भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1655

उन्नीसवाँ अध्याय 19/191-197 ] अनुवाद-मधुर-रसके भक्तोंमें मुख्य व्रजमें गोपियाँ, द्वारकामें महिषियाँ, वैकुण्ठमें लक्ष्मियाँ हैं। मधुर-रसमें भी असंख्य भक्त हैं॥191॥ दो प्रकारकी रति-1) ऐश्वर्यमिश्रा और 2) केवला :- पुनः कृष्णरति हय दुइत प्रकार। ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा, केवला-भेद आर॥ 192॥ गोकुलमें 'केवला' रति एवं वैकुण्ठ, मथुरा और द्वारकामें 'ऐश्वर्यप्रधान' रति :- गोकुले 'केवला' रति-ऐश्वर्यज्ञानहीन। पुरीद्वये, वैकुण्ठाद्ये-'ऐश्वर्य' प्रवीण॥ 193॥ ऐश्वर्यप्रधान रतिमें राग-सङ्कुचित, केवलामें ऐश्वर्य-ज्ञानका अभाव :- ऐश्वर्यज्ञान-प्राधान्ये सङ्कुचित प्रीति। देखिले ना माने ऐश्वर्य-केवलार रीति॥ 194॥ अनुवाद-ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा और केवलाके भेदसे पुनः श्रीकृष्णरति भी दो प्रकारकी होती है। गोकुलमें 'केवला' रति है, यह ऐश्वर्यज्ञानसे रहित होती है। मथुरापुरी और द्वारकापुरी तथा वैकुण्ठादिमें ऐश्वर्य-प्रधान रति होती है। ऐश्वर्यज्ञानकी प्रधानता होनेपर प्रीति सङ्कुचित हो जाती है। केवला-रतिकी यह रीति है कि वह ऐश्वर्यको देखनेपर भी उसे मानती नहीं है॥192-194॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णरति दो प्रकारकी है- ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा और केवला अथवा ऐश्वर्यज्ञानहीना। दोनों पुरियों अर्थात् द्वारका और मथुरामें एवं वैकुण्ठादिमें ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा भक्ति है। इसलिये वहाँ प्रेम सङ्कुचित होता है। किन्तु गोकुलमें केवला-रतिमें गोप-गोपियाँ श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको देखनेपर भी उसे मानना नहीं चाहते॥192-194॥ व्रजमें शान्त और दास्यमें कहींपर ऐश्वर्यज्ञान रहनेपर भी सख्य, वात्सल्य और मधुररसमें ऐश्वर्यज्ञानका अभाव :- शान्त-दास्य-रसे ऐश्वर्य काँहा उद्दीपन। सख्ये, वात्सल्ये, मधुर-रसे सङ्कोचन॥ 195॥ अनुवाद-व्रजमें शान्त और दास्य रसमें कहीं-कहींपर ऐश्वर्यका उद्दीपन होता है, किन्तु सख्य, वात्सल्य तथा मधुर रसमें ऐश्वर्य सम्पूर्ण रूपमें सङ्कुचित है॥195॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'काँहा'-किसी विशेष स्थान पर॥195॥ अनुभाष्य-शान्त, दास्य और गौरव-सख्यमें स्थान-स्थानपर ऐश्वर्यकी प्रधानता लक्षित होती है; विश्रम्भ-सख्यमें, वात्सल्यमें और मधुर-रसमें ऐश्वर्यकी प्रधानताका भाव सङ्कुचित होता है॥195॥ ऐश्वर्यमिश्रित रतिमें स्वयंको 'दीन' और श्रीकृष्णको प्रभु मानना- (1) वात्सल्य-रतिमें वसुदेव और देवकी :- वसुदेव-देवकीर कृष्ण चरण वन्दिल। ऐश्वर्यज्ञाने दुँहार मने भय हैल॥ 196॥ अनुवाद-जब श्रीकृष्णने वसुदेव और देवकीके चरणोंकी वन्दना की, तब श्रीकृष्णके ऐश्वर्यज्ञानके कारण दोनोंके मनमें भय उत्पन्न हो गया॥196॥ श्रीमद्भागवत (10/44/51) में :- देवकी वसुदेवश्च विज्ञाय जगदीश्वरौ। कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते न शङ्कितौ॥ 197॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 197॥ अमृतप्रवाह भाष्य-देवकी और वसुदेव, बलदेव और श्रीकृष्णको 'जगदीश्वर' जानकर शङ्कासे युक्त होकर उन्हें आलिङ्गन नहीं कर पाये॥197॥ अनुभाष्य-कंस और उसके द्वारा नियुक्त मल्लोंका वध करके श्रीकृष्णने माता देवकी और पिता वसुदेवके बन्धनको खोलकर उन्हें प्रणाम किया, देवकी और वसुदेवमें यशोदा और नन्दकी भाँति भाव नहीं होनेके कारण ऐश्वर्यभावकी प्रबलता लक्षित,- देवकी वसुदेवश्च (मातापितरौ) पुत्रौ (रामकृष्णौ) जगदीश्वरौ इति विज्ञाय (ज्ञात्वा) शङ्कितौ (भीतौ सन्तौ) कृतसंवन्दनौ (कृतप्रणामौ) अपि तौ न सस्वजाते (आलिङ्गितवन्तौ किन्तु प्रणतौ बद्धाञ्जली स्तुवन्तौ स्थितौ)। । 209