मात्रामें विकसित हैं; यहीं 'भक्तिलतिका' सम्पूर्णरूपमें आश्रय प्राप्त करती है॥ 154॥ श्रीकृष्णप्रेमरूपी प्रयोजनकी प्राप्ति; साधन-अवस्थामें सदैव श्रवण-कीर्तन :— ताँहा विस्तारित हञा फले प्रेम-फल। इँहा माली सेचे नित्य श्रवण-कीर्त्तनादि-जल ॥ 155 ॥ अनुवाद—वहाँ लता विकसित होकर प्रेमरूपी-फल उत्पन्न करती है। और साधक इस जगत्में रहते हुए ही माली होकर उसे नित्य श्रवण-कीर्त्तनादि जलसे सींचता है॥ 155॥ अनुभाष्य—'ताँहा'—गोलोक-वृन्दावनमें; 'प्रेम-फल'— अप्राकृत परम-लोभनीय श्रीकृष्णेन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छा-मूलक अद्भुत वस्तु है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रकी अपनी वस्तु है, वह बद्धजीवकी भोगमय प्राकृत जड़बुद्धिके गोचर नहीं होती। 'इँहा'—प्रपञ्चमें; यहाँ रहकर उस भक्तिलताके बोये गये बीजको नित्य अप्राकृत श्रीकृष्णनाम, रूप, गुण, लीलाके श्रवण-कीर्त्तनादिरूप जलसे सींचना होता है॥ 155॥ अपक्व (कच्ची) अवस्थामें वैष्णव-अपराध ही साधनपथमें सबसे प्रधान 'विघ्न' :— यदि वैष्णव-अपराध उठे हाती माता। उपाड़े वा छिण्डे, तार शुखि याय पाता ॥ 156 ॥ अनुवाद—यदि साधक वैष्णव-अपराध करे, तो वह अपराधरूपी मत्त हाथी उस भक्तिरूपी लताको जड़से 196 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/156-160 ] उखाड़कर तहस-नहस कर देता है, जिससे लताके पत्ते सूख जाते हैं॥156॥ अनुभाष्य- 'वैष्णव-अपराध'—मतवाले हाथीके समान है। 'अपराध'—दस प्रकारके नामापराध (आदिलीला 8/24 संख्या देखें)। 'हाती माता'—प्रबल भक्तिविरोधी भाव अथवा गुरुकी अवज्ञास्वरूप वैष्णव-अपराध, वही भक्तिलताका विनाश करनेवाला है॥156॥ नामापराधसे सावधान रहना ही मङ्गलका कारण :- ताते माली यत्न करि' करे आवरण। अपराध-हस्तीर यैछे ना हय उद्गम॥157॥ अनुवाद—इसलिये मालीको यत्नपूर्वक उस लताके चारों ओर बाड़ लगा देनी चाहिये, जिससे अपराधरूपी हाथी उसमें प्रवेश ही न कर सके॥157॥ अनुभाष्य-भक्तिलताके चारों ओर बाड़ लगाना आवश्यक है। श्रीकृष्ण-अभक्तके सङ्गत्याग चेष्टारूपी आवरण अथवा बाड़के नहीं रहनेसे अभक्त-सङ्गके फलस्वरूप उत्पन्न अपराधरूप मतवाले हाथीके द्वारा भक्तिलताके उखाड़ने और नष्ट होने अथवा रौंदे जानेकी सम्भावना है। ऐसा न हो, उस विषयमें साधकके लिये सावधान रहना अति आवश्यक है। श्रीरूप प्रभुने 'उपदेशामृत'में कहा है— “अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रहः। जनसङ्गश्च लौल्यञ्च षड्भिर्भक्तिर्विनश्यति॥” [अर्थात् “अधिक आहार या सञ्चय, भक्ति-प्रतिकूल चेष्टा, वृथा-आलाप, नियमाग्रह, असत्सङ्ग एवं लौल्य अर्थात् बुरे मतोंको ग्रहण करनेके लिये चित्तकी चञ्चलता—इन छः प्रकारके दोषोंसे भक्ति विनष्ट हो जाती है।"]॥157॥ अमृतानुकणिका—श्रीमद्भागवत (7/1/1) की टीकामें श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर लिखते हैं,–“महत् पुरुषके प्रति अपराधरूप हाथीके हाथसे महत्-कृपासे प्राप्त भक्तिलताको श्रीशिक्षाष्टकके तृतीय श्लोकमें वर्णित चार गुणों, यथा—'स्वयंको तृणसे भी अधिक दीन समझना, वृक्षसे अधिक सहनशील होना, अमानी होकर सबको यथायोग्य सम्मान देना' रूपी शिलाके आवरणके द्वारा संरक्षण करते हुए श्रवणादि जल-सिञ्चनसे पालन करना चाहिये॥” 157॥ भक्तिकी भाँति आकृति अथवा देखनेमें समानता होनेपर भी जो भक्ति नहीं, ऐसी अभक्तिका समूह :- किन्तु यदि लतार सङ्गे उठे 'उपशाखा'। भुक्ति-मुक्ति-वाञ्छा, यत असंख्य तार लेखा॥ 158॥ 'निषिद्धाचार', 'कुटीनाटी', 'जीवहिंसन'। 'लाभ', 'पूजा', 'प्रतिष्ठादि' यत उपशाखागण॥ 159॥ अभक्तिको आश्रय देनेपर उसकी वृद्धिके कारण भक्तिपर शिथिलताके आवरणकी सम्भावना :- सेकजल पाञा उपशाखा बाड़ि' याय। स्तब्ध हञा मूलशाखा बाड़िते ना पाय॥ 160॥ अनुवाद—किन्तु भक्तिलताके साथ भुक्ति-मुक्ति- सिद्धि आदि अनेक 'उपशाखाएँ' भी उपजती हैं और ये उपशाखाएँ असंख्य हैं। 'निषिद्धाचार', 'कुटीनाटी', 'जीवहिंसा', 'लाभ', 'पूजा', 'प्रतिष्ठा' आदि अनेक उपशाखाएँ हैं। यदि अपराधोंका वर्जन न किया जाय तो श्रवण-कीर्तनरूपी जलको पाकर उपशाखाएँ बढ़ जाती हैं और मूलशाखा अर्थात् भक्तिलता स्तब्ध होकर बढ़ नहीं पाती॥ 158-160॥ अनुभाष्य- 'उपशाखा'—वास्तविक लताकी अपनी शाखाके अतिरिक्त उसके जैसी समान आकृतिवाली अन्य लताकी शाखा इस वास्तविक लतासे लिपटकर उसीके ही 'अङ्ग'के जैसी प्रतीत होती है, परन्तु वह वास्तविक लता नहीं होती। 'भुक्ति'—कर्मफल भोगवादीकी प्राप्य वस्तु है; 'मुक्ति'—ज्ञानवादीकी प्राप्य वस्तु है; 'वाञ्छा'—सिद्धिवादीको प्राप्त होनेवाले योगफलकी विभूतियाँ आदि हैं। 'निषिद्धाचार'—जो सिद्ध पुरुषोंका आचरण नहीं है । 197

[ 19/158-162 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अथवा सिद्धि प्राप्तिमें बाधा है अर्थात् जिस आचरणके द्वारा भक्ति लुप्त हो जाती है। जैसे भोक्ताका अभिमान करके भोगमयी बुद्धिसे जीवका स्त्री-सङ्ग अथवा श्रीकृष्ण-अभक्तका सङ्ग अथवा विषयी-व्यक्तिका दर्शन और स्त्रीदर्शन। 'कुटीनाटी'—कुटिलतापूर्ण नाटक, कपटता; कु-टी एवं ना-टी—आत्म-प्रसादका विरोध अथवा असन्तोष है। 'जीवहिंसा'—श्रीकृष्णभक्तिमूलक नित्यकल्याण-वाणीके कीर्तनमें अथवा प्रचारमें सङ्कोच; अथवा कंजूसी अर्थात् मायावादी, कर्मी और अन्याभिलाषीको आश्रय देना; प्राणियोंको मारना अथवा प्राणीमात्रको ही उद्वेग अथवा क्लेश देना—ये सब जीवहिंसा है। 'लाभ'—जड़ेन्द्रियोंकी तृप्तिके उद्देश्यसे जगत्में धन आदिकी प्राप्ति अथवा उसे संग्रह करनेकी अभिलाषा। 'पूजा'—सांसारिक लोगोंके मनोधर्मको बढ़ावा देकर सम्मान प्राप्त करना। 'प्रतिष्ठा'—संसारमें महत्वपूर्ण व्यक्ति बननेकी लालसा अथवा लोगोंसे अपने नश्वर यशको पानेकी प्रबल इच्छा। श्रवण-कीर्तनादि जलकी सिंचाईके प्रभावसे उपशाखा पुष्ट होकर वर्धित होती है, उससे मूल भक्तिलता बढ़ नहीं पानेके कारण स्तब्ध हो जाती है। निरपराध श्रवण और कीर्तन अर्थात् दुःसङ्गका परित्याग नहीं करके अपराधके साथ अनुष्ठान करते-करते जीव विषयभोग परायण, अथवा मोक्षकामी, अथवा सिद्धिकामी हो जाता है। अथवा वह लोभी या कपटी या अवैध-स्त्रीलम्पट हो जायेगा। अथवा वह छल-भक्तिवाला अथवा प्राकृत-सहजियावादी होगा। अथवा वह उच्चकुलमें जन्मके अभिमानसे अपनेको बड़ा भक्त माननेवाला या राजा परीक्षितके द्वारा प्रदान किये गये कलिके पाँच स्थानोंका [द्यूत (जुआ), मद्यपान, (अवैध) स्त्री-सङ्ग, हिंसा और स्वर्ण (धन)] अधिवासी या वैष्णवोंमें जातिबुद्धि रखनेवाला हो जायेगा। अथवा वह नाम-मन्त्र-विग्रह-भागवतका व्यापारी या अवैध-वृत्तिके द्वारा धन आदिको संग्रह करनेमें तत्पर होगा। या स्वयंको 'निर्जन-भजनानन्दी' कहलाकर प्रतिष्ठाकी आकाङ्क्षा रखनेवाला, चिद् और जड़के समन्वयवादके पोषणके द्वारा यशको प्राप्त करनेका इच्छुक होगा। अथवा अयोग्य गुरुका दास बनकर विष्णु-वैष्णव-विरोधी अद्वैव-वर्णाश्रमके अधीन और उसका पोषक बनेगा और उपरोक्त एक अथवा अनेक वृत्तियोंके द्वारा उसके बहुत प्रकारके परिचय होंगे। अर्थात् वह अपनी इन्द्रियोंके सुखभोगमें प्रमत्त होकर शुद्धभक्तिके अतिरिक्त अन्य नश्वर वस्तुओंको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे अबोध लोगोंको ठगकर जगत्में 'धार्मिक' अथवा 'साधु' अथवा 'महान'के रूपमें परिचय प्राप्त करनेके आकाङ्क्षी होकर वास्तविक शुद्ध हरिसेवक नहीं बन पायेगा॥ 158-160 ॥ प्रथमावस्थामें ही साधकके लिये दुःसङ्गके त्यागकी व्यवस्था करना आवश्यक :- प्रथमेइ उपशाखार करये छेदन। तबे मूलशाखा बाड़ि' याय वृन्दावन ॥ 161 ॥ अनुवाद-इसलिये प्रथम अवस्थामें ही उपशाखाओंको काट देना चाहिये, तभी मूलशाखा (भक्तिलता) बढ़ती हुई वृन्दावनमें जाती है॥161॥ अनुभाष्य-यदि पहले बतायी गयी 'उपशाखाओं'को अङ्कुरित होते देखकर उन्हें उसी समय जड़सहित उखाड़ फेंक दिया जाय, तभी मूल भक्तिलताकी शाखा वृन्दावनमें अप्राकृत प्रेमफलको जन्म देती है; अन्यथा उपशाखाकी प्रबलताके कारण लम्बे समयके लिये हरिभजनका साथ छूट जाता है अर्थात् ब्रह्माण्डमें (स्वर्गादि उच्चलोकोंमें, मर्त्यलोकमें अथवा नरकमें) क्लेशकी प्राप्ति अवश्यम्भावी है॥161॥ तभी प्रयोजनसिद्धि अथवा श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त करनेकी सम्भावना :- 'प्रेमफल' पाकि' पड़े, माली आस्वाद्य। लता अवलम्बि' माली 'कल्पवृक्ष' पाय ॥ 162 ॥ 198 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/162–164 ] अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 162 ॥ अनुभाष्य—लताका आश्रय करके भक्त-माली श्रीकृष्णचरणकमलरूप कल्पवृक्षको प्राप्त करता है। गोलोक-वृन्दावनमें प्रेमफलके पककर गिरनेपर, प्रपञ्चमें अवस्थित भक्त उसका आस्वादन कर सकता है ॥ 162 ॥ ताँहा सेइ कल्पवृक्षेर करये सेवन। सुखे प्रेमफल-रस करे आस्वादन ॥ 163 ॥ अनुवाद—वहाँ भक्त कल्पवृक्षकी अर्थात् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवा करता है और आनन्दपूर्वक प्रेमफल-रसका आस्वादन करता है ॥ 163 ॥ अनुभाष्य—'ताँहा'—अप्राकृत गोलोक-वृन्दावनमें; 'सेइ कल्पवृक्षेर'—श्रीकृष्णचरण-कल्पवृक्षका; 'आस्वादन'—भक्त अप्राकृत रूपसे सेवा करके अप्राकृत सेवा-सुख प्राप्त करता है ॥ 163 ॥ श्रीकृष्णप्रेम ही चार-पुरुषार्थोंका धिक्कारी परमार्थ :- एइत परम-फल 'परम-पुरुषार्थ'। याँर आगे तृण-तुल्य चारि पुरुषार्थ ॥ 164 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवा ही परम फल 'परम-पुरुषार्थ' है जिसके आगे धर्म-अर्थ-काम- मोक्ष, ये चारों पुरुषार्थ तिनकेके समान हैं ॥ 164 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—समस्त जीव अपने-अपने कर्मोंके अनुसार अनेक योनियोंमें ब्रह्माण्डमें भ्रमण कर रहे हैं। उनमेंसे जिनका भक्ति उत्पन्न होनेके उपयोगी सुकृतिरूपी भाग्य उदय होता है, वे गुरु-कृष्णकी कृपासे भक्तिलताका बीज जो 'श्रद्धा' है, उसे प्राप्त करते हैं। उस बीजको प्राप्त करने मात्रसे वह माली बनकर अपने हृदयक्षेत्रमें उसे रोपण करता है। माली बीज रोपित होकर अङ्कुरित होते-होते भगवद्-कथा और भक्तकथाके श्रवण-कीर्तनरूप जलसे उस क्षेत्रको सींचता है। भक्तिलता उत्पन्न होकर बढ़ते-बढ़ते इस मायिक ब्रह्माण्डको पार करके विरजा और ज्योतिर्मय ब्रह्मलोकको पार करके परव्योममें स्थान प्राप्त करती है। उस परव्योममें लता वृद्धिको प्राप्त करके उससे ऊपर गोलोक-वृन्दावन तक जाकर श्रीकृष्णचरणरूप कल्प- वृक्षपर आरोहण करती है। श्रीकृष्णचरणोंपर आरूढ़ भक्ति-लतापर ही 'प्रेमफल' फलित होता है। यहाँ तक माली श्रवण-कीर्तन-जलसे उस लताको सींचता रहता है। इस प्रक्रियाके समय जल सींचनेके अतिरिक्त अन्य एक प्रक्रिया है,—कुछ दिन जल सिञ्चन करते-करते लता जब वर्धित होती रहती है, तब अन्य जन्तु आकर उस लताको तहस-नहस कर डालता है, जिससे यह लता सूख जाती है। इस प्रक्रियामें वैष्णव-अपराध ही वह दुष्ट जन्तु है। वही वैष्णव- अपराध ही मत्त हाथीके समान यह सब क्षति पहुँचाता है। उस समय माली बाड़ बनाकर अथवा आवरण लगाकर विशेष यत्न करता है, जिससे अपराधरूपी हाथी प्रकट ही नहीं हो। वैष्णव-अपराध अथवा नाम-अपराध—दस प्रकारके हैं (आदिलीला 8/24 संख्या देखें)। इस समय और एक उत्पात होता है,—जिस समय भक्तिलता बढ़ती है, उस समय यदि उपशाखाएँ अधिक वर्धित होती हैं, तो उससे दोष उत्पन्न होता है। उपशाखाएँ—जैसे भोगकी इच्छा, मुक्तिकी इच्छा, निषिद्धाचार, कुटीनाटी, जीव-हिंसाकी प्रवृत्ति, लाभकी इच्छा, अपने सांसारिक सम्मान अथवा प्रतिष्ठाकी आशा। विशेष सावधानी नहीं करनेसे श्रवण-कीर्तनादि सिंचाईके जलको प्राप्त करके मूल-लताके प्रतिकूलमें उपशाखाएँ ही अत्यन्त बढ़ने लगती हैं, जिससे मूलशाखा स्तब्ध होकर बढ़ नहीं पाती। इसलिये मालीको इन उपशाखारूप अनर्थोंको श्रवण-कीर्तनरूप जलकी सिंचाईके समय पहलेसे ही उखाड़ देना चाहिये; तभी, मूलशाखा वर्द्धित होकर वृन्दावनमें जाती है। यही प्रेम ही जीवका परम-पुरुषार्थ है; धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ इसके सामने तिनकेके समान हैं ॥ 151-164 ॥ अनुभाष्य—'तृणतुल्य'—अति तुच्छ, तुलनामें मूल्यहीन; प्रेमके समक्ष धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि कर्मी, ज्ञानी, । 199

[ 19/164-167 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला योगी आदिके द्वारा आकाङ्क्षित चार प्रकारके पुरुषार्थ— सर्वथा ही ग्रहण करनेके योग्य नहीं हैं॥ 164 ॥ ब्रह्मानन्दको धिक्कार करनेवाला श्रीकृष्णप्रेम-सेवानन्द :— ललितमाधव (5/2)में— ऋद्धा सिद्धिव्रज-विजयिता सत्यधर्मा समाधि- र्ब्रह्मानन्दो गुरुरपि चमत्कारयत्येव तावत्। यावत् प्रेम्णां मधुरिपु-वशीकार-सिद्धौषधीनां गन्धोऽप्यन्तःकरणसरणी-पान्थतां न प्रयाति ॥ 165 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 165 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब तक श्रीकृष्णको वशीभूत करनेवाले सिद्ध औषधिरूप दास्यादि प्रेमका लेशमात्र अन्तःकरण पथका पथिक नहीं बनता, तब तक ही समृद्धिशालिनी सिद्धिसमूहके विजेता, सत्यादि धर्मसमूह, समाधि और उत्कृष्ट ब्रह्मानन्द अपनी-अपनी चकाचौंधसे जीवको चमत्कृत करते हैं॥ 165 ॥ अनुभाष्य— यावत् मधुरिपुवशीकारसिद्धौषधीनां (मधुरिपोः कृष्णस्य वशीकारे बाध्यकरणविषये सिद्धौषधिरूपाणां) प्रेम्णां (शान्तानां) गन्धलेशोऽपि (लवमात्रमपि) अन्तःकरणसरणीपान्थताम् (अन्तःकरण-मार्गपथिकतां) न प्रयाति (गच्छति), ऋद्धा (सम्पन्ना) सिद्धिव्रजविजयिता (सिद्धीनां विभूतीनां व्रजः समूहः तेषां विजयिता विजयित्वं, विजेतृभावः इत्यर्थः), सत्यधर्मा (सत्यशौचदान-तपोधर्मा), समाधिः (चित्तैकाग्रयं), ब्रह्मानन्दः (सर्वोत्कृष्टं ब्रह्मसुखं) च गुरुः (श्लाघ्यः महान्) अपि तावत् (तत्कालपर्यन्तम्) एव चमत्कारयति (चमत्कारं विदधाति—कृष्णसेवा-सुखे प्राप्ते सति विषयसुखं कैवल्यं ब्रह्मसुखञ्च तुच्छी भवतीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 165 ॥ शुद्धभक्तिके लक्षण—(1) साधनभक्ति :— 'शुद्धभक्ति' हैते हय 'प्रेम' उत्पन्न। अतएव शुद्धभक्तिर कहिये 'लक्षण' ॥ 166 ॥ अनुवाद—'शुद्धभक्ति'के अनुशीलनसे प्रेम उत्पन्न होता है, इसलिये मैं शुद्धभक्तिके 'लक्षण' बतला रहा हूँ॥ 166 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्तिके आभाससे प्रेमकी उत्पत्ति नहीं होती; शुद्धभक्तिसे ही प्रेमकी उत्पत्ति होती है॥ 166 ॥ अनुभाष्य—'शुद्धभक्ति'—त्रिगुणातीत कर्मज्ञानके मिश्रणसे अतिरिक्त अहैतुकी निर्गुणा उत्तमा भक्ति॥ 166 ॥ सम्पूर्ण भागवतकी सार बात :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/11)— अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥ 167 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 167 ॥ अनुभाष्य—अमृतप्रवाह भाष्यमें यह श्लोक उद्धृत नहीं हुआ। इसका अनुवाद— श्रीकृष्णसेवाके विरोधी अवैध स्त्री-सङ्गादि दुर्नीतिमूलक समस्त अभिलाषाओंसे रहित और मुक्ति एवं भुक्तिकी कामनाके द्वारा व्यवधान रहित, श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंकी प्रीतिके अनुकूल-चेष्टामय जो श्रीकृष्णके लिये अर्थात् श्रीकृष्णसम्बन्धी अथवा श्रीकृष्ण-विषयक अनुक्षण भजन है, वही 'उत्तमा भक्ति' है। [प्रागस्य तटस्थ-लक्षणमाह—] अन्याभिलाषिताशून्यं (अन्याभिलाषिता कृष्णभजन-सम्पादन-विरोधि-योषित्सङ्गादिरूपा दुर्नीतिमूला वाञ्छा, तया शून्यं विहीनं), ज्ञानकर्माद्यनावृतं (ज्ञानमत्र—निर्भेद-ब्रह्मानुसन्धानं, न तु भजनीयत्वानुसन्धानमपि, तस्यावश्यापेक्षणीयत्वात्, कर्म च—स्मृत्याद्युक्तं नित्यनैमित्तिकादि, न तु भजनीय-परिचर्यादि, तस्य तदनुशीलनरूपत्वात्; आदि शब्देन वैराग्य-योग-सांख्याभ्यासादयः, तैः अनावृतम् अव्यवहितम् अप्रतिहतं); [ततः स्वरूपलक्षणमाह—] आनुकूल्येन (आनुकूल्यमत्र भजनोद्देश्याया श्रीकृष्णाय रोचमाना प्रवृत्तिः, प्रातिकूल्यं तु तद्विपरीतं ज्ञेयं तस्य भजनविरोधात्, तेनेति—विशेषणे तृतीया, न तु उपलक्षणेऽतः आनुकूल्यस्यापि भक्तित्वविधानं ज्ञेयं) कृष्णानुशीलनं (कृष्णशब्दश्चात्र स्वयं भगवतः श्रीकृष्णस्य, तद्रूपाणां चान्येषामपि श्रीविष्णुतत्त्वानां ग्राहकश्चेति बोध्यः तस्य, कृष्णस्य सम्बन्धि, कृष्णार्थं वा अनुशीलनं कायवाङ्मानसीय- तच्चेष्टा-रूपं प्रीतिविषयात्मकं शैथिल्य-परित्यागपूर्वकं मुहुरेव तत्तत्-कर्म-प्रवर्त्तनं) एव उत्तमा भक्तिः [अनेन वैध-रागानुगमार्गयोः साधक-सिद्धदशयोरुभयत्राप्यस्याः सुष्ठु वैशिष्ट्यं स्फुटं कथितम्]। 200 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/167-169 ]

श्लोक-भावानुवाद-[पहले तटस्थ लक्षण कह रहे हैं-] अन्याभिलाषाओंसे शून्य (कृष्णभजन-सम्पादनकी विरोधी स्त्रीसङ्गादिरूपा दुर्नीतिमूलक वाञ्छासे विहीन), ज्ञान-कर्मादिके द्वारा व्यवधानरहित (यहाँ 'ज्ञान'का तात्पर्य निर्भेद-ब्रह्मानुसन्धानसे है, भजनीय श्रीकृष्णसे नहीं, क्योंकि श्रीकृष्ण-विषयक ज्ञान अवश्य ही अपेक्षणीय है; 'कर्मों'का तात्पर्य स्मृति-शास्त्रोंमें वर्णित नित्य-नैमित्तिकादि कर्मोंसे है, भजनीयकी सेवादिसे नहीं, क्योंकि उसका अनुशीलन कर्त्तव्य है; 'आदि'-शब्दसे वैराग्य-योग-सांख्यके अभ्यासादिको समझना चाहिये); [बादमें उसके स्वरूपलक्षणको कह रहे हैं-] अनुकूल भावसे (अर्थात् भजनके उद्देश्यसे श्रीकृष्णके लिये रोचमाना प्रवृत्तिः, प्रतिकूल भावसे रोचमाना प्रवृत्तिको भजनका विरोधी जानना चाहिये; आनुकूल्येन तृतीया विभक्ति के द्वारा विशेषणरूपमें प्रयोग किया गया है, न कि उपलक्षण रूपसे; अनुकूल भाव ही भक्तिका विधान करता है, ऐसा समझना चाहिये) कृष्णानुशीलन (कृष्ण-शब्दसे यहाँ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और उनके अन्य रूपों अर्थात् श्रीविष्णुतत्त्वको समझना चाहिये; कृष्णसे सम्बन्धित अथवा कृष्णके लिये अनुशीलन अर्थात् शैथिल्य त्यागकर कायिक-वाचिक-मानसिक चेष्टारूप प्रीतिविषयात्मक पुनः पुनः उन-उन कर्मोंमें प्रवृत्त होना) ही उत्तमा भक्ति है [इसके द्वारा वैधी और रागानुगा मार्गोंकी साधक एवं सिद्ध दशा, दोनोंका ही सुन्दररूपसे वैशिष्ट्य कहा गया है] ॥ 167 ॥

पहले दो पद-'तटस्थ' और बादके दो पद-शुद्धभक्तिके 'स्वरूप' लक्षण :- अन्य-वाञ्छा, अन्य-पूजा छाड़ि' 'ज्ञान', 'कर्म'। आनुकूल्ये सर्वेन्द्रिये कृष्णानुशीलन ॥ 168 ॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 168 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-शुद्धभक्तिका लक्षण यह है- शुद्धभक्तिमें श्रीकृष्णकी सेवाके लिये अपनी (पारमार्थिक सिद्धिके पथमें) उन्नतिकी इच्छाके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा नहीं रह सकती। श्रीकृष्णके बिना अन्य किसी सेव्य ब्रह्म-परमात्मादि-स्वरूपकी पूजा रह ही नहीं सकती एवं ज्ञान और कर्म अपने-अपने स्वरूपोंमें नहीं रह सकते। इन सबसे विमुक्त होकर जीवन-यात्रामें जो भक्तिके अनुकूल हैं, केवलमात्र वही ग्रहण करते हुए समस्त इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णानुशीलन करनेका नाम ही 'शुद्धभक्ति' है ॥ 168 ॥

अनुभाष्य- 'अन्य वाञ्छा'- श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त अन्य वासना; 'अन्यपूजा'-श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीकी पूजा; 'कर्म'-स्वरूप-विस्मृति होनेसे फल-भोगकी लालसाके उद्देश्यसे जिन सत्कर्मोंके अनुष्ठानकी व्यवस्था है; 'ज्ञान'-स्वरूप-विस्मृति होनेसे भोगरहित होने (मुक्तिके) उद्देश्यसे आत्माके उत्कर्षके लिये नित्य अभेद्या (जिन्हें कभी भी पृथक् नहीं किया जा सके, ऐसी) सन्धिनी और ह्लादिनी नामक दोनों शक्तियोंसे रहित केवल सम्वित्की चेष्टा; 'आनुकूल्ये कृष्णानुशीलन'- श्रीकृष्णकी प्रीतिके उद्देश्यसे श्रीकृष्णसेवा, श्रीकृष्णके अतिरिक्त मायाके अनुशीलनका त्याग करके अनुकूल भावसे श्रीकृष्णकी सेवा; 'सर्वेन्द्रिये'- समस्त इन्द्रियोंके द्वारा। जड़ेन्द्रियोंके द्वारा मायाका ही अनुशीलन होता है; 'जड़ेन्द्रिय' अर्थात् वाणी, हाथ, पैर, मल और मूत्र त्यागकी इन्द्रियाँ एवं नेत्र, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा तथा मन। जड़ेन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णके बदले मायाकी सेवा करनेपर वह सेवा अपने भोगके लिये ही हो जाती है, इसलिये साधन-भक्तिके अन्तर्गत चौंसठ प्रकारके भक्तिके अङ्गोंकी व्यवस्था की गयी है। इसी साधनभक्तिके बलसे बद्धजीव जड़़ीय भोगोंके चङ्गुलसे निकलकर अनर्थोंसे निवृत्त होकर अप्राकृत सेवाका अधिकारी बनता है ॥ 168 ॥

शुद्धभक्तिरूप 'अभिधेय' से ही श्रीकृष्णप्रेमरूप 'प्रयोजन', -यही सात्वत पञ्चरात्र और भागवतका मत :- एइ 'शुद्धभक्ति'-इहा हैते 'प्रेमा' हय। पञ्चरात्रे, भागवते एइ लक्षण कय ॥ 169 ॥

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[ 19/168-174 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अनुवाद—यही 'शुद्धभक्ति' है, इससे ही 'प्रेम' उत्पन्न होता है। पञ्चरात्र और भागवतमें शुद्धभक्तिके यही लक्षण कहे गये हैं॥ 168-169 ॥ अनुभाष्य— 'शुद्धभक्तिके लक्षण'—पाञ्चरात्रिक और भागवत-सम्प्रदाय, दोनोंका मत एक ही अर्थका प्रतिपादक है॥ 169 ॥

समस्त पञ्चरात्रका मत :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/12)–उद्धृत श्रीनारदपञ्चरात्र वाक्य— सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते॥ 170 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 170 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—समस्त इन्द्रियोंके द्वारा हृषीकेशकी सेवाका नाम 'भक्ति' है। इस स्वरूप-लक्षणमयी सेवाके दो 'तटस्थ' लक्षण हैं—जैसे, यह शुद्धभक्ति समस्त उपाधियोंसे मुक्त होगी और केवल श्रीकृष्णपरायण होकर स्वयं निर्मला रहेगी॥ 170 ॥

अनुभाष्य— सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं (सकलभेदावरणपरिशून्यं कृष्णोतरान्या-भिलाषिता-वर्जितं) तत्परत्वेन (कृष्णसेवैक-तात्पर्येण आनुकूल्येन) निर्मलं (कर्मावरण-ज्ञान-विमोहनाद्युपाधिरूप-मल-निर्मुक्तं) हृषीकेण (सेवोन्मुखेन्द्रियद्वारा) हृषीकेशसेवनं (सर्वेन्द्रियाधिपस्य विष्णोरनुशीलनम् एव) भक्तिः उच्यते (कथ्यते)।

श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य अभिलाषाओंको त्यागकर केवल श्रीकृष्णकी ही सेवाके तात्पर्यसे अनुकूल भावसे कर्मावरण एवं ज्ञान-विमोहनादि उपाधिरूप मलसे निर्मुक्त सेवोन्मुखेन्द्रियोंके द्वारा सर्वेन्द्रियोंके अधिपति श्रीविष्णुके अनुशीलनको ही भक्ति कहते हैं॥ 170 ॥

अहैतुकी अथवा ऐकान्तिकी शुद्धभक्तिसे ही श्रीकृष्णकी प्राप्ति :— श्रीमद्भागवत (3/29/11-14)में— मद्गुण श्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ 171 ॥

लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्। अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे ॥ 172 ॥ सालोक्यसार्ष्टिसारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ 173 ॥ स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृतः। येनातिव्रज्य त्रिगुणं मद्भावायोपपद्यते ॥ 174 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 171-174 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार गङ्गाका प्रवाह समुद्रकी ओर निरन्तर बहता है, उस प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे सर्वान्तर्यामी मुझमें मनकी जो (तैलधारावत्) अविच्छिन्ना अवस्थाका उदय होता है, वही निर्गुण भक्तियोगका लक्षण है। पुरुषोत्तमस्वरूप मुझमें वह भक्ति अहैतुकी अर्थात् अकारण या स्वतःसिद्धा और अव्यवहिता अर्थात् बिना किसी व्यवधानके अथवा अन्य किसी फलकी आकाङ्क्षासे रहित है। (मेरे द्वारा) सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्ष्टि (ऐश्वर्यसम्पत्ति), सारूप्य (चतुर्भुजाकार), सामीप्य (निकटवास) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति) प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी अभिलाषा नहीं है। ऐसी भक्तिको ही 'आत्यन्तिक-भक्तियोग' कहा जाता है। उस भक्तियोगके द्वारा जीव गुणमयी मायाको पार करके मेरा विमल प्रेम प्राप्त करता है॥ 171-174 ॥

अनुभाष्य—शुद्धभक्तियोग पथकी कथा श्रवण करनेकी इच्छुक माता देवहूतिके प्रति भगवान् कपिलदेवकी उक्ति,— (श्रीमद्भागवतके श्लोक (3/29/11-13)के लिये आदिलीला 4/205-207 संख्या देखें।) स (उक्त लक्षणः) भक्तियोगाख्यः एव आत्यन्तिकः (अत्यन्ते सर्वान्ते भवः चरमकाष्ठाम् आपन्नः) उदाहृतः (कथितः) येन (आत्यन्तिक-भक्तियोगेन) [पुरुषः] त्रिगुणं (मायामयं संसारम्) अतिव्रज्य (अतिक्रम्य) मद्भावाय (मम साक्षात्काराय ब्रह्मभूतत्वाय) उपपद्यते (समर्थो भवति) ।

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उन्नीसवाँ अध्याय 19/174-178 ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 174 ॥ छल अथवा अपराध रहनेपर करोड़ों जन्मोंका साधन भी सम्पूर्ण रूपसे विफल :- भुक्ति-मुक्ति आदि-वाञ्छा यदि मने हय। साधन करिले प्रेम उत्पन्न ना हय ॥ 175 ॥ अनुवाद-जब तक भोग-मोक्षादिकी इच्छाएँ मनमें रहती हैं, तब तक साधन करनेपर भी प्रेम उत्पन्न नहीं होता ॥ 175 ॥ अनुभाष्य-हृदयमें कर्मफल भोगकी वासना अथवा संसार-बन्धनसे मुक्तिकी वासना रहनेपर ऐसे फलकी आकाङ्क्षासे युक्त व्यक्ति चौंसठ प्रकारकी साधन-भक्तिका जितना भी अनुष्ठान क्यों न करे, ऐसा तथाकथित बिद्धा-भजन कर्ममात्रमें अथवा निष्फल-ज्ञान-चेष्टामें ही परिणत होगा, इसलिये उसके भाग्यमें साधनभक्तिका फल श्रीकृष्णप्रेम नहीं होगा ॥ 175 ॥ भुक्ति और मुक्तिकी कामनारूपी पिशाची-भक्तिका लोप करनेवाली :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/22)- भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्त्तते। तावद्भक्तिसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत् ॥ 176 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 176 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भुक्ति की स्पृहा और मुक्तिकी स्पृहा, -ये दो पिशाची (राक्षसी) हैं; जब तक ये किसी व्यक्तिके हृदयमें विद्यमान रहती हैं, तब तक उसके हृदयमें भक्तिसुखका प्राकट्य नहीं हो सकता ॥ 176 ॥ अनुभाष्य- यावत् हृदि (अन्तर्मनसि) भुक्तिमुक्तिस्पृहा (भोगमोक्षवासनारूपा) पिशाची (ग्रासकारिणी राक्षसी) वर्त्तते, तावत् अत्र (अन्तःकरणे) भक्तिसुखस्य (कृष्णप्रीतिविधायक-सेवानन्दस्य) कथं (केन प्रकारेण) अभ्युदयः (प्राकट्यं) भवेत्? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 176 ॥ साधनभक्तिसे ही (2) भावभक्ति अथवा रति, रतिसे ही (3) प्रेमभक्ति :- साधनभक्ति हैते हय 'रति'र उदय। रति गाढ़ हैले तार 'प्रेम' नाम कय ॥ 177 ॥ अनुवाद-साधनभक्तिसे 'रति' उदित होती है। रतिके गाढ़ होनेपर उसीको 'प्रेम' कहते हैं ॥ 177 ॥ अनुभाष्य- 'साधनभक्ति' - (भःरःसिः पूःविः द्वितीय लहरी)- "कृतिसाध्या भवेत् साध्यभावा सा साधनाभिधा। नित्यसिद्धस्य भावस्य प्राकट्यं हृदि साध्यता॥" श्रवण-कीर्त्तनादिकी सहायक इन्द्रियोंके द्वारा साधनीय भक्तिको ही 'साधन-भक्ति' कहते हैं; नित्यसिद्ध भावका हृदयमें प्रकट होना ही 'साधन' है। श्रद्धा, साधुसङ्ग (दीक्षा और श्रवण), भजन (निरपराध विष्णु-वैष्णवसेवा), निष्ठा, रुचि और आसक्ति तक 'साधनभक्ति' है। मध्यलीला 23/11-15 संख्या देखें। 'रति' - (भःरःसिः पूःविः तृतीय लहरी) - "व्यक्तं मसृणतेवान्तर्लक्ष्यते रतिलक्षणम्। मुमुक्षुप्रभृतीनाञ्चेद्भवेदेषा रतिर्न हि ॥" हृदयमें स्थित मसृणताके (कोमलताके) प्रकाशित होनेपर उसको ही 'रतिका लक्षण' कहते हैं। मुक्तिकामी अथवा भोगकामी लोगोंमें ऐसी मसृणताके प्रकाशित होनेपर भी उसे 'रति' नहीं कहा जाता। प्रेम'-(भःरःसिः पूःविः चतुर्थ लहरी प्रथम संख्या)- "सम्यङ्मसृणित-स्वान्तो ममत्वातिशयाङ्कितः। भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते ॥" अन्तःकरणके सम्पूर्ण रूपसे मसृण (द्रवित) होनेपर अत्यधिक ममतायुक्त भावके गाढ़ता प्राप्त होनेपर पण्डितगण उसे 'प्रेम' कहते हैं ॥ 177 ॥ प्रेमभक्तिकी गाढ़ताके तारतम्यका वैचित्र्य; चरम अवस्थामें 'महाभाव'- प्रेम वृद्धिक्रमे नाम-स्नेह, मान, प्रणय। राग, अनुराग, भाव, महाभाव हय ॥ 178 ॥ । 203

[ 19/177-12 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उपमा :- यैछे बीज, इक्षु-रस, गुड़, खण्ड-सार। शर्करा, सिता-मिछरि, उत्तम-मिछरी आर ॥ 179 ॥ रतिके साथ विभावादि चार प्रकारके भावोंके मिलनसे रसका उदित होना :- एसब कृष्णभक्ति-रसे स्थायिभाव। स्थायिभावे मिले यदि विभाव, अनुभाव ॥ 180 ॥ सात्त्विक, व्यभिचारि-भावेर मिलने। कृष्णभक्ति-रस हय अमृत आस्वादने ॥ 181 ॥ अनुवाद-प्रेम वर्द्धित होनेपर स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव नाम धारण करता है। जैसे गन्नेका बीज अङ्कुरित होकर गन्ना बनता है, फिर उस गन्नेका रस निकाला जाता है। तब उसको उबालनेपर वह गुड़ बनता है, गुड़से क्रमशः खाण्ड, चीनी, सफेद मिश्री और उत्तम मिश्री बनती है। इसी प्रकार रतिसे महाभाव तक सभी श्रीकृष्णभक्ति-रसमें स्थायी-भाव कहलाते हैं। स्थायी-भावमें विभाव, अनुभाव, सात्त्विक तथा व्यभिचारी भावके मिलनेसे श्रीकृष्णभक्ति-रस अमृतके समान आस्वादनीय हो जाता है ॥ 178-181 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भक्तिकी तीन अवस्थाएँ हैं- साधनावस्था, भावावस्था और प्रेमावस्था। श्रवण-कीर्तनादि नौ प्रकारके अङ्ग पहले साधनभक्तिमें ही क्रियान्वित होते हैं। श्रद्धापूर्वक श्रवण-कीर्तनादि करते-करते पूर्वोक्त सभी अनर्थ जितनी मात्रामें कम होते हैं, उतनी ही श्रद्धावृत्ति क्रमशः उच्चभाव धारण करते हुए निष्ठा, रुचि, आसक्ति, भाव या रति, -इन सब नामोंसे परिचित होती है। साधनभक्तिसे ही रतिका उदय होता है; श्रवण-कीर्तनादिके अनुशीलनसे ही वह रति जितनी गाढ़ होती जाती है, उतना ही 'प्रेमादि' नाम धारण करती है। (क्रमशः) प्रेम वर्धित होते हुए स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव तक उन्नत होता है। इसका उदाहरण यह है, गन्नेका रस-मानो रतिस्थानीय बीजस्वरूप है, वह जितना गाढ़ होता है, उससे पहले गुड़, बादमें खाण्ड, चीनी, सफेद-मिश्री और उत्तम मिश्री-इन सब अवस्थाओंको प्राप्त करता है। रतिसे महाभाव तक, सब कुछ ही श्रीकृष्णभक्तिरसमें स्थायीभाव कहलाते हैं; रतिको ही सर्वत्र 'स्थायीभाव' कहा जाता है। उसी स्थायीभावमें विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी, -इन चारों भावोंके मिलनेपर ही रस उदित होता है। श्रीकृष्णभक्तिके सम्बन्धमें स्थायीभावमें इन सब सामग्रियोंके संयुक्त होनेसे 'श्रीकृष्णभक्तिरस' होता है। स्थायीभाव ही रसोद्दीपन-कार्यका मुख्य आधार है। उसके साथ विभावादि चार सामग्रियाँ संयुक्त होती हैं। इसलिये स्थायीभाव ही रसका 'मूल', विभाव ही रसका 'हेतु', अनुभाव ही रसका 'कार्य', सात्त्विकभाव भी रसका 'विशेषकार्य' एवं सभी सञ्चारी अथवा व्यभिचारी भाव रसके 'सहायक' हैं। विभावके दो भाग हैं- 'आलम्बन' और 'उद्दीपन'। आलम्बन पुनः दो प्रकारसे विभक्त है, - 'विषय' और 'आश्रय'। श्रीकृष्णभक्तिरसमें भक्त ही 'आश्रय', श्रीकृष्ण ही 'विषय' एवं श्रीकृष्णके गुण ही 'उद्दीपन' हैं। अनुभाव तेरह प्रकारके हैं, -1) नृत्य, 2) विलुण्ठन (पृथ्वीपर गिरकर लोटने लगना), 3) गान 4) जोरसे रोना, 5) शरीरको मरोड़ना, 6) हुङ्कार, 7) जम्भाई, 8) दीर्घश्वास, 9) लोकपेक्षा-त्याग (लोग क्या कहेंगे- इसकी परवाह नहीं करना), 10) लार टपकाना, 11) अट्टहास (जोरोंसे हँसना), 12) उद्घूर्णा (चक्कर आना), 13) हिचकी। एक ही समयमें समस्त अनुभाव-लक्षण उदित नहीं होते। रसका कार्य जिस प्रकार होता रहता है, उसी प्रकार कोई-कोई लक्षण समय-समयपर उदित होते हैं। सात्त्विकभाव, -आठ प्रकारके एवं सञ्चारी अथवा व्यभिचारी भाव-तैंतीस प्रकारके होते हैं। (मध्यलीला, 14/167 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें) ॥ 177-181 ॥ अनुभाष्य- 'स्नेह'-(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)- 204 |

उन्नीसवाँ अध्याय 19/178–184 ] “सान्द्रश्चित्द्रवं कुर्वन् प्रेमा ‘स्नेह’ इतीयते। क्षणिकस्यापि नेह स्याद्विश्लेषस्य सहिष्णुता ॥” “चित्तको द्रवीभूत करनेवाले भावके अत्यधिक गाढ़ होनेपर प्रेम ‘स्नेह’-संज्ञा प्राप्त करता है। उसमें एक क्षणका वियोग भी सहन नहीं होता।” ‘मान’—मध्यलीला 2/66 संख्या देखें। ‘प्रणय’—मध्यलीला 2/66 संख्या देखें। ‘राग’—(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)— “स्नेहः स रागो येन स्यात् सुखं दुःखमपि स्फुटम्। तत्सम्बन्ध-लवेऽप्यत्र प्रीतिः प्राणव्ययैरपि॥” “जिस स्नेहमें स्पष्टरूपसे दुःख ही ‘सुख’के रूपमें प्रतीत होता है, वही ‘राग’ है। इस सम्बन्धमात्रसे अपने प्राणोंको नष्ट करके भी श्रीकृष्णकी प्रीतिको उदित करानेकी प्रवृत्ति होती है।” ‘अनुराग’, ‘भाव’ और ‘महाभाव’—मध्यलीला 6/13 संख्याके अनुभाष्यमें ‘अधिरूढ़-महाभाव’का प्रसङ्ग देखें। ‘स्थायीभाव’—(भःरःसिः दःविः प्रथम लहरी)— “विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः। स्वाद्यत्वं हृदि भक्तानामानीता श्रवणादिभिः। एषा कृष्णरतिः स्थायिभावो भक्तिरसो भवेत् ॥” “कृष्णरति-स्थायीभाव-स्वरूप है; श्रवणादिके द्वारा विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी भावोंके सम्मिलनसे, भक्तोंके हृदयमें आस्वादनीय भावसे लाये जानेपर वही ‘भक्तिरस’ होता है।” ‘विभाव’—(भःरःसिः दःविः प्रथम लहरी)— “तत्र ज्ञेया विभावास्तु रत्यास्वादनहेतवः। ते द्विधालम्बना एके तथैवोद्दीपना परे॥” “रतिके आस्वादन-हेतुसमूहको ‘विभाव’ कहते हैं। विभाव-आलम्बन और उद्दीपनके भेदसे दो प्रकारका होता है।” ‘अनुभाव’—(भःरःसिः दःविः द्वितीय लहरी)— “अनुभावास्तु चित्तस्था भावानामवबोधकाः। ते बहिर्विक्रिया-प्रायाः प्रोक्ता उद्भास्वराख्यया ॥” “जो उद्भास्वरयुक्त चित्तमें स्थित भावसमूहके प्रकाशक बाहरमें विकार जैसी चेष्टा प्रदर्शित करते हैं, वे ही ‘अनुभाव’ हैं।” ‘सात्त्विक’ और ‘व्यभिचारी’—मध्यलीला 3/162 संख्या और मध्यलीला 14/167 संख्या देखें॥ 178-181 ॥ उपमा :- यैछे दधि, सिता, घृत, मरीच, कर्पूर। मिलने ‘रसाला’ हय अमृत मधुर ॥ 182 ॥ भक्तके भेदसे पाँच प्रकारकी रति और रतिके भेदसे पाँच प्रकारके भक्तिरस :- भक्तभेदे रति-भेद पञ्च परकार। शान्तरति, दास्यरति, सख्यरति आर ॥ 183 ॥ वात्सल्यरति, मधुररति,—ए पञ्च विभेद। रतिभेदे कृष्णभक्ति-रसे पञ्च भेद ॥ 184 ॥ अनुवाद—जैसे दही, मिश्री, घी, काली मिर्च तथा कर्पूरको मिलानेसे ‘रस’ अमृतकी भाँति मधुर होता है। उसी प्रकार भक्तोंके भेदसे रति भी शान्तरति, दास्यरति, सख्यरति, वात्सल्यरति और मधुररति—पाँच प्रकारकी होती है। रतिभेदसे श्रीकृष्णभक्तिरस भी पाँच प्रकारके होते हैं॥ 182-184 ॥ अनुभाष्य— ‘सिता’—मिश्री। ‘शान्तरति’—(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)— “मानसे निर्विकल्पत्वं शम इत्यभिधीयते” अर्थात् “मानसमें संशयादि रहित भावको ‘शम’ कहते हैं।” (भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)— “विहाय विषयोन्मुख्यं निजानन्द-स्थितिर्यतः। आत्मनः कथ्यते सोऽत्र स्वभावः शम इत्यसौ ॥ प्रायः शमप्रधानानां ममतागन्धवर्जिता। परमात्मतया कृष्णे जाता शान्तरतिर्मता ॥” अर्थात् “विषय वासनाको छोड़कर अपने आनन्दमें अवस्थित होनेको ‘शम’-स्वभाव कहते हैं। शम-प्रधान व्यक्तियोंकी परमात्म-ज्ञानसे श्रीकृष्णके प्रति ममता- गन्धहीन शान्तरति उत्पन्न होती है।” । 205

[ 19/182-185 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'दास्यरति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “स्वस्माद्भवन्ति ये न्यूनास्तेऽनुग्राह्या हरेर्मताः। आराध्यत्वात्मिका तेषां रतिः प्रीतिरितीरिता। तत्रासक्तिकृदन्यत्र प्रीतिसंहारिणी ह्यसौ॥” अर्थात् “श्रीभगवान्से स्वयंको छोटा माननेका अभिमान रखनेवाली रतिसे युक्त होनेपर जीव हरिके अनुग्रहका पात्र बन जाता है। ‘भगवान् ही आराध्य हैं'—ऐसी प्रीति-नामक रति ही आराध्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रमें ‘आसक्ति' उत्पन्न करती है एवं भगवान्के अतिरिक्त मायिक वस्तुओंके प्रति प्रीतिका विनाश करती है।” 'सख्यरति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “ये स्युस्तुल्या मुकुन्दस्य ते सखायः सतां मताः। साम्याद्विश्रम्भरूपैषां रतिः सख्यमिहोच्यते॥ परिहासप्रहासादिकारिणीयमयन्त्रणा।” अर्थात् “विद्वान और सज्जनोंके मतमें जो मुकुन्दके समान होनेके अभिमानसे युक्त रतिवाले हैं, वे ही ‘सखा' हैं; श्रीकृष्णके साथ परस्पर समान भाव होनेके कारण सङ्कोचरहित विश्वासमयी रतिको ‘सख्यरति' कहते हैं। यह सख्यरति-परिहास और उच्च-हास्यादि करानेवाली होती है, इसे अयन्त्रणा अर्थात् बन्धनहीना रति कहते हैं।” 'वात्सल्य-रति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “गुरुवो ये हरेरस्य ते पूज्या इति विश्रुताः। अनुग्रहमयी तेषां रतिर्वात्सल्यमुच्यते। इदं लालनभव्याशीशिचबुकस्पर्शनादिकृत्॥ अर्थात् “गुरु होनेके अभिमानसे युक्त रतिवाले जीवगण ही भगवानके ‘पूज्य' हैं; उनकी अनुग्रहमयी रतिको ‘वात्सल्य रति' कहते हैं। इस वात्सल्य-रतिमें लालन, कल्याण साधन, आशीर्वाद और ठोड़ीको स्पर्श करने आदिके अनुष्ठान हैं।” 'मधुर-रति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “मिथो हरेर्मृगाक्ष्याश्च सम्भोगस्यादि-कारणम्। मधुरापरपर्याया प्रियताख्योदिता रतिः। अस्यां कटाक्षभ्रूक्षेपप्रियवाणीस्मितादयः॥” अर्थात् “श्रीभगवान्के एवं मृगनयनियोंके परस्पर स्मरण-दर्शनादि आठ प्रकारके सम्भोगका मूल कारण- प्रियता अथवा मधुरा-रति है। मधुरा-रतिमें कटाक्ष, भ्रूक्षेप, प्रियवाक्य और मधुर-हास्यादि अनुष्ठान वर्तमान होते हैं॥”182-184॥ पाँच मुख्य भक्तिरस और सात गौणरस :- शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर-रस नाम। कृष्णभक्ति-रसमध्ये ए पञ्च प्रधान॥185॥ अनुवाद-शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-रस, श्रीकृष्णभक्ति-रसमें ये पाँच प्रकारके रस मुख्य हैं॥185॥ अनुभाष्य-‘शान्तभक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः प्रथम लहरी)- “वक्ष्यमाणैर्विभावाद्यैः शमिनां स्वाद्यतां गतः। स्थायी शान्तिरतिर्धीरैः शान्तभक्तिरसः स्मृतः। प्रायः स्वसुखजातीयं सुखं स्यादत्र योगिनाम्। किन्त्वात्मसौख्यमघनं घनं त्वीशमयं सुखम्॥ तत्रापीशस्वरूपानुभवस्यैवारुहेतुता। दासादिवन्मनोज्ञत्वलीलादेर्न तथा मता॥” अर्थात् “शान्तरतिरूपी स्थायीभाव विचाराधीन विभावादिके साथ मिलकर जब शान्तभक्तोंके द्वारा आस्वादनीय होते हैं अर्थात् तद्रूपता प्राप्त करते हैं, तब ‘शान्तभक्तिरस' होता है। शान्तरसमें योगियोंके सर्वमूल- स्वरूप निर्विशेष-ब्रह्मानन्दजातीय सुखकी प्राप्ति होती है, किन्तु यह आत्मानन्द-‘अघन' अर्थात् बहुत कम होता है; और सच्चिदानन्द भगवद्विग्रह-स्फूर्तिमें प्रचुर सेवा-सुख ही ‘गाढ़' होता है। शान्तभक्तोंका साक्षात्कारके लिये सुख अधिक तो होता है, किन्तु दास्य आदिकी भाँति भगवान्की मनोहर लीलाओंमें उनकी वैसी रुचि नहीं होती।” 'दास्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)- “आत्मोचितैर्विभावाद्यैः प्रीतिरास्वाद्यनीयताम्। नीता चेतसि भक्तानां प्रीतिभक्तिरसो मतः॥ अनुग्राह्यस्य दासत्वाल्लाल्यत्वाद्द्वयं द्विधा। भिद्यते सम्भ्रमप्रीतो गौरवप्रीत इत्यादि॥” 206 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/185-188 ] "आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तोंके चित्तमें प्रीतरति आकर आस्वादनीयताको प्राप्त करनेपर वही 'प्रीति' अथवा 'दास्य-भक्ति-रस' होता है। अनुग्रह-योग्य दासोंके दासत्व और लाल्यत्वके भेदसे दास्य रसमें सम्भ्रम-दास्य और गौरवदास्य, - दो प्रकारकी प्रीति लक्षित होती है।" 'सख्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः चतुर्थ लहरी)- "स्थायिभावो विभावाद्यैः सख्यमात्मोचितैरिह। नीतश्चित्ते सतां पुष्टिं रसप्रेयानूदीर्यते॥" "आत्मोचित विभावादिके द्वारा स्थायीभावमें भक्तोंके चित्तमें सख्यरतिके पुष्ट होनेपर 'प्रेयरस' अथवा 'सख्यभक्तिरस' होता है।" 'वात्सल्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः चतुर्थ लहरी)- "विभावाद्यैस्तु वात्सल्यं स्थायी पुष्टिमुपागतः। एष वत्सल-नामात्र प्रोक्तो भक्तिरसो बुधैः॥" "स्थायीभाव भक्तके चित्तमें विभावादिके द्वारा वात्सल्परतिके पुष्ट होनेपर भक्त-पण्डितगण उसे 'वात्सल्य-भक्तिरस' कहते हैं।" 'मधुर भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः पञ्चम लहरी)- "आत्मोचितैर्विभावाद्यैः पुष्टिं नीता सतां हृदि। मधुराख्यो भवेद्भक्तिरसोऽसौ मधुरा रतिः॥" "आत्मोचित विभावादिके द्वारा सद्‍भक्तोंके हृदयमें मधुर-रति पुष्ट होनेपर 'मधुराख्य भक्तिरस' कहकर कीर्तित होती है॥" 185॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (2/5/116) :- हास्योऽद्भुतस्तथा वीरः करुणो रौद्र इत्यपि। भयानकः स वीभत्स इति गौणश्च सप्तधा ॥ 186 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥ 186॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'मुख्यरस' शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-पाँच प्रकारके हैं। हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक और वीभत्स-ये सात प्रकारके गौण रस हैं॥ 186॥ अनुभाष्य- तथा हास्यः, अद्भुतः, वीरः, करुणः, रौद्रः, भयानकः, वीभत्सः-इति सप्तधा गौणरसश्च अपि। श्लोक-भावानुवाद-हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक और वीभत्स-ये सात प्रकारके गौण रस हैं॥ 186॥ हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, वीभत्स, भय। पञ्चविध-भक्ते गौण सप्तरस हय ॥ 187 ॥ अनुवाद-हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, वीभत्स तथा भयानक-ये सातों गौणरस पाँचों प्रकारके भक्तोंमें ही रहते हैं॥ 187॥ पाँच मुख्यरस-स्थायी; सात गौणरस- आगन्तुक :- पञ्चरस 'स्थायी', व्यापी' रहे भक्त-मने। सप्त गौण 'आगन्तुक' पाइये कारणे ॥ 188 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 188॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पहले कहे गये पाँच मुख्यरस स्थायीभावसे ही भक्तके हृदयमें रहते हैं। हास्य- अद्भुतादि गौणरस 'कारण' उपस्थित होनेपर भक्तके हृदयमें आगन्तुकके रूपमें उदित होकर मुख्यरसको पुष्ट करके निवृत्त होते हैं॥ 188॥ अनुभाष्य- 'हास्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः उःविः प्रथम लहरी)- "वक्ष्यमाणैर्विभावाद्यैः पुष्टिं हासरतिर्गता। हासभक्तिरसो नाम बुधैरेष निगद्यते॥" "विचाराधीन विभावादिके द्वारा हास्यरतिके पुष्ट होनेपर ही पण्डितगण उसे 'हास्य-भक्तिरस' कहते हैं।" 'अद्भुत-भक्तिरस'-(भःरःसिः उःविः द्वितीय लहरी)- "आत्मोचितैर्विभावाद्यैः स्वाद्यत्वं भक्तचेतसि। सा विस्मयरतिर्नीताऽद्भुतभक्तिरसो भवेत्॥" "आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें विस्मयरति' आस्वादनीयरूपमें आनेपर 'अद्भुत-भक्तिरस' होता है।" 'वीर-भक्तिरस'-(भःरःसिः उःविः तृतीय लहरी)- । 207

[ 19/187-191 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [ बायाँ स्तम्भ ] “सैवोत्साहरतिः स्थायी विभावाद्यैर्निजोचितैः। आनीयमाना स्वाद्यत्वं वीरभक्तिरसो भवेत्। युद्धदानदयाधर्मैश्चतुर्धा वीर उच्यते॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें 'उत्साह-रति'के आस्वादनीयरूपमें आनेपर 'वीरभक्तिरस' होता है। 'युद्ध', 'दान', 'दया', और 'धर्म',—इन चार प्रकारके कार्योंमें चार प्रकारके 'वीर' कहे जाते हैं।” 'करुण-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः चतुर्थ लहरी)— “आत्मोचितैर्विभावाद्यैर्नीता पुष्टिं सतां हृदि। भवेच्छोकरतिर्भक्ति-रसो हि करुणाभिधः॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें 'शोक-रति'के पुष्ट होनेपर उसे 'करुणभक्तिरस' कहते हैं।” 'रौद्र-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः पञ्चम लहरी)— “नीता क्रोधरतिः पुष्टिं विभावाद्यैर्निजोचितैः। हृदि भक्तजनस्यासौ रौद्रभक्तिरसो भवेत्॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके हृदयमें 'क्रोधरति'के पुष्ट होनेपर 'रौद्र-भक्तिरस' होता है।” 'भयानक-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः षष्ठम लहरी)— “वक्ष्यमाणैर्विभावाद्यैः पुष्टिं भयरतिर्गता। भयानकाभिधो भक्तिरसो धीरैरुदीर्यते॥” “विचाराधीन विभावादिके द्वारा 'भयरति'के पुष्ट होनेपर पण्डितगणोंके द्वारा वह 'भयानक-भक्तिरस' कहा जाता है।” 'वीभत्स-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः सप्तम लहरी)— “पुष्टिं निजविभावाद्यैर्जुगुप्सा रतिरागता। असौ भक्तिरसो धीरैर्वीभत्साख्य इतीर्यते॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें जुगुप्सा अथवा 'घृणा-रति'के पुष्ट होनेपर पण्डितगण उसे 'वीभत्स-भक्तिरस' कहते हैं।” 'पञ्चविध भक्त'—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन स्थायी पाँच प्रकारके रसोंके भक्तोंमें हास्यादि सात गौणरस 'कारण'को देखकर प्रकाशित होते हैं॥187-188॥ [ दायाँ स्तम्भ ] शान्त और दास्य-रसके भक्तोंके नाम :— शान्तभक्त—नवयोगेन्द्र, सनकादि आर। दास्यभाव-भक्त—सर्वत्र सेवक अपार॥189॥ अनुवाद—नवयोगेन्द्र और सनकादि चार कुमार शान्तभावके भक्त हैं। दास्यभावके भक्तोंके असंख्य उदाहरण हैं, वे भगवद्-सेवक तो सर्वत्र विद्यमान हैं॥189॥ अनुभाष्य—'नवयोगेन्द्र'—(भाः 5/4/11 और 11/2/21)—(1) कवि, (2) हवि, (3) अन्तरिक्ष, (4) प्रबुद्ध, (5) पिप्पलायन, (6) आविर्होत्र, (7) द्रविड़ (द्रुमिल), (8) चमस और (9) करभाजन। 'सनकादि'—(1) सनक, (2) सनन्दन, (3) सनत्कुमार, (4) सनातन। 'दास्यभाव-भक्त'—(1) गोकुलमें रहनेवाले रक्तक- चित्रक-पत्रकादि दासगण, (2) द्वारकापुरीमें रहनेवाले दारुकादि दासगण, 3) वैकुण्ठमें स्थित दासगण, 4) हनुमानादि लीला-दासगण॥189॥ सख्य और वात्सल्य-रसके भक्तोंके नाम :— सख्य-भक्त—श्रीदामादि, पुरे भीमार्जुन। वात्सल्य-भक्त—माता-पिता, यत गुरुजन॥190॥ अनुवाद—सख्यभक्तोंके उदाहरण ब्रजमें श्रीदामादि और द्वारकापुरीमें भीम तथा अर्जुनादि हैं। वात्सल्य- भक्तके उदाहरण माता-पिता [ब्रजमें यशोदा-नन्द और द्वारकामें देवकी-वसुदेव] तथा जितने [वात्सल्यभावमें आयुमें बड़े] गुरुजन हैं॥190॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'व्रजे'—ब्रजमें श्रीदामादि, 'पुरे'— द्वारका-लीलामें भीम-अर्जुन॥190॥ मधुर-रसके भक्तगण—द्वारकाकी कान्ताएँ और ब्रजकी कान्ताएँ :— मधुर-रसे भक्तमुख्य—व्रजे गोपीगण। महिषीगण, लक्ष्मीगण, असंख्य गणन॥191॥ 208 |

उन्नीसवाँ अध्याय 19/191-197 ] अनुवाद-मधुर-रसके भक्तोंमें मुख्य व्रजमें गोपियाँ, द्वारकामें महिषियाँ, वैकुण्ठमें लक्ष्मियाँ हैं। मधुर-रसमें भी असंख्य भक्त हैं॥191॥ दो प्रकारकी रति-1) ऐश्वर्यमिश्रा और 2) केवला :- पुनः कृष्णरति हय दुइत प्रकार। ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा, केवला-भेद आर॥ 192॥ गोकुलमें 'केवला' रति एवं वैकुण्ठ, मथुरा और द्वारकामें 'ऐश्वर्यप्रधान' रति :- गोकुले 'केवला' रति-ऐश्वर्यज्ञानहीन। पुरीद्वये, वैकुण्ठाद्ये-'ऐश्वर्य' प्रवीण॥ 193॥ ऐश्वर्यप्रधान रतिमें राग-सङ्कुचित, केवलामें ऐश्वर्य-ज्ञानका अभाव :- ऐश्वर्यज्ञान-प्राधान्ये सङ्कुचित प्रीति। देखिले ना माने ऐश्वर्य-केवलार रीति॥ 194॥ अनुवाद-ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा और केवलाके भेदसे पुनः श्रीकृष्णरति भी दो प्रकारकी होती है। गोकुलमें 'केवला' रति है, यह ऐश्वर्यज्ञानसे रहित होती है। मथुरापुरी और द्वारकापुरी तथा वैकुण्ठादिमें ऐश्वर्य-प्रधान रति होती है। ऐश्वर्यज्ञानकी प्रधानता होनेपर प्रीति सङ्कुचित हो जाती है। केवला-रतिकी यह रीति है कि वह ऐश्वर्यको देखनेपर भी उसे मानती नहीं है॥192-194॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णरति दो प्रकारकी है- ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा और केवला अथवा ऐश्वर्यज्ञानहीना। दोनों पुरियों अर्थात् द्वारका और मथुरामें एवं वैकुण्ठादिमें ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा भक्ति है। इसलिये वहाँ प्रेम सङ्कुचित होता है। किन्तु गोकुलमें केवला-रतिमें गोप-गोपियाँ श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको देखनेपर भी उसे मानना नहीं चाहते॥192-194॥ व्रजमें शान्त और दास्यमें कहींपर ऐश्वर्यज्ञान रहनेपर भी सख्य, वात्सल्य और मधुररसमें ऐश्वर्यज्ञानका अभाव :- शान्त-दास्य-रसे ऐश्वर्य काँहा उद्दीपन। सख्ये, वात्सल्ये, मधुर-रसे सङ्कोचन॥ 195॥ अनुवाद-व्रजमें शान्त और दास्य रसमें कहीं-कहींपर ऐश्वर्यका उद्दीपन होता है, किन्तु सख्य, वात्सल्य तथा मधुर रसमें ऐश्वर्य सम्पूर्ण रूपमें सङ्कुचित है॥195॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'काँहा'-किसी विशेष स्थान पर॥195॥ अनुभाष्य-शान्त, दास्य और गौरव-सख्यमें स्थान-स्थानपर ऐश्वर्यकी प्रधानता लक्षित होती है; विश्रम्भ-सख्यमें, वात्सल्यमें और मधुर-रसमें ऐश्वर्यकी प्रधानताका भाव सङ्कुचित होता है॥195॥ ऐश्वर्यमिश्रित रतिमें स्वयंको 'दीन' और श्रीकृष्णको प्रभु मानना- (1) वात्सल्य-रतिमें वसुदेव और देवकी :- वसुदेव-देवकीर कृष्ण चरण वन्दिल। ऐश्वर्यज्ञाने दुँहार मने भय हैल॥ 196॥ अनुवाद-जब श्रीकृष्णने वसुदेव और देवकीके चरणोंकी वन्दना की, तब श्रीकृष्णके ऐश्वर्यज्ञानके कारण दोनोंके मनमें भय उत्पन्न हो गया॥196॥ श्रीमद्भागवत (10/44/51) में :- देवकी वसुदेवश्च विज्ञाय जगदीश्वरौ। कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते न शङ्कितौ॥ 197॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 197॥ अमृतप्रवाह भाष्य-देवकी और वसुदेव, बलदेव और श्रीकृष्णको 'जगदीश्वर' जानकर शङ्कासे युक्त होकर उन्हें आलिङ्गन नहीं कर पाये॥197॥ अनुभाष्य-कंस और उसके द्वारा नियुक्त मल्लोंका वध करके श्रीकृष्णने माता देवकी और पिता वसुदेवके बन्धनको खोलकर उन्हें प्रणाम किया, देवकी और वसुदेवमें यशोदा और नन्दकी भाँति भाव नहीं होनेके कारण ऐश्वर्यभावकी प्रबलता लक्षित,- देवकी वसुदेवश्च (मातापितरौ) पुत्रौ (रामकृष्णौ) जगदीश्वरौ इति विज्ञाय (ज्ञात्वा) शङ्कितौ (भीतौ सन्तौ) कृतसंवन्दनौ (कृतप्रणामौ) अपि तौ न सस्वजाते (आलिङ्गितवन्तौ किन्तु प्रणतौ बद्धाञ्जली स्तुवन्तौ स्थितौ)। । 209

[ 19/197-201 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद-जब बलदेव और कृष्णने देवकी और वसुदेवके चरण स्पर्श करके उनकी वन्दना की, तब उन दोनों पुत्रोंको जगदीश्वर जानकर कुछ भयभीत होकर वे उनको आलिङ्गन नहीं कर पाये, अपितु हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े रहे ॥ 197 ॥ (2) सख्य-रतिमें अर्जुन :- कृष्णेर विश्वरूप देखि' अर्जुनेर हैल भय। सख्यभावे धार्थ्य क्षमापय करिया विनय ॥ 198 ॥ अनुवाद- श्रीकृष्णके विश्वरूपको देखकर अर्जुन भयभीत हो गये और अपने द्वारा पहले सख्यभावमें की गयी धृष्टताके लिये श्रीकृष्णसे दीनतापूर्वक क्षमा-याचना की ॥ 198 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता [11/41 (तीन चरण)- 42 (अन्तिम चरण)] :- सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ 199 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 199 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सखा मानकर आपकी महिमाको नहीं जाननेके कारण मैंने हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे, - इस प्रकारके शब्दोंके उपयोगके द्वारा बलपूर्वक जो-जो आपको कहा है, हे अप्रमेय-स्वरूप [अचिन्त्य-प्रभाव-स्वरूप] ! मैं आपसे उसे क्षमा करनेकी प्रार्थना करता हूँ॥ 199 ॥ अनुभाष्य- तव इदं [विराड्रूपं] महिमानं (महत्त्वम्) अजानता (अनुन्भवता) मया [प्रमादात् प्रणयेन् वा अपि] सखा इति मत्वा [त्वां प्रति] प्रसभं (हठात्) हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे, इति यत् उक्तं (कथितं) [यत् च असत्कृतः असि] अहम् अप्रमेयम् (अचिन्त्यप्रभावं) तत् (सर्ववचन-रूपम् असत्कार-रूपं अपराधजातं वा) क्षामये (क्षमां कारयामि, त्वं क्षमस्व इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 199 ॥ (3) मधुर रतिमें रुक्मिणी :- कृष्ण यदि रुक्मिणीरे कैला परिहास। 'कृष्ण छाड़िबेन'-जानि' रुक्मिणीर हैल त्रास ॥ 200 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णने जब रुक्मिणीके साथ परिहास किया, तब 'कृष्ण मुझे छोड़ देंगे'-ऐसा सोचकर रुक्मिणीके मनमें भय हो गया ॥ 200 ॥ प्रमाण वचन :- श्रीमद्भागवत (10/60/24)में- तस्याः सुदुःखभय-शोक-विनष्ट-बुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात। देहश्च विक्लवधियः सहसैव मुह्यन् रम्भेव वातविहता प्रविकीय्यं केशान् ॥ 201 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 201 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-द्वारकामें रुक्मिणीके साथ श्रीकृष्णके परिहास करनेपर दुःख, भय और शोकके कारण रुक्मिणीकी विचारशक्ति लुप्त हो गयी, वियोगकी सम्भावनासे वे इतनी दुबली हो गयीं कि उनके हाथसे कङ्कन तक खिसक गया, हाथका चँवर भी गिर पड़ा, केश बिखर गये और आँधीसे गिरे केलेके वृक्षकी भाँति उनकी देह सहसा विकल होकर मोहको प्राप्त हो गयी ॥ 201 ॥ अनुभाष्य-एक बार अपने घरमें रुक्मिणीने अपने हाथोंसे श्रीकृष्णकी सेवा आरम्भ की। तब श्रीकृष्णने उनके अनुरागकी परीक्षा करनेकी इच्छासे परिहास करते हुए स्वयंको दीन, निष्किञ्चन और उदासीन कहकर रुक्मिणीके प्रणयके सम्पूर्ण अयोग्य-पात्रके रूपमें वर्णन करके उन्हें उनका सङ्ग छोड़कर अन्यत्र प्रणय स्थापित करनेके लिये कहा। इसे सुनकर कृष्णैकप्राणा रुक्मिणीकी तात्कालिक अवस्थाका वर्णन,- सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धेः (सुदुःखम् अत्यन्तदुःखम् अप्रिय- श्रवणात्, भयं त्यागशङ्कया, शोकः अनुतापः तैः विनष्टा बुद्धिः यस्याः रुक्मिण्याः तस्याः) श्लथद्वलयतः (श्लथन्ति पतन्ति 210

उन्नीसवाँ अध्याय 19/201-204 ]

वलयानि यस्मात् तस्मात्) हस्तात् व्यजनं (वीजनयन्त्रं) पपात। विक्लवधियः (विक्ल्वा अवशा धीः यस्याः तस्याः) देहः च सहसा एव मुह्यन् केशान् प्रविकीर्य (इतस्ततः विक्षिप्य) वातविहता (वायुताड़िता) रम्भा (कदलीवृक्षः) इव पपात। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 201 ॥ ब्रजमें ऐश्वर्यहीन केवला-रतिसे श्रीकृष्णको अपने वशयोग्य समझना :- ‘केवला’र शुद्धप्रेम ‘ऐश्वर्य’ ना जाने। ऐश्वर्य देखिले निजसम्बन्ध ना माने॥ 202 ॥ अनुवाद-‘केवला’ रतिवालोंका शुद्धप्रेम श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको नहीं मानता। श्रीकृष्णका ऐश्वर्य देखनेपर भी केवला-रति भक्त उस ऐश्वर्यसे अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानते हैं॥ 202 ॥ अनुभाष्य-ऐश्वर्य-प्रधान भक्त केवला-रतिके शुद्ध प्रेमके माहात्म्यको नहीं समझ सकते। भगवान्‌के ऐश्वर्यको देखनेपर भी केवला-रतिपरायण भक्त उससे अपना सम्बन्ध स्वीकार नहीं करते हैं॥ 202 ॥ (1) स्वयं भगवान् श्रीकृष्णको यशोदाके द्वारा अपना पुत्र समझना :- श्रीमद्भागवत (10/8/45)में- त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च सात्वतैः। उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम्॥ 203 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 203 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-तीनों वेदों, उपनिषद्-समूह, सांख्ययोग और भक्तिशास्त्रोंके द्वारा जिनके माहात्म्यका गान किया जाता है, उन श्रीकृष्णको यशोदा अपना ‘पुत्र’ समझती हैं॥ 203 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णके मुखमें ऐश्वर्यमय विश्वरूपको देखकर यशोदामें तत्त्वज्ञानके कारण सम्भ्रम-बुद्धि आते ही पुनः श्रीकृष्णकी इच्छासे उनके सहज ममता-प्रबल हृदयमें श्रीकृष्णस्नेह गाढ़ होकर वर्धित हो गया- त्रया (कर्मोपासनामयैः ऋग्यजुःसाम-वेदैः) [इन्द्रादिरूपेण इति], उपनिषद्भिः (वेदोत्तर-ज्ञानकाण्डात्मक-श्रुतिभिः) ['ब्रह्म' इति], सांख्यैः ['पुरुषः' इति], योगैः ['परमात्मा' इति], सात्वतैः (पञ्चरात्रागमैः) ['भगवान्' इति] उपगीयमान-माहात्म्यम् (उपगीयमानम् ईड्यमानं माहात्म्यं यस्य तं) हरिं सा (केवलरतिविशिष्टा यशोदा) आत्मजं (तनयम्) अमन्यत। श्लोक-भावानुवाद-इन्द्रादि देवताओंकी उपासना- प्रधान कर्मकाण्ड उपासनामय ऋक्-यजु-साम-तीनों वेद (यज्ञपुरुषरूपमें), ब्रह्म-विषयक वेदोंसे श्रेष्ठ ज्ञानकाण्डात्मक श्रुतियाँ (ब्रह्मरूपमें), सांख्य (पुरुषरूपमें), योग (परमात्मारूपमें), सात्वत अर्थात् नारद-पञ्चरात्रादि भक्तियोगशास्त्र (भगवान्रूपमें) जिनकी महिमाका गान करते हैं, उन परमपुरुष श्रीहरिको केवलारतियुक्त यशोदाने अपना पुत्र ही माना॥ 203 ॥ श्रीमद्भागवत (10/9/14)में :- तं मत्वात्मजमव्यक्तं मर्त्यलिङ्गमधोक्षजम्। गोपीकोलूलूखले दाम्ना बबन्ध प्राकृतं यथा॥ 204 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 204 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-साधारण मरणशील मनुष्यकी भाँति व्यक्त, उस अव्यक्त और इन्द्रियोंसे अतीत अधोक्षज-वस्तुको (भगवान्‌को) यशोदाने अपना गर्भजात पुत्र मानकर साधारण बालककी भाँति रस्सीके द्वारा ओखलीसे बाँध दिया॥ 204 ॥ अनुभाष्य-माताके स्नेहका दर्शन करानेके लिये लीलामय श्रीकृष्णने यशोदा-भवनमें ही दहीकी मटकीको फोड़कर चोरी करके माखन खाना आरम्भ किया, जिसे देखकर क्रोधित यशोदाके व्यवहारका वर्णन- अव्यक्तं (जड़ेन्द्रियाद्यविषयम्) अधोक्षजम् (अधःकृतम् अक्षजम् इन्द्रियज-ज्ञानं येन तं स्वयं भगवन्तं) मर्त्यलिङ्गं (जीवानुकम्पया स्वीकृत-नरतनुम्) आत्मजं (पुत्रं) मत्वा गोपिका (यशोदा) प्राकृतं बालकं [माता] यथा, (तथा) दाम्ना (रज्जुना) उलुखले (उदूखले) बबन्ध (बन्धनार्थं यत्नवती आसीत्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान जिन तक पहुँच नहीं सकता, उन्हें

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[ 19/204-209 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अधोक्षज कहते हैं। उन्होंने जीवोंपर कृपा करनेके लिये ही नरदेहको स्वीकार किया ॥ 204 ॥ (2) स्वयं भगवान् श्रीकृष्णको श्रीदामादिके द्वारा सखा-मानना :- श्रीमद्भागवत (10/18/24)में- उवाह भगवान् कृष्णः श्रीदामानं पराजितः। वृषभं भद्रसेनश्च प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ॥ 205 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 205 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान् श्रीकृष्णने पराजित होकर श्रीदामको कन्धेपर चढ़ाया; भद्रसेनने वृषभको उठाया तथा प्रलम्बने रोहिणीपुत्र श्रीबलदेवको उठाया ॥ 205 ॥ अनुभाष्य-ब्रजवनमें गोचारणके समय श्रीराम-कृष्णको चुरानेके लिये कपट-वेशी गोपरूपी प्रलम्बासुरको आते देखकर श्रीकृष्ण उसे मोहित करके गोचारण करते-करते श्रीकृष्णपक्षीय और श्रीरामपक्षीय सखाओंको परस्पर स्पर्द्धा क्रीड़ामें मत्त कराके भाण्डीरवनमें पहुँचे। तब श्रीकृष्णपक्षीय सखाओंकी हारके कारण अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार उनकी श्रीरामपक्षीय सखाओंको उठाकर ले जानेकी चेष्टाका वर्णन, - भगवान् कृष्णः पराजितः (सन्) श्रीदामानं, भद्रसेनः वृषभं, प्रलम्बः (गोपबालकवेषी कपटी असुरः) रोहिणीसुतं (भावि-तन्मृत्यूरुपं बलदेवम्) उवाह। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। प्रलम्बने अपने भावी-मृत्यूरुप श्रीबलदेवको उठाया ॥ 205 ॥ (3) श्रीराधाके द्वारा स्वयं भगवान् श्रीकृष्णको अपने वशीभूत कान्त समझना :- श्रीमद्भागवत (10/30/37-39)में- सा च मेने तदात्मानं वरिष्ठां सर्वयोषिताम्। हित्वा गोपीः कामयाना मामसौ भजते प्रियः॥ 206 ॥ ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता केशवमब्रवीत्। न पारयेऽहं चलितुं नय मां यत्र ते मनः ॥ 207 ॥ एवमुक्तः प्रियामाह स्कन्धमारुह्यतामिति। ततश्चान्तर्दधे कृष्णः सा वधूरन्वतप्यत ॥ 208 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 206-208 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- "काम ही जिन गोपियोंका वनमें आनेका कारण है, उन गोपियोंका परित्याग करके ये प्रिय कृष्ण मेरा भजन कर रहे हैं" - ऐसे अहङ्कारके कारण श्रीराधिकाने (स्वयंको सभी गोपियोंसे श्रेष्ठा जानकर अन्तमें) वनमें जाकर श्रीकृष्णसे कहा, - "हे कृष्ण, मैं और चल नहीं पा रही हूँ, तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, मुझे वहाँ ले चलो।" श्रीराधिकाके ऐसे कहनेपर श्रीकृष्णने कहा, - "मेरे कन्धेपर चढ़ो।" इतना कहकर श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर वे श्रीकृष्णवधु श्रीराधिका अनुताप करने लगीं ॥ 206-208 ॥ अनुभाष्य-रासलीलासे केवलमात्र श्रीमती राधिकाको लेकर श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर श्रीमतीको अहङ्कार होनेपर उनकी गर्वोक्ति, - असौ प्रियः (कृष्णः) कामयाना (कामो यानम् आगमन- साधनं यासां ताः) गोपीः (सर्वाः) हित्वा (परित्यज्य) मां (राधिकां) भजते इति दृप्ता (गर्विता सती) सा (राधिका) आत्मानं (स्वां) सर्वयोषितां (सकलगोपीनां मध्ये) वरिष्ठां (श्रेष्ठां) मेने; ततः (एवमभिमानान्तरं) वनोद्देशं (कानन-प्रदेशविशेषं) गत्वा “अहं चलितुं न पारये (शक्नोमि, अतः) यत्र (स्थाने) ते (तव) गन्तुं मनः (अभिलाषः), [तत्र हे केशव,] मां नय (वह)", इति सा केशवम् अब्रवीत्। एवम् उक्तः [सन् सः श्रीकृष्णः तां] प्रियां (राधिकां) [मम] स्कन्धम् आरुह्यताम् इति आह; ततः [लीला-विलासी] कृष्णः च अन्तर्दधे (अन्तर्हितः आसीत्); [तद्दृष्ट्वा] सा वधू (राधिका) च अन्वतप्यत (अनुतापवती)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 206-208 ॥ श्रीमद्भागवत (10/31/16)में- पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान अतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः। गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥ 209 ॥ 212 |

उन्नीसवाँ अध्याय 19/209-212 ]

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—हे कृष्ण, हम अपने पति, पुत्र, अन्वय (पतिके सम्बन्धसे जो पुत्रके समान हैं), भाई और बन्धुओं, सभीका परित्याग करके तुम्हारे पास आयी हैं; हमारे आनेका कारण तुम जानते हो,—तुम्हारे गीतसे मोहित होकर हम आयी हैं। हे धूर्त, रात्रिकालमें स्त्रियोंका [तुम्हारे अतिरिक्त] कौन इस प्रकार परित्याग करता है? ॥ 209 ॥

अनुभाष्य—गोपियोंके साथ रासलीला करते-करते श्रीकृष्णके अचानक अन्तर्धान होनेपर, श्रीकृष्णके उद्देश्यसे विरहमें कातर गोपियोंकी विलाप-गीति,—

हे अच्युत, गतिविदः (अस्मदागमनं जानतः, गीतगतीर्वा जानतः, यद्वा गतिविदः वयं) तव उद्गीतमोहिताः (उद्गीतेन् उच्चैर्गीतेन् मोहिताः वयं गोप्यः) पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान् (पतीन् सुतान् अन्वयान् तत्सम्बन्धिनः पुत्रान् भ्रातॄन् बान्धवांश्च सर्वान्) अतिविलङ्घ्य (अनादृत्य) ते (तव) अन्ति (समीपम्) आगताः; हे कितव, (वञ्चनशील शठ,) निशि एवम्भूताः योषितः (स्वयमागताः) [त्वां ऋते] कः त्यजेत् [न कोऽपीत्यर्थः]।

श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥

शान्तरसके गुण और स्वरूप :- शान्तरसे—'स्वरूपबुद्धये कृष्णैकनिष्ठता'। “शमो मन्निष्ठता बुद्धेः” इति श्रीमुख-गाथा ॥ 210 ॥

अनुवाद—शान्तरसमें अपने स्वरूपमें स्थित होकर बुद्धिके द्वारा श्रीकृष्णमें निष्ठा होती है। श्रीकृष्णने अपने श्रीमुखसे स्वयं उद्धवजीसे कहा है,—“मुझमें ही बुद्धिका एकाग्र होना 'शम' है॥” 210 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें निष्ठ बुद्धिसे 'शम'-धर्म उदित होता है; शम-धर्मसे 'शान्त'-रस होता है, इसलिये शान्तरसमें श्रीकृष्ण ही एकमात्र परमार्थ स्वरूप हैं। समस्त विश्व ही (श्रीकृष्णपर आश्रित होनेपर भी श्रीकृष्ण-स्वरूपसे पृथक् अन्य) 'इतर' वस्तु है—यही निष्ठा लक्षित होती है॥ 210 ॥


अनुभाष्य—शान्तरसमें जड़़ीय-भोगबुद्धिके दूर होने पर जीवकी स्वरूपबुद्धि उदित होती है। उनका नित्य स्वरूप ही श्रीकृष्णमें नित्य एकनिष्ठता-धर्मसे युक्त है। श्रीभगवान्ने उद्धवको अपने मुखसे कहा है कि 'शम'-शब्दका अर्थ 'कृष्णैकनिष्ठता' है॥ 210 ॥

भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/47)में :- शमो मन्निष्ठता बुद्धेरिति श्रीभगवद्वचः। तन्निष्ठा दुर्घटा बुद्धेरेतां शान्तरतिं बिना॥ 211 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 211 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें निष्ठ-बुद्धिसे 'शमगुण'—इस भगवद्-वाक्यसे समझना होगा कि शान्तरतिके बिना भगवन्निष्ठा-अत्यन्त दुर्लभ है॥ 211 ॥

अनुभाष्य— बुद्धेः मन्निष्ठता (कृष्णैकनिष्ठता) 'शमः' इति श्रीभगवद्वचः (उद्धवं प्रति श्रीकृष्णवाक्यम्); एतां शान्तरतिं बिना बुद्धेः तन्निष्ठा (भगवन्निष्ठा) दुर्घटा (दुर्घटनाया)।

श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 211 ॥

श्रीमद्भागवत (11/19/36)में :- शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियसंयमः। तितिक्षा दुःखसंमर्षो जिह्वोपस्थजयो धृतिः ॥ 212 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 212 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें निष्ठ-बुद्धिसे 'शम' गुण, इन्द्रिय-संयमको 'दम', दुःख-सहन करनेका नाम 'तितिक्षा', जिह्वा और उपस्थको जीतनेका नाम 'धृति' है॥ 212 ॥

अनुभाष्य—उद्धवके प्रश्नके उत्तरमें श्रीकृष्णकी उक्ति,— बुद्धेः मन्निष्ठता (न तु शान्तिमात्रं) 'शमः'; इन्द्रियसंयमः [न चौरादि-दमनं] 'दमः'; दुःखसंमर्षः (आत्मकृतविपाकस्य, विहित-दुःखस्य वा, सन्मर्षः सहनं, न तु भारादेः) 'तितिक्षा'; जिह्वोपस्थ जयः (जिह्वोपस्थयोः जयः वेगधारणं, न तु अनुद्वेगमात्रं) 'धृतिः'।

213

[ 19/212-220 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 212 ॥ कृष्ण बिना तृष्णा-त्याग—तार कार्य मानि। अतएव 'शान्त' कृष्णभक्त एक जानि॥ 213॥ स्वर्ग, मोक्ष कृष्णभक्त 'नरक' करि' माने। कृष्णनिष्ठा, तृष्णा-त्याग—शान्तेर 'दुइ' गुणे॥ 214॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-सम्बन्ध बिना समस्त प्रकारकी कामनाओंका त्याग ही शान्तरसके भक्तका कार्य है। इसलिये शान्तरसके आश्रितको भी एक श्रीकृष्णभक्त माना जाता है। श्रीकृष्णभक्त स्वर्ग तथा मोक्षको भी नरकके समान ही मानता है। श्रीकृष्णके प्रति निष्ठा और अन्यान्य तृष्णाओंका त्याग—ये शान्तरसके भक्तके दो गुण हैं॥ 213-214॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णसे अतिरिक्त अन्य वस्तुओंमें तृणारहित होना ही शान्तरसका कार्य स्वीकृत है; इसलिये एकमात्र श्रीकृष्णभक्त ही शान्त है। 'दुइ गुणे'—अर्थात् श्रीकृष्णनिष्ठा और श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य वस्तुओं अथवा द्रव्योंमें लोभका त्याग—ये दो गुण हैं॥ 213-214॥ श्रीमद्भागवत (6/17/28)में :— नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति। स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिनः॥ 215॥ अनुवाद—स्वर्ग, अपवर्ग (मुक्ति) और नरकको एक समान देखनेवाले श्रीनारायण-भक्त किसीसे भी भयभीत नहीं होते॥ 215॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 9/270 संख्या देखें॥ 215॥ सभी भगवद्भक्तोंमें ही शान्त-रस विद्यमान :— एइ दुइ गुण व्यापे सब भक्तजने। आकाशेर 'शब्द'-गुण येन भूतगणे॥ 216॥ अनुवाद—श्रीकृष्णनिष्ठा और तृष्णा-त्याग—ये दो गुण सभी रसके भक्तोंमें विद्यमान रहते हैं। जैसे आकाशका 'शब्द'-गुण अन्य चारों भूतोंमें रहता है॥ 216॥ अनुभाष्य—'सब भक्तजने'—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन पाँच प्रकारके भक्तोंमें ही अवस्थित है। 'आकाशका शब्दगुण'—मध्यलीला 8/85-87 संख्या देखें॥ 216॥ शान्तरसमें—श्रीकृष्णके प्रति निरपेक्ष-भाव :— शान्तेर स्वभाव—कृष्णे ममता-गन्धहीन। 'परंब्रह्म'-'परमात्मा'-ज्ञान-प्रवीण॥ 217॥ अनुवाद—शान्तरसके भक्तके स्वभावमें श्रीकृष्णके प्रति ममताकी गन्ध भी नहीं होती। उनमें केवल परमब्रह्म (निराकार ब्रह्म) और परमात्माका ज्ञान ही प्रबल होता है॥ 217॥ दास्यरसमें—शान्तरस और सेवा :— केवल 'स्वरूप-ज्ञान' हय शान्तरसे। 'पूर्णैश्वर्यप्रभु-ज्ञान' अधिक हय दास्ये॥ 218॥ ईश्वरज्ञान, सम्भ्रम-गौरव प्रचुर। 'सेवा' करि' कृष्णे सुख देन निरन्तर॥ 219॥ शान्तेर गुण दास्ये आछे, अधिक—'सेवन'। अतएव दास्यरसेर एइ 'दुइ' गुण॥ 220॥ अनुवाद—शान्तरसमें जीवको केवल अपने स्वरूपका ज्ञान होता है। किन्तु दास्यरसमें जीवको श्रीकृष्णका अधिक ज्ञान होता है और वह उन्हें 'पूर्णैश्वर्यमय प्रभु'के रूपमें जानता है। दास्यरसके भक्त श्रीकृष्णको ईश्वर जानते हैं और उनके प्रति प्रचुर सम्भ्रम और गौरव भाव होता है। वे श्रीकृष्णकी सेवा करके उन्हें निरन्तर सुख प्रदान करते हैं। शान्तरसके गुण दास्यरसमें तो होते ही हैं, और साथमें 'सेवाकी भावना'—एक अधिक गुण होता है। इसलिये दास्यरसमें श्रीकृष्णनिष्ठा और सम्भ्रम सेवा—ये दो गुण होते हैं॥ 218-220॥ 214 ।